16 दिसंबर, 2016

नियम वहां, जहां कोई पूछे

सुबह-सुबह का वक्त था। मैं किसी काम से मोटर साइकल पर कहीं जा रहा था। हाइवे के मोड़ के करीब था, इतने में एक मोटर साइकिल ने ओवरटेक किया। दो सज्जनों की यह सवारी तेज गति से आगे निकली तो ध्यान जाना स्वभाविक था। मुझे गुस्सा आया कि एक तो बिना हेलमेट के हाइवे पर छावनी क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं, और गति भी आवश्यकता से अधिक है। पर यह क्या मैंने देखा कि चालू बाइक पर दोनों सज्जनों ने जल्दी-जल्दी अपने-अपने हेलमेट पहन लिए। ओह, कितने चालक है ये लोग। पता है कि यहां चैकिंग हो सकती है, तो नियम में आ गए। मैंने चलते-चलते अपने गतिमान मन को समझाय कि हे पगले मन ! ऐसे कितनों की सोच करेगा। नियम तो सब अपनी जगह होते हैं। उनको कब-कहां मानना है अथवा कहां नहीं मानना, इसका निर्धारण खुद नियम तो करते नहीं है। यातायात का एक नियम मानकर मैं महान बन गया, और उपदेश की मुद्रा में पहुंच गया हूं। मैंने विचार किया कि मैं भी घर के आस-पास कहीं निकलता हूं तो हेलमेट कहां पहनता हूं। नियम भंग तो भंग ही है, चाहे कभी भी करो। बात हमारी सुरक्षा और भले की है। फिर भी हम जो हैं, अपने फायदे के अनुसार ही नियमों का पालन करते हैं।
पंच काका कहते हैं कि सरकार खुद चाहती है कि लोग नियम तोड़े। जिसे बर्बाद होना है उसे बर्बाद होने देना क्या है? नहीं समझे, देखो बीड़ी-सिगरेट और वाइन आदमी की स्वास्थ्य को बर्बाद करती है। ठीक बात है तो कहो- हां। तो पंच काका का मानना है कि स्वास्थ्य के लिए जो हानिकार चीजे हैं, उन पर सरकार रोक क्यों नहीं लगाती है। उन्हें बंद क्यों नहीं करती है। मैंने कहा कि वहां चेतावनी लिखी रहती है फिर भी लोग अगर सेवन करते हैं तो सरकार की गलती कहां है। पंच काका को मेरा बीच में बोलना बर्दाश्त नहीं होता। पंच काका क्या किसी भी बड़े-बुजुर्ग को अपनों से छोटों का बीच में बोलना सहन नहीं होता। उन्होंने जबाब दिया कि बहुत बारीक अक्षरों में लिखा होता है। उन्हें पढ़ने के लिए हम आंखें कहां से लाएं? इतने बारीक अक्षरों में लिखने से नियम का पालना हो गया पूरा। बीड़ी-सिगरेट, पान-जर्दा या फिर दारू-मारू ये सब बंद क्यों नहीं करते हो। जब ये चीजें गुणकारी-लाभप्रद नहीं, फिर बेचने-खरीदने की पाबंदी क्यों नहीं। माना कि पाबंद का अर्थ पूरी रोक नहीं होता। पाबंदी पूरी पाबंदी तो कभी होती ही नहीं। एक राज्य में शराबबंदी के चलते लोग सैर-सपाटा करने दूसरे राज्य में चले आते हैं, अपने आनंद को मानाते हुए लौटते हैं। चोरी-छिपे जो गोरखधंधा होता है, वह तो होता ही रहेगा। सारी पाबंद और बंदी बस कुछ लोगों को दिखाने के रास्ते हैं। हाथी के हांत हैं। नोटबंदी में बुरा हाल हुआ तो गरीबों का हुआ, पर अमीरों के आनंद में कौनसा खलल पड़ा। पंच काका बोले- सची बात है कि नियमों में ही कुछ ऐसा किया-धरा होता है कि रामजी बच कर निकल जाते हैं, और श्यामजी फस जाते हैं। एक बच के निकल जाए और दूसरा फस जाए, तो इसे कहते हैं- राम राज्य? मैंने फिर प्रतिवाद किया कि काका यह तो व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर है कि उसे क्या आता है और क्या नहीं आता। मान लो किन्हीं दो आदमियों को पानी में फैंका जाता है, तो एक निकल कर बाहर आ जाए और दूसरा डूब जाए तो इसे क्या कहोगे? जो निकल आया है, उसे तैरना आता था और जो डूब गया वह लल्लू था जो तैरना नहीं जानता था। यह सीधा-सा सिद्धांत है कि नियमों के जाल से जिसे बचना आता है वह बच जाता है और जो बचना नहीं जानता वह बेचार फस जाता है। चाचा जी, नियम तो बेचारे उस जाल की तरह है जिसे एक बहेलिये ने बिछाया तो पक्षियों को पकड़ने के लिए था, पर वे होसियार निकले। पूरे जाल को ही लेकर उड गए। अब चाचा जी हंसे और बोले- यह बात जोरदर कही।

- नीरज दइया

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