डिस्काउंट किसे अच्छा नहीं लगता। बड़ा डिस्काउंट हो या छोटा बस होना चाहिए। बिना डिस्काउंट के मजा नहीं आता। मजा तो आता है फेस्टिव सीजन की महासेल में, जिसमें डिस्काउंट ही डिस्काउंट मिलता है। कितना अच्छा लगता है जब डिस्काउंट पर डिस्काउंट मिले। यदि डिस्काउंट पर डिस्काउंट और डिस्काउंट पर डिस्काउंट मिलता हो, तो लगता तो बहुत अच्छा है। माना कि ये गणित का खेल नहीं आता, पर फिर भी हमें फायदा है। फ्लेट डिस्काउंट का खेल निराला है कि हर कोई इसके चक्कर में नहीं आता है।
किसी भी प्रॉडक्ट्स पर भारी डिस्काउंट हो तो खरीदने का मन बन ही जाता है। अरे वह आम जनता ही क्या जिसे कोई धमाका नहीं सुनाई दे। धमाका करने वाले तो यहां तक कहते हैं कि अब 80% तक का डिस्काउंट है! तो भी आप क्या सोये रहेंगे। यह तो पागलपन है- ‘जागो।’ यह सोने का समय नहीं है। डिस्काउंट के पीछे ‘पागल’ होने का समय है। मैं तो ऐसे अवसर की घोषणा होने पर रात के बारह बजे सबसे पहला ग्राहक बनने का सुख लूटना चाहता हूं। कोई भी ऑफर ऐसे ही नहीं आता और तुरत-फुरत नहीं आता। इन सब के लिए खूब पब्लिसिटी होती है। फिर भी ये कुछ पब्लिक सोती ही रहती है। सेल बंद होने के बाद कहती है- `अरे हमे तो बताया ही नहीं, वर्ना हम भी मंगवा लेते।'
ज्ञानियों को तो कुछ कहने समझाने की जरूरत होती नहीं और अज्ञानियों को कुछ कह समझा कर समय क्यों खराब किया जाए। जाहिर है ज्ञानी अपने आप समझेंगे और अज्ञानी को हम समझा नहीं सकते। ये पंच चाचा ने हमारे घर में सब कुछ उलटा-पुलटा कर दिया है। मैं कुछ भी मंगवा लूं, उनको कभी पसंद नहीं आता। कुछ खरीद तो मैं रहा हूं, इसमें पैसे भी मेरे लग रहे हैं और परेशानी उनको होती है। उनकी परेशानी का यह हाल है कि मेरे बेटे को भी अपनी तरफ मिला लिया है। कहते शर्म आती है कि आजकल घर में मेरा बेटा ही मेरा बाप बनता है। मुझे वह समझता है कि ये डिस्काउंट उल्लू बनाने का तरीका है। यही सुनना रह गया था। कलयुग आया है कि बेटा बाप को उल्लू कहने में भी संकोच नहीं करता है।
मैं मूर्ख हूं या समझदार, यह तो पंच चाचा या मेरा बेटा मुझे समझा नहीं सकते है। मैं जो हूं सो हूं। इसमें दादा-पोता भले ही एकमत हो जाए कि डिस्काउंट वाले पुराना माल बेचते हैं। वे दाम बढ़ा कर डिस्काउंट देते हैं। डिस्काउंट में भी उनका फायदा होता है। ये बाजारवाद है। माल बेचने के तरीके हैं। आपको एक बार इस जाल में फंसा कर फिर लूटते जाएंगे। अब मैं क्या-क्या बताऊं। मैंने तो तय कर लिया कि इन बातों को नहीं मानना, तो नहीं मानना। सुनकर बहुत-सी बातें हम अनसुनी करते हैं, तो ये भी अनसुनी की जा सकती है। किसी भी बात को अनसुना करना सभी को आता है। अगर हम सभी बातें सुन-सुन कर अपने भीतर रखने लग जाएं, तो हमारी मैमोरी फुल नहीं हो जाएगी! स्टोरेज की भी एक सीमा होती है। हमारी भी सीमा है। इसलिए हम सुनाने वालों को अपनी सीमा में नहीं आने देते हैं, और अगर कोई जबरदस्ती आ भी जाता है तो हमारे लिए एक कान से सुनना और दूसरे से निकलने का विकल्प सुरक्षित है।
देश ने इतनी तरक्की की है कि भले व्यापरी पूरे देश में जीओ और ‘डाटा’ फ्री पाओ स्कीम लाएं हैं। फिर भी ये ज्ञानियों और डेढ़ हुस्यारों की जमता है कि हर समय हर काम में खोट देखती है। माना कि तुम्हारी बात सही हो सकती है कि कोई डिस्काउंट देने वाला अपनी रेट को बढ़ा कर डिस्काउंट देता है और हमें किसी न किसी तरह लूटता है पर अब इसमें लूट कैसी जब सब कुछ फ्री है। अरे अबकी बार जब सब कुछ फ्री में है तो भला इसमें क्या ठगी है?
० नीरज दइया
किसी भी प्रॉडक्ट्स पर भारी डिस्काउंट हो तो खरीदने का मन बन ही जाता है। अरे वह आम जनता ही क्या जिसे कोई धमाका नहीं सुनाई दे। धमाका करने वाले तो यहां तक कहते हैं कि अब 80% तक का डिस्काउंट है! तो भी आप क्या सोये रहेंगे। यह तो पागलपन है- ‘जागो।’ यह सोने का समय नहीं है। डिस्काउंट के पीछे ‘पागल’ होने का समय है। मैं तो ऐसे अवसर की घोषणा होने पर रात के बारह बजे सबसे पहला ग्राहक बनने का सुख लूटना चाहता हूं। कोई भी ऑफर ऐसे ही नहीं आता और तुरत-फुरत नहीं आता। इन सब के लिए खूब पब्लिसिटी होती है। फिर भी ये कुछ पब्लिक सोती ही रहती है। सेल बंद होने के बाद कहती है- `अरे हमे तो बताया ही नहीं, वर्ना हम भी मंगवा लेते।'
ज्ञानियों को तो कुछ कहने समझाने की जरूरत होती नहीं और अज्ञानियों को कुछ कह समझा कर समय क्यों खराब किया जाए। जाहिर है ज्ञानी अपने आप समझेंगे और अज्ञानी को हम समझा नहीं सकते। ये पंच चाचा ने हमारे घर में सब कुछ उलटा-पुलटा कर दिया है। मैं कुछ भी मंगवा लूं, उनको कभी पसंद नहीं आता। कुछ खरीद तो मैं रहा हूं, इसमें पैसे भी मेरे लग रहे हैं और परेशानी उनको होती है। उनकी परेशानी का यह हाल है कि मेरे बेटे को भी अपनी तरफ मिला लिया है। कहते शर्म आती है कि आजकल घर में मेरा बेटा ही मेरा बाप बनता है। मुझे वह समझता है कि ये डिस्काउंट उल्लू बनाने का तरीका है। यही सुनना रह गया था। कलयुग आया है कि बेटा बाप को उल्लू कहने में भी संकोच नहीं करता है।
मैं मूर्ख हूं या समझदार, यह तो पंच चाचा या मेरा बेटा मुझे समझा नहीं सकते है। मैं जो हूं सो हूं। इसमें दादा-पोता भले ही एकमत हो जाए कि डिस्काउंट वाले पुराना माल बेचते हैं। वे दाम बढ़ा कर डिस्काउंट देते हैं। डिस्काउंट में भी उनका फायदा होता है। ये बाजारवाद है। माल बेचने के तरीके हैं। आपको एक बार इस जाल में फंसा कर फिर लूटते जाएंगे। अब मैं क्या-क्या बताऊं। मैंने तो तय कर लिया कि इन बातों को नहीं मानना, तो नहीं मानना। सुनकर बहुत-सी बातें हम अनसुनी करते हैं, तो ये भी अनसुनी की जा सकती है। किसी भी बात को अनसुना करना सभी को आता है। अगर हम सभी बातें सुन-सुन कर अपने भीतर रखने लग जाएं, तो हमारी मैमोरी फुल नहीं हो जाएगी! स्टोरेज की भी एक सीमा होती है। हमारी भी सीमा है। इसलिए हम सुनाने वालों को अपनी सीमा में नहीं आने देते हैं, और अगर कोई जबरदस्ती आ भी जाता है तो हमारे लिए एक कान से सुनना और दूसरे से निकलने का विकल्प सुरक्षित है।
देश ने इतनी तरक्की की है कि भले व्यापरी पूरे देश में जीओ और ‘डाटा’ फ्री पाओ स्कीम लाएं हैं। फिर भी ये ज्ञानियों और डेढ़ हुस्यारों की जमता है कि हर समय हर काम में खोट देखती है। माना कि तुम्हारी बात सही हो सकती है कि कोई डिस्काउंट देने वाला अपनी रेट को बढ़ा कर डिस्काउंट देता है और हमें किसी न किसी तरह लूटता है पर अब इसमें लूट कैसी जब सब कुछ फ्री है। अरे अबकी बार जब सब कुछ फ्री में है तो भला इसमें क्या ठगी है?
० नीरज दइया

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