17 नवंबर, 2016

नमक नमकीन हो गया

फवाह का क्या, कुछ भी फैल सकती है। इसके कई कारण हैं। प्रमुख तो यह कि ‘अफवाह’ उड़ती या उड़ाई जाती है। उड़ने वालों की गति चलने वालों से सदैव अधिक होती है। हमारे देश में बड़ी समस्या जनसंख्या और बेरोजगारी का कोढ़ है। जनता-जनार्दन में निठल्ले लोग हैं, जिनके पास कोई काम-धंधा नहीं। वे बस सोचते हैं। सोचना हर नागरिक का जन्मसिद्ध अधिकार है। सोचने और बिना सोचे बोलने का क्या है, कुछ भी सोचा और बका जा सकता है। दिमाग का दोष है वह कहीं का कहीं चला जाता है। सोचने पर तो पाबंद नहीं लग सकती। बोलने पर पाबंदी लगाई जा सकती है। कोई जैसा जी में आए अंट-संट ऐसे कैसे बोल सकता है। नियम-कानून नहीं है क्या? सब के होते हुए भी यह खतरा उठाने वाले बहुत हैं। कुछ का कुछ बोलते हैं और न जाने कहां खिसक जाते हैं।
नियम कानून मुझ पर लगते हैं और मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूं। पर जनाब, भारत मेरा देश है और समस्त भारतीय मेरे भाई-बहनों में से बहुत बिगड़े हुए भाई-बहन भी है। कहीं भी कुछ का कुछ बोल देते हैं। आपको और हम को पता नहीं चल सकता कि हमारे किस भाई अथवा बहन ने यह करतूत की है। दूर क्यों जाएं, अब नमक की ही बात लें। मान लिया कि बाद में पता चल गया कि अफवाह थी। दाम में इतना हेर-फेर नहीं हो सकता। फिर भी कुछ घंटों के लिए तो पूरे देश को नमकीन कर दिया। न मालूम इस थोड़े से समय में कितनों की जिंदाबाद और मुर्दाबाद हो गई।
मेरी घरवाली को मैं बस-स्टैंड छोड़ के आ रहा था कि बीच राह फोन आया। फोन पर और वैसे भी वह कैसा भी बोलती हो, पर मैं यही कहूंगा कि उसकी मधुर वाणी से मुझे सुनने को मिला कि घर जाते समय पांच थेली नमक खरीद के ले जाना। मैंने मन की बात उसे कह दी कि कल ही तो नमक मंगवाया था। एक थेली घर में रखी है। वह बोली- आज का अखबार पढ़ा क्या? उसके ऐसे फालतू सबालों से मैं परेशान हूं। वह जानती है कि मैंने नहीं पढ़ा, फिर ऐसा सवाल क्यों जिसका जबाब पता हो। मैंने हार मान कह दिया- ठीक है घर जाते हुए दस थेली नमक ले जाऊंगा और नमक का हलवा बना कर खा लूंगा। अब वह नरम होती बोली- तुम तो नाराज हो जाते हो। आज के अखबार में छपा है कि नमक पांच सौ रुपये किलो हो गया है। इसलिए स्टोक करना जरूरी है। देखना हमें बहुत फायदा हो जाएगा। मैं फायदे में विश्वास करता हूं. मैंने तुरंत कहा ‘ठीक है’ और फोन काट दिया। मैं ऐसे फायदे में विश्वास रखता हूं।
मैं रास्ते में सोचने- आजकल लोग नमक का महत्त्व समझते ही नहीं। नमक खा कर देश का और गद्दारी करते हैं। पहले नमक का कितना मान-सम्मान था, हो सकता हो उसी मान सम्मान को लौटाने के लिए भाव बढ़ाए हों। खैर मेरी समझदारी कि घर के पास वाली दुकान से पांच थेली नमक खरीद लिया। पर यह क्या कुछ ही देर में उस दुकान का लड़का मेरे घर आ पहुंचा। कहने लगा- चाचाजी, नमक के दो हजार रुपये मंगवा रहे हैं। मैं चौंक पड़ा, यह कैसा हिसाब है? क्यों दो हजार क्यों? गुस्से में यह सवाल मुंह से निकल पड़ा। वह दयनीय स्वर में बोला- चाचाजी कह रहें है कि पंच चाचा का भतीजा बड़ा उस्ताद निकला। नमक के भाव बढ़ गए और वह पुरानी रेट में सुबह-सुबह नमक खरीद कर चपत मार गया। मैं अब भला बच्चे से क्या लड़ाई करता। उसे हजार-हजार के दो नोट पकड़ाने लगा, तो वह मुस्कुराया और बोला- मुझे भी उल्लू बनाना चाहते हैं, ये नहीं चलेंगे। मरता मैं क्या न करता, घर के भीतर गया और वे नमक की थेलियां उठाया लाया। उसे पकड़ाते हुए बोला- “बोलना छुट्टे नहीं है, होंगे तब खरीद लेंगे।’

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