25 नवंबर, 2016

काला धन देस में पकड़ा

जकल दिन-रात हमें बस हमारे पंच काका की चिंता है। भाग-दौड़ इतनी है कि पता ही नहीं चलता कब दिन निकला, कब रात हुई। जनाब समय का कुछ पता ही नहीं चलता। कब दिन निकलता है और कब रात हो जाती है। समय ने ऐसी करवट ली है। हम खुद को बंद कमरों में बंद किए बैठे हैं। हमें कुछ होश नहीं है। पहले भी हमारे होश उडे हुए थे। पर अब जैसा हाल बेहाल नहीं था। अब माजरा यह कि पांच सौ-हजार के नोटों ने होश उडा दिए हैं। पहले इसको जमा करने में सब कुछ खो दिया। अब चारों तरफ ऐसी हवा चली कि बाहर मुंह निकालते ही बेहोश होने का डर है। थोड़े से नोट क्या जमा कर लिए, लगता है कि अब गिरे.... अब गिरे। माननीय ने एक ही झटके में ऐसा गिराया है कि जैसे अब उठने की हिम्मत जाती रही। देखो जिसे घाव कुरेदने को आमादा है। नोटों की ही बात कर रहा है। सुन-सुन के कान पक गए। देश में चर्चा के सारे मुद्दे धरे रह गए हैं। भूला दिए गए हैं सारे मुद्दे। बस एक ही रट है। और इस नए नोटों के गीत में देश खो गया है। हर कोई एक ही गीत गा रहा है। सरकार ने पूरे देश को गाने के लिए एक नया राग दे दिया है। नोटों का गीत आज घर-घर में गाया जा रहा है। अब इसे आप सुख कहें या दुख। यह सच्चाई है कि सारे पिछले सुख-दुख हवा हो गए हैं। कोई पिछली बातें नहीं करता। जैसे सारी समस्याएं इस नोट-पुराण ने हजम कर ली हैं।
काका तो नोटों की बातें सुनते ही जैसे आपा खो बैठते हैं। उनका खून खौलता है। वे कहते हैं कि अरे पैसा जोड़ने के लिए दिन-रात एक किया। तब कहीं जाकर दो पैसे जमा हुए। अब किसे कहें और कौन सुनेगा कि बरसों अपना खून जलाया, तब कहीं जा कर ये दो पैसे हाथ आए हैं। हमने रख छोड़े कि बाज जरूरत काम आएंगे। अब काम क्या खाख आएंगे। उनका मानना है कि कोई ऐसे कैसे कह सकता है कि ये नोट नहीं चलेंगे। आपने दिए, तब चलते थे। अब क्या हो गया। पंच काका को दिन-रात चक्कर आते हैं। निवाला हलक से नीचे नहीं उतरता। ना भूख लगती है ना प्यास। बेचैन रहते हैं। ऐसे में दिन क्या और रात क्या। हमारे तो दिन-रात एक जैसे हो गए हैं। चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा छा गया है। क्या पता कौन कब-कहां आकर पकड़ लेगा। न जाने ये क्या चक्कर चला है। पंच काका के साथ हमारी भी शामत पक्की है।
पहले सुना करते थे कि विदेशों में काला धन जमा है। कला धन देश में लाएंगे। अब काला-काला करते ये बड़ा खेल घर में ही कर दिया है। अब तो रंगीला देश बदरंग-सा लगता है। ये काला धन क्या निकालने लगे कि लगने लगा है कि सब रंग बेरंग हो गए हैं। काला धन अब विदेशों से लाने की जरूरत ही नहीं रही, देश में ही खूब मिल गया। पंच काका का मानना है कि धन तो धन होता है। उसका काहे का काला और गोरा। सच्चाई यह है कि कोई धन आपके सामने रख दिया जाए तो एक जैसा ही लगेगा। फिर आप काहे काला-सफेद बोलते हैं। बात तो बस इतनी-सी है कि ऐसा धन जिस पर आयकर लगता है और वैसा धन जिस पर आयकार नहीं लगाता। फिर ऐसा का वैसा और वैसे का ऐसा कर देने से क्या पूरा देश बेरंग नहीं हो जाएगा। जिसे देखो डरा हुआ है। पूरा माजरा ही बेरंग हो गया है। बड़े नोटों के हाथ लगाते ही डर लगता है। चवन्नी-अठन्नी देख कर खुशी मिलती है। अब औकात चवन्नी जैसी कर दी। फिर बातें भी ऐसी ही चवन्नी छाप। जेब कितनी ही भरी हो, लगता है- खाली है। काला यानी ब्लेक, वाइट का अपोजिट। ब्लेक मनी के चक्कर मेम दिन भी अब वाइट नहीं रहा। सब कुछ फीका-फीका लगता है। माना देश तो सोने की चिड़िया था और फिर से बन जाएगा पर क्या हम सभी को फिर से बंदर बनना होगा।

० नीरज दइया 

 

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