03 दिसंबर, 2016

अनपढ़ से ग्रेजुऐट रहना प्लस खाना

हा जाता है कि कवि कबीर का भाषा पर जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है, उसे उसी रूप में कहलवा लिया। सीधे–सीधे, नहीं दरेरा देकर। भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार–सी नज़र आती है। आज जब कबीर नहीं है, किंतु उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने वालों में विज्ञापनों का बड़ा योगदान समझा जा सकता है। भाषा को लाचार-सा कर, कुछ का कुछ कहने और बनाने का साहस अब केवल विज्ञापनों में ही बचा है। ऐसी हिम्मत कि कुछ का कुछ हो जाए, पर एक बार देखना-सुनना पड़ेगा। झटका लगेगा। फ़क्कड़ाना प्रकृति के लोग भी लप-लप करती भाषा से कुछ का कुछ कर जाते हैं। ये बाजारवाद है। जहां वर्षों पहले कबीरा जी खड़े थे, उसी बाजार की बात है। यह बात अलग है कि अब खैर किसी की नहीं। सभी को गिरफ्त में करने के जतन कर लूटने और सामने वाले को लुटता देखने में खैर समझी जाती है। बैर और दोस्ती से परे सब से अपना उल्लू सीधा करने की प्रवृति का उत्कर्ष इस कलिकाल में देखा जा सकता है। कहते हैं कि विज्ञापन का काम तो वस्तु को बेचना है। इसमें गलत-सही नहीं देखा जाता। क्या और कुछ नहीं देखा जाता है। यहां भाषा-व्याकरण और नियमों का भले ही कचरा हो जाए, पर कचरे को भी बेचने का हुनर विज्ञापनों में होना चाहिए।
सब जानते हैं कि अगर तेल चाहिए तो तिलों से निकाला जाएगा। यह तरक्की का कमाल है कि बिना तिलों के भी तेल निकाला जा रहा है। ऐसा भी हो सकता है कि जहां दस-बीस प्रतिशत की गुंजाइश हो वहां अस्सी-नब्बे या फिर पूरे सौ प्रतिशत तेल निकाला जाता है। हे हुनरमंदो ! यदि ठगना ही है तो किसी सेठ-साहूकार और दौलतमंद के पास जाओ, पर ये जो तुम बेरोजगारों को घाणी में डाल कर तेल निकालने का अद्भुद कौशल दिखाते हो, उसमें तनिक तो संकोच-शर्म करो। गली में एक पेंपलेट बांटा गया। हालत यह हो गई है कि हर घर में दूसरा-तीसरा बेरोजगार है। जिसे रोजगार प्राप्त है, वह भी संतुष्ट नहीं है। मान लें, यदि कोई मास्टर जी बन गए हैं, तो बरसों कलेक्टर बनने के सपनें देखते हुए मासूम बालकों के साथ अन्याय करते हैं। भविष्य-निर्माता मास्टर जब तक अपने सारे सपनों को देखते हुए उम्र की सीढ़ियां चढ़ता जाता है, तब तक उसे अपने असली काम से सरोकार नहीं होता। बाद में ओवरऐज होने पर वह मन बनाने की जगह टूटे सपनों के मातम में खोया रहता है। उस पेंपलेट में नौकरी के कुछ सपने थे। बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- अनपढ़ से ग्रेजुऐट रहना प्लस खाना।
पंच काका ने दूर से देखा तो बोले बिना नहीं रह सके- यह तो फुसलाने वाली भाषा है। दिखाना जरा ये पर्चा क्या लिखा है? मैंने उन्हें पर्चा थमाया तो वे फिर बोले- सब बकवास है, मूर्ख बनाते हैं। अनपढ़ के लिए काम है और ग्रेजुऐट के लिए भी काम है, साथ में खाना-पीना और रहना फ्री में देंगे। ये नहीं हो सकता। असल में बेरोजगारों को समझ लेना चाहिए कि ग्रेजुऐट से अनपढ़ रहना और खाना-पीना अच्छी बात है। ग्रेजुऐट जब देश में बेरोजगार है, तो बेचारे अनपढ़ जाए तो कहां जाए। हालत यह हो गई है कि अनपढ़ों की नौकरियां तो ग्रेजुऐट और पोस्ट ग्रेजुऐट छीन लेते हैं। बेरोजगारी की भयावयता से पढ़ा-लिखा आदमी आज कुछ भी करने को तैयार है। सब जगह हालत यह है कि एक आवाज लगाओ, नौकरी के लिए हजार दौड़े चले आते हैं। मुझे पता था कि जब पंच चाचा का भाषण चालू हो जाता है तो रुकता नहीं। मैंने रोकने लिए टोका- तो काका, आप ही बताओ हल? काका बोले- अब कहां रहे हल? पहले खेत हुआ करते थे, तो हल भी होते थे। अब तो खेत भी अपना नहीं, फिर काहे का हल? और कैसा हल? सब बेहल है।

० नीरज दइया

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