26 नवंबर, 2016

प्रेम का कांटा

लेखक परिचय
मधु आचार्य ‘आशावादी’
जन्म : 27 मार्च, 1960 (विश्व रंगमंच दिवस)
शिक्षा : एम. ए. (राजनीति विज्ञान), एलएल.बी.
सृजन : 1990 से हिंदी और राजस्थानी की विविध विधाओं में निरंतर लेखन। ‘स्वतंत्रता आंदोलन में बीकानेर का योगदान’ विषय पर शोध।
प्रकाशन : राजस्थानी साहित्य : ‘अंतस उजास’ (नाटक), ‘गवाड़’, ‘अवधूत’, ‘आडा-तिरछा लोग’ (उपन्यास) ‘ऊग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’, ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (कहाणी-संग्रह), ‘अमर उडीक’ (कविता-संग्रह), ‘सबद साख’ (राजस्थानी विविधा) का शिक्षा विभाग, राजस्थान के लिए संपादन।
हिन्दी साहित्य : ‘हे मनु!’, ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इन्सानों की मंडी’, ‘@24 घंटे’, ‘अपने हिस्से का रिश्ता’ (उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’, ‘सुन पगली’, ‘अनछुआ अहसास और अन्य काहनियां’ (कहानी-संग्रह), ‘चेहरे से परे’, ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’, ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं जिंदगी’ (कविता-संग्रह), ‘रास्ते हैं, चलें तो सही’ (प्रेरक निबंध), ‘रंगकर्मी रणवीर सिंह’ (मोनोग्राफ) अपना होता सपना (बाल उपन्यास)
पुरस्कार : उपन्यास ‘गवाड़’ पर राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर का ‘मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा-पुरस्कार’, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर द्वारा ‘राज्य स्तरीय नाट्य निर्देशक अवार्ड’, ‘शंभू-शेखर सक्सेना विशिष्ट पत्राकारिता पुरस्कार’
अन्य : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के सदस्य, लगभग 75 नाटकों का निर्देशन और 200 से अधिक नाटकों में अभिनय, कुछ रचनाएं अन्य भारतीय भासाओं में अनूदित-प्रकाशित। विश्वविद्यालयों द्वारा रचनाओं पर शोध-कार्य।
स्थाई संपर्क : कलकत्तिया भवन, आचार्यां का चौक, बीकानेर (राजस्थान)
ई मेल : ashawaadi@gmail.com  /  मो. 9672869385
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राजस्थानी कहानी
प्रेम का कांटा
मूल : मधु आचार्य ‘आशावादी’ ० अनुवाद : नीरज दइया
    बचपन से ही उसे घर में सारी सुविधाएं मिल गई। इसलिए मंजू उम्र से पहले ही व्यस्क हो गई। घर में ए.सी. था, एल.ई.डी. था, हाथ में स्मार्ट फोन था और कहीं आने-जाने की आजादी के साथ स्कूटी थी। ये सभी चीजें कुछ उम्र लेने पर किसी को मिला करती है, परंतु मंजू को तो समझ पकड़ते ही सब कुच मिल गया था।
    घर में किसी भी काम-काज के लिए नौकर थे, इसलिए कुछ काम तो उसे करना ही नहीं पड़ता था। मुह से बाहर आए शब्दों के साथ ही सब कुछ हाजिर हो जाता। समय ही समय था। हाथों में स्मार्ट फोन था इसलिए जैसा मन करता, वही करती। नई तकनीक और फोन ने तो दुनिया को मुट्ठी में ला दिया।
    घर बैठे पूरे संसार का भ्रमण, चाहे विदेश जाओ। कई भांति के तरीके हैं जिस से दूर बैठों को नजदीक देखो। आमने-सामने बात कर लो। एक दूसरे की तश्वीरें देख लो। चैटिंग कर लो। फेसबुक जैसा साधन है, जिसे चाहो दोस्त बनाओ और बातें करो। इंटरनेट ने दुनिया की सारी दूरियां तो पाट ही दी। फेसबुक तो लिखने और लिखे हुए पर कुछ कहने का बड़ा साधन बन गया। मंजू भी फेसबुक का बहुत उपयोग करती। उसकी फ्रेंडलिस्ट बहुत लंबी थी। उसी में वह दिन-रात लगी रहती।
    मां रोटी खाने के किए आवाजे लगाती रहती, तो मंजू कहा करती- मां, अभी मेरी अमेरिका की सहेली से बात चल रही है। यह पूरी हो जाए तो आती हूं।
    - तुमने तुम्हारी उस सहेली को देखा है क्या?
    - मां, फोटो लगी हुई है ना।
    - उसके बारे में जानती है क्या?
    - जानने की क्या जरूरत है। अपने को तो बातें करनी हैं।
    - बिना पहचाने कोई किसी का दोस्त कैसे हो सकता है।
    - मां, अब जमाना बदल गया है।
    - क्या बदल गया।
    - इंटरनेट से तो लोग व्यापार चलाते हैं और इस से बड़े-बड़े दूसरे काम भी करते हैं।
    - मुझे भी बता तो सही कि क्या क्या काम करते हैं।
    - अरे मां, तुम नासमझ हो। तुमको कुछ समझ नहीं आता।
    - मुझे समझ नहीं आता तभी तो तुझ से कह रही हूं कि तू समझा।
    - देख मां, पहले नेता चुनाव के समय वोट मांगने घर-घर जाया करते थे। पर अब तो एक साथ सभी वोटरों से वर्ता कर लेते हैं। पान की दुकान हो, चाय की दुकान हो या गांव की चौपाल, दूर बैठे उन से सीधी बात कर लेते हैं नेता।
    - हां, मैंने अखबार में पढ़ा तो था।
    - यह सच्ची बात है मां ! देख लो लोगों ने इसी इंटरनेट के बल पर सरकारें उखाड़ दी और खुद कुर्सी पर बैठ गए। चारों तरफ इसी इंटरनेट का जोर है, तुमको पता है क्या?
    - किस बात का।
    - एक सरकार तो इसलिए बन गई कि उसने सत्ता में आते ही सभी जगह इंटरनेट फ्री कर देने का कहा। लड़के-लड़कियां पीछे पड़ गए और उस पार्टी की सरकार बनवा दी।   
    - मेरी बिटिया, इस तुम्हारे इंटरनेट से सारी चीजें दूर से देखते हैं। एक न एक दिन तो उनकी पोल खुलती ही है।
    - फिर चाहे पोल खुलो, पर एक बार तो सत्ता में आ गए ना।
    - मुझे तो तुम्हारी बातें पसंद नहीं आती। तुम्हारे इस नेट को छोड़ और पहले खाना खा ले। खाना खा कर फिर से चला लेना। यह कहीं जा थोड़ी ही रहा है।
    - हां, यह बात तुम्हारी ठीक है। चलो, खाना खाते हैं।
    मंजू उठ कर मां के साथ रसोईघर में आ गई। खाना खाने बैठी। पापा भी आ गए थे। वे भी खाना खाने बैठ गए। मां ने खाना खाते खाते फिर बात चालू की।
    - यह तुम्हारी बेटी तो सभी काम नेट से करती है। पूरा दिन उसी से चिपकी रहती है।
    - आजकल इसी का चलन है। यह क्या गलत करती है।
    - अरे नेट पर सब कुछ अच्छा ही नहीं होता। यह भी तो लोग कहते हैं।
    - जो नेट चलता है उसको अच्छे-बुरे का ज्ञान होता है।
    - छोड़ो तब तो आपकी सह हो गई इसे। चलाना बेटी, मर्जी है तुम्हारी और तुम्हारे पापा की।
    पिता-पुत्री ने खाना खाया और अपने-अपने कमरे में आ गए। मां नेट को लेकर बड़-बड़ करती रही, पर दोनों पर कुछ असर नहीं था।

X    X    X     X

    उस दिन मंजू के इनबॉक्स में एक मैसेज था। उस में किसी लड़के ने उसे फ्रेंड रिक्वेक्ट मंजूर करने का लिखा था। मंजू ने उसकी प्रोफाइल खोल कर देखी। वह जवान था और फोटो में सुंदर दिखाई देता था। उस की टाइम लाइन पर या तो कविताएं थी या फिर भगवान के चित्रों के साथ भक्ति की पंक्तियां। किसी प्रकार की बुरी पोस्ट तो एक भी नहीं थी। मंजू को लगा कि इसे मित्र बनाने में ना नहीं करनी चाहिए। ठीक ही दिखाई देता है। उस की फ्रेंड रिक्वेट उसने एक्सेप्ट कर ली।
    बस, बन गए दोनों दोस्त। उसने बहुत ही सुंदर शब्दों में हाथोहाथ मंजू का आभार प्रदर्शित किया। उसका नाम अरुण था। फिर तो रोजाना कविता की पंक्तियां डालनी आरंभ कर दी। टाइम जब भी मिलता चैटिंग चालू कर देते। उसने बताया कि वह इंजीनियर है और एक कंपनी में काम करता है। घर में माता-पिता और दो बहने हैं, जिन का विवाह कर दिया। खुद ने अभी तक विवाह नहीं किया है।
    अरुण ने जब इतना बताया तो मंजू ने भी अपने घर के बारे में सब बातें बता दी। यह भी बता दिया कि वह करोड़पति पिता की इकलौती संतान है और घर में किसी चीज की कमी नहीं है, उसके पूछने पर यह भी बता दिया कि अभी तक ना तो मेरा विवाह हुआ है और ना सगाई।
    अरुण दूसरे शहर में रहता था। अब तो दिन में कई बार अरुण और मंजू चैटिंग करने लगे। बहुत बातें होने से दोनों नजदीक आते हैं, यह तो स्वभाविक ही है। अब दोनों ने आपस में ‘जी’ लगाना छोड़ कर मन लगा लिया। नाम से ही एक दूजे को लिखने लगे। दिन-भर की हर बात एक दूसरे को बताते रहते और यह भी कि बताते कि अभी कहां हैं।
    इंटरनेट ने उन दोनों के बीच की सारी दूरियों को कम कर दिया। अब तो रात को भी लंबी-लंबी चैटिंग होने लगी। दोस्ती की बातें प्रेम में बदलने लगी। आरंभ में तो दोनों डरते रहे, पर उम्र के असर के चलते एक दिन मंजू ने हां कह दिया। अब तो आपस में बहुत बातें होने लगी और बातें प्रेम की ही होती। दोनों आपस में वे बातें भी करने लगे जिनसे लोग बचा करते हैं। यह भी तय कर लिया कि यदि घर वाले नहीं मानेगे तो भाग कर विवाह कर लेंगे। मंजू में अब बदलाव आने लगा था, जो उसकी मां को तो साफ दिखाई देता था।
    एक दिन मंजू ने अपनी मां के सामने अरुण की बात की और कह दिया कि मैं शादी उसी से करूंगी। मां ने मंजू के पापा के सामने यह बात तो उन्हें धक्का लगा। इंटरनेट की दुनिया से खोजा गए दुल्हे की बात हलक से नहीं उतरी।
    माता-पिता ने मंजू को बहुत समझाने की कोशिश की, पर वह तो टस से मस नहीं हुई। कह दिया कि आप हंसी-खुशी शादी कर दें तो ठीक है, नहीं तो हम दोनों अपने आप ही शादी कर लेंगे। मां का मानना था यह सब इंटरनेट के कारण ही हुआ है। इसे बंद करवाएं। पर बेटी की जिद के सामने अड़ना पिता के भी बस की बात नहीं रही।

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    विवाह के इस झगड़े में कई दिन निकल गए। मंजू और अरुण की रोजाना बातें होती थीं। मंजू ने एक दिन उसे अपने शहर में आने का कहा। पहले तो उसने ना कह दिया लेकिन फिर आने के लिए राजी हो गया। मंजू उसके शहर नहीं जा सकती थी।
    आमने-सामने तो अब तक कभी वे नहीं हुए थे। इसलिए ही मंजू ने ऐसा कहा था। दिन तय हो गया और अरुण ने आने का कह दिया। दोनों मन खोल कर मिले। शादी की बात हुई और तय कर लिया कि घर वाले यदि नहीं मनते हैं तो हम अपने निर्णय पर अटल रहेंगे।
    शादी कब करेंगे इस विषय पर बातें हुई। मंजू ने तो उसी दिन साथ चलने की बात कर ली थी। अरुण ने बताया हुआ था कि उसने घरवालों से बात कर रखी है उन्हें कोई ऐतराज नहीं है। मंजू ने कहा कि बस मुझे तो तुम्हारे घर में ही रहना है। यहां से चलें। नहीं तो घरवाले हमें एक नहीं होने देंगे।
    अरुण ने यह नहीं सोचा था कि मंजू तुरंत ही साथ चलने का कह देगी। वह कुछ असमंजस में पड़ गया। मंजू अपने मां-पापा की बात जानती थी। चाहे वे शादी के लिए हां नहीं कर रहे हो, पर मंजू उनकी इकलौती बेटी थी, इसलिए उसकी बात टालने की हिम्मत उनमें नहीं थी।
    मंजू ने देखा कि अरुण कुछ डर रहा है तो उसने अपने घर चलने का कह दिया। पर अरुण को यह भी ठीक नहीं लगा। उसने बातों में उसे राजी किया और एक महीने के बाद शादी करने की हां कर दी। साथ में यह भी कह दिया कि अगर घरवाले नहीं मानेंगे तो हम खुद शादी कर लेंगे।
    अरुण ने जाते-जाते मंजू को कल की फेसबुक पोस्ट देखने का कहा। मंजू ने कहा कि मैं तो हमेशा ही देखती हूं। पर उसने अखरा कर फिर कहा कि कल जरूर देखना। कसमें खा कर दोनों एक दूसरे से जुदा हुए। अरुण अपने शहर वापिस चल गया। मंजू खुशी-खुशी घर लौट आई। एक महीने की ही तो बात है। यह समय भी जल्दी-जल्दी बीत जाएगा।
    उस दिन वह मां से नहीं झगड़ी। हंसती रही। मां को भी यह बात कुछ अजीब लगी, पर उससे कुछ नहीं पूछा। रात को सोने गई तो सुबह का इंतजार था। अरुण कह गया था कि फेसबुक की पोस्ट देखनी है। मंजू ने सोचा कि वह कोई कविता लिखेगा।
    आज उसे अरुण से चैटिंग करनी थी पर वह एक बार भी ऑनलाइन नहीं आया। फोन मिलाया तो स्विच ऑफ था। पर इस बात को मंजू ने गंभीरता से नहीं लिया। उसे तो सुबह की पोस्ट और एक महीने का इंतजार था। इसी में खोई रही वह।
    सुबह मंजू की आंख जल्दी खुल गई। चाय भी नहीं पी। उसे अरुण की बात याद थी। इसलिए सबसे पहले फेसबुक खोली और उस की प्रोफाइल पर गई। देख कर चक्कर आ गया।
    अरुण ने अपनी पत्नी और दो लड़कों का चित्र डाल रखा था। लिखा हुआ था कि आज मेरी बारहवीं एनीवर्सी है। मंजू को यकीन नहीं हुआ। फिर फिर देखा। फोन लगाया तो स्विच ऑफ था। उस की निगाह प्रोफाइल पर गई तो प्रोफाइल की बातें भी बदली हुई थी। खुद को ‘मैरिड’ बताया हुआ था और पत्नी का नाम गीता लिख रखा था।
    इंटरनेट से बने हुए सारे सपने टूट गए। सच सामने आ गया। मंजू ने सब से पहले तो अरुण को ‘अनफ्रेंड किया। मोबाइल में से उसके नंबर निकाले और ‘रिजेक्ट लिस्ट’ में डाल दिए। फिर उठ कर खुद ही चाय पीने गई।
    वहां मां-पापा दोनों बैठे थे। चाय ली और सामने बैठ गई।
    - पापा, यह स्मार्ट फोन रखिए। मुझे अब फोन नहीं रखना। और घर का इंटरनेट कनेक्शन भी कटवा देना।
    दोनों चक्करा गए, यकायक यह क्या हुआ, कुछ मालूम नहीं चला। मंजू उठी और चलते-चलते बोली- आप जहां कहेंगे वहां शादी करूंगी। बस मेरी एक प्रार्थना है कि मुझे उम्रभर फोन मत देना। यदि फोन दें तो इंटरनेट मत देना।
    पिता बात समझ गए।
    - बेटा, इंटरनेट खराब नहीं है। पर इंसानी रिश्तों में केवल इसी से काम नहीं चलता। इस के लिए तो सभी कुछ देखना होता है। इसे केवल जानकारी के लिए काम में लेंवे तो कोई खराबी नहीं है। तुम यह फोन रखो और इंटरनेट भी रहेगा। बस तुम इसे रिश्तों का नहीं, बस जानकारी का साधन समझना शुरू कर दो।
    मंजू ने निगाहें झुका ली। फोन उठाया और धीमें कदमों से अपने कमरे की तरफ चल दी।
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अनुवाद : डॉ. नीरज दइया
  

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