07 दिसंबर, 2016

बच्चों के संग शिक्षक की सेल्फी

चाणक्य ने बहुत पहले कहा था कि शिक्षक की गोद में प्रलय और निर्माण नाम के दो बच्चे पलते हैं। अब जब शिक्षकों द्वारा पाले गए प्रलय और निर्माण काफी बड़े या कहें कि इतने बूढ़े हो चले हैं कि उनके बच्चों के बच्चों का जमाना आ गया है। इतने वर्षों से अगर अब भी शिक्षक उन्हीं दो बच्चों के बच्चों और पीढ़ियों को पालता है तो यह हमारे समाज की बहुत बड़ी भूल है। प्रलय और निर्माण को वर्षों पहले जब पहचान लिया गया तो उन्हें अलग अलग क्यों नहीं किया गया। उन्हें पृथक नहीं किए जाने का ही आज यह नतीजा हमारी आंखों के सामने है कि हम प्रलय और निर्माण को पहचान नहीं पा रहे हैं। प्रलय आ कर कहता है कि मैं निर्माण हूं तो हम मान जाते हैं और लगातार गर्त की तरफ बढ़ते हैं। इतना सब होने के बाद भी हम शिक्षकों की गोद में पलने वाले प्रलय भैया और निर्माण भैया को पहचान नहीं सके हैं। अब तो प्रलय और निर्माण के अनेकानेक भाई-बहन स्कूलों में जगह जगह भर्ती हो चुके हैं। उन भर्ती हुए बच्चों में कुछ स्कूल आते हैं और कुछ अपनी इच्छा से आते हैं या इच्छा नहीं हो तो नहीं आते हैं। शिक्षक को उनकी उपस्थिति रखनी होती है। देखा गया कि इनके हिसाब-किताब में घोटाला है। जमीन सच्चाई को सरकारों के सामने सही सही रखा जाना चाहिए किंतु जब शिक्षक अपनी गोद में इतने वर्षों से प्रलय और निर्माण को पालते आ रहे हैं तो उन में भी बहुत से गुण-अवगुण आने स्वभाविक है। पंच काका ने बताया कि उन्हें किसी समाचार-पत्र से पता चला है कि महाराष्ट्र के सरकारी स्कूल में बच्चों की उपस्थिति को बढ़ाने के लिए शिक्षक बच्चों के साथ सेल्फी लेकर उसे राज्य के एजुकेशन डेटाबेस (सरल) पर अपलोड करेंगे। यह काम बच्चों की उपस्थिति सुधारने के चक्कर में हो रहा है पर शिक्षक समुदाय का कहना है कि वे पढ़ाएं या कि सेल्फी लें। कक्षा के दस-दस बच्चों के साथ सेल्फी लेना और मुस्कुराना कितना आनंददायक होगा पर शायद इसके साथ सेल्फी लेकर सभी बच्चों के नाम और आधार नंबर के साथ डाटाबेस पर अपलोड करना जिन शिक्षकों को झंझट का काम लग रहा है वे इसको अनुचित बता रहे हैं। यह शिक्षक का हक नहीं है कि किसी सरकारी फरमान को वे उचित या अनुचित माने या बताए। मानना तो फिर भी ठीक है कि आप अपने मन मन में मानते रहो, पर यह जो बताना है वह तो बिल्कुल ही ठीक नहीं है। पंच काका का मानना है कि यह अवगुण शिक्षकों में इतने वर्षों से लगातार निर्माण और प्रलय को पालने के कारण ही हुआ है। आंकड़ों की सुने तो आंकड़े बताते है कि महाराष्ट्र में नौ प्रतिशत बच्चे पढ़ाई पूरी होने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं, हालांकि राष्ट्रीय औसत पन्द्रह प्रतिशत है। बच्चों के संग शिक्षक की सेल्फी का नजारा यह है कि देश में 85 प्रतिशत बच्चे ही पढ़ाई करते हैं और उनमें से अब नई शिक्षा योजना के अंतर्गत आठवीं कक्षा तक एक बड़े प्रतिशत का हाल यह है कि वे रहते तो स्कूल में ही है पर स्कूल में रहते हुए भी स्कूल छोड़ने जैसी हालत में रहते हैं। उन्हें कुछ आता-जाता नहीं। स्कूलें अपने नियमों में बंधी हैं। बच्चों को कुछ आए या नहीं आए, यहां तक कि बच्चा स्कूल आए या नहीं आए उसे फेल नहीं किया जा सकता। बच्चा स्कूल नहीं आता है तो उसे प्यार से समझाना है। एक शिक्षक के पास बच्चों को समझाते समझाते प्यार की इतनी कमी हो चुकी है कि बच्चा शिक्षक के प्यार को प्यार समझता ही नहीं। वह तो समय से पहले ही किसी दूसरे प्यार के चक्कर में खोया हुआ है। बच्चों के माता-पिता और अभिभावकों के पास अब इतना समय ही कहां कि वे बच्चे का भविष्य देखें। बच्चों का भविष्य देश से जुड़ा है और देश का भविष्य बच्चों से। भविष्य के साथ सेल्फी ले ही लो भैया।

० नीरज दइया 

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