12 नवंबर, 2016

पांच सौ और हजार के नोट का चक्कर

मेरे बेटे ने मुझे आवाज दी- “पापा जल्दी आओ। ये मोदी जी ने क्या कर दिया?” मैं किताब पढ़ने में खोया था जहां था वहीं से पढ़ते-पढ़ते बोला- “कौनसे मोदी जी ने क्या कर दिया?” उसकी उतेजना बढ़ गई और वह लगभग भागता हुआ आया और मेरा हाथ पकड़ कर टीवी वाले कमरे में ले गया। वह कह रहा था कि हमारे देश में मोदी जी कोई दस-बीस थोड़ी ही है बस एक ही मोदी जी हैं। पांच सौ और हजार के नोटों को बंद करने की घोषणा माननीय प्रधानमंत्री जी के श्रीमुख से सुनकर सन्न रह गया। जैसे लड़के ने मुझे आवाज दी, वैसे ही मैंने गृह-मंत्रालाय को पुकारा। “अरे सुनती हो, इधर आना जरा।” मुझ में और मेरी पत्नी में कुछ बड़े अंतर है उनमें एक अंतर यह है कि मैं अक्सर किताब में खोया मिलता हूं और वह रसोईघर में। हाथ आटे से सने हुए वह आई तो मुझे पुरानी फिल्म के किसी खास सीन की याद आनी चाहिए थी पर मैं तो ‘मुद्राराक्षस’ के नए पाठ से उसका साक्षात्कार करवाने को उत्सुक था। उसके स्वर में प्रेम नहीं झल्लाहट थी कि क्या हुआ मुझे क्यों बुलाया है। मैं उसे कुछ बताता-समझता इतने में पंच काका अपने कमरे से निकल कर मेरी तरफ आते दिखाई दिए। वे कह रहे थे- “शोर क्यों मचा रहे हो? क्या हुआ?”
अब मैं वक्ता था और मेरे श्रोता में गृहमंत्रालय के वरिष्ठतम सदस्य पंच काका भी शामिल थे। उन्हें मैं क्या समझता। मैंने कहा- “आप खुद अपनी आंखों से देख लो क्या हुआ है?” समाचार वाचक और माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी फिर-फिर एक ही किस्सा बड़े आराम से दोहरा रहे थे, और हम सब का आराम जैसे उनकी घोषणा से खराब हो रहा था। पत्नी ने कहा- “ऐसे थोड़ी ही हो सकता है?” और पंच काका का सवाल था- “अब क्या होगा?” दोनों के अपने अपने संदर्भ थे। मुझे पत्नी को समझना था कि ऐसा हो चुका है और पंच काका को यह कि अब कुछ नहीं हो सकता है। हमारे नोटों का कचरा हो गया है। अभी कुछ ही दिनों पहले पंच काका ने अपनी एक दुकान और जमीन बेची थी और करोड़पति होने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हो चुका था। मुझे डर लगने लगा कि कहीं हार्ट अटेक नहीं आ जाए क्यों कि दुकान और जमीन से प्राप्त रकम में काला और सफेद धन का कुछ चक्कर ऐसा था कि बहुत सारी रकम उन्होंने अपने लॉकर में और घर में रख ली थी। पंच काका सोफे पर ऐसे बैठे ही अब क्या होगा बोलने के बाद एकदम शांत चित हो कर जैसे कहीं खो गए। मैंने लड़के से कह कर पानी मंगवाया और पंच काका को पीने का निवेदन किया तो उन्होंने गिलास को फेंक कर पटक दिया और चिल्लाते हुए बोले कि मैं इस घर में बड़ा हूं तो क्या हुआ तुम भी अब छोटे नहीं हो। फिर तुमने मुझे जोर देकर क्यों नहीं कहा कि सारा रुपया बैंक में जमा करा दो अथवा कहीं ठीक ढंग से लगा दो। अब मैं बूढ़ा हो गया हूं। धन रोक कर बैठ गया और अब बर्बाद हो गया ना। अब चीखने की बारी गृहमंत्रालय यानी मेरी पत्नी की थी। वह मेरे हाथ जोड़ती हुई बोली- “मुझे माफ कर दीजिए।” मैंने कहा- “क्यों क्या हुआ?” उसने जो कुछ बताया उससे मुझे ज्ञात हो गया कि मेरा शक सही था, बहुत बार मुझे लगता कि रुपयों-पैसों में कुछ गड़बड़ हो जाती है। वह कभी पांच सौ का नोट तो कभी हजार का नोट जेब से मार कर छुपा कर रख देती। अब सारी पोल सामने आ गई। इन सब के बीच एक तीसरा धमका भी मुझे सुनना था। टीवी वाले कमरे में मेरे बेटे ने अपना गुल्लक लाकर फोड़ दिया। अब जमीन पर हमारे समाने कुछ नोट पांच सौ के कुछ हजार के बिखरे पड़े थे। अगर कोई दूसरा दिन होता तो गुल्लक के बिखरे हुए नोटों में मेरा बेटा पांच सौ और हजार के नोट पहले उठाता। उसने छोटे नोट और सिक्के पहले उठाए और अंत में सभी पांच सौ और हजार के नोट उठाए और बोला- “लो ये आपके लिए।”
० नीरज दइया
 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति डॉ. सालिम अली और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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