14 दिसंबर, 2016

एबी कुत्ता और खेबी बिल्ली

मुझे याद है कि पंच काका और काकी जी में इस बात को लेकर लड़ाई हुई थी कि कुत्ता खरीदें या कुतिया। फैसला टॉस से हुआ। हमारे घर एक कुत्ता आया। मैंने पूछा- काका इसका नाम क्या रखें? वे बोले- नाम में क्या है, कुछ भी रख लो। चलो एबी रख लेते हैं। पर देखना तुम्हारी काकी जरूर खेबी करेगी। यह नाम चल निकला, बाद में मेरे लड़के ने बताया कि एबी तो बहुत अच्छा नाम है। उसका तर्क था कि दक्षिण अफ्रीका के सबसे तेज़ शतक लगाने वाले क्रिकेट खिलाड़ी का नाम भी एबी है। यह पंच काका ने सुना तो जोर से हंसे और बोले- अपने अमिताभ बच्चन का सोर्ट नेम क्या है भैया? मैं थोड़ा नाराज हुआ, कहा- यह बात ठीक नहीं है। एबी हमारा कुत्ता है, और उसके नाम से किसी का कोई लेना-देना नहीं है।
हमने कुत्ता क्या लिया कि बधाई देने वालों का तांता लग गया। लोग मुबारकबाद देने लगे तो देते ही गए। वे गिफ्ट लाते और कितना अच्छा लगा हमें। सब एबी-एबी करते हुए हमारे कुत्ते को देख कर खुश होते। उन्हें खुश देख कर हम खुश होते। यही तो जीवन है। इसमें खुशियां ढूंढ़नी पड़ती है। उसके बाद तो यह सिलसिला चला जो भी घर आता, एबी से बिना मिले नहीं जाता। उसके बारे में बातें करने वालों की संख्या दिन-दूनी और रात-चौगुनी होने लगी। इस संख्या का हमें पता तब चला जब एबी बीमार हुआ। पंच काका और एबी के प्रशंसक बीमार एबी का हालचाल जानने घर आने लगे। आपके कुत्ते के प्रशंसक कैसे हैं, यह आप जाने। हमारे वाले तो देखिए- कोई सेव ला रहा है, कोई केले, कोई बिस्किट, कोई नमकीन और मिठाई तक ला रहा है। मैंने एक शरारत की। एक आगंतुक से पूछ लिया- यह सब क्यों लाएं है? एबी तो कुछ खाता नहीं। वे बोले- कोई बात नहीं। आप सब तो हैं ही। हम सब थे जो एबी के नाम से आने वाली चीजों को ग्रहण कर रहे थे। पंच काका के मन में क्या था, यह तो मैं नहीं जानता पर मैं सोच रहा था- हम तो कभी किसी के घर ऐसा कुछ लेकर गए नहीं, फिर ये सब कोई बोझ उतार रहें या चढ़ा रहे हैं।
एबी के जीवन का तीसरा परिच्छेद आया। पर यह इतना जल्दी आएगा हमने सोचा नहीं था। बेहद दुख और भारी मन से हमने सभी को सूचित किया- एबी इज नो मोर। फिर से वही लोग जो पहले आए थे, शोक प्रदर्शित करने के लिए आने लगे। दुख और संकट की घड़ियों में भी उन आने वालों में से कुछ ऐसे भले लोग भी आते थे, जो कुछ न कुछ छोटा-मोटा उपहार ले आते। वे कहते- किसी के यहां खाली हाथ जाना हमें अच्छा नहीं लगता। यह हमारा सम्मान था कि उनका सम्मान था। पर कुछ न कुछ सामान लाने वाले हमें बहुत अच्छे लगने लगे। बाद में तो इतने अच्छे लगने लगे कि खाली हाथ आने वालों को हम देखते और मन ही मन कहते कि आप भी इन लोगों से कुछ प्रेरणा क्यों नहीं लेते।
पंच काका और काकी दोनों बैठे थे कि उनका कोई अजीज मित्र आया। वह बोला- अब एबी के बिना आप का मन कैसे लगेगा। आप में आपस में कितना प्यार हो गया था। वह आगे बोला- मुझे याद है आप मेरे घर के मूर्हत और खाने पर आने वाले थे, पर नहीं आए। बाद में पता चला कि एबी बीमार हो गया था। तभी मैं सोच रहा था कि आप जरूर आते, पर ऐसी स्थिति में कैसे आते। मेरा एक सुझाव है कि आप अपना मन बहलाने के लिए कोई दूसरा कुत्ता-कुत्ती या बिल्ला-बिल्ली खरीद लो। पंच काका सहमत हो गए, मुझे बेहद आश्चर्य हुआ। यह क्या बिल्ला खरीदें या बिल्ली इस पर टॉस भी हो गया। इस बार काकी की जीत हुई और तय हुआ हम बिल्ला नहीं बिल्ली खरीदेंगे। मैं ऐसा मौका क्यों छोड़ने वाला था, तुरंत प्रकट हुआ बीच में बोला- काका, हम बिल्ली का नाम खेबी रखेंगे।
- नीरज दइया
 

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