29 जनवरी, 2018

आलोचना में अपना-पराया सब व्यर्थ की बातें हैं : डॉ. दइया

साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत राजस्थानी कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया से संवाद ० नवनीत पाण्डे
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• आपको साहित्य अकादेमी के सर्वोच्च सम्मान के साथ-साथ पिछले साल मिले दर्जन भर पुरस्कारों, वे भी इतनी कम उम्र में, आपको बहुत- बहुत बधाई! इतने पुरस्कार-सम्मान कैसे मिल गए?
• पता नहीं। प्रत्येक पुरस्कार की अपनी एक प्रक्रिया होती है। साहित्य अकादेमी में तो पुरस्कारों के लिए आवेदन भी मांगे नहीं जाते हैं। उनकी एक गोपनीय प्रक्रिया है। कभी-कभार प्रकाशक सूचना दे देते हैं कि किस किस किताब को साहित्य अकादेमी ने खरीदा है। इससे एक संभावना बनती है कि पुरस्कार के अंतिम दौर में कौन-सी किताबें पहुंची है। अनेक किताबों के बीच से किसी एक किताब को चयनित करना सरल काम नहीं है। यह निर्णायकों का सामूहिक निर्णय होता है। ऐसे में जिसका चयन होता है उसे लगता है कि निर्णय ठीक हुआ है, और जो वंचित रह जाते हैं उनको लगता है यह गलत हो गया। मेरा मानना है कि अगर कोई ढंग का लिखता है तो उसे पुरस्कार मिलेगा, हां कभी देर हो सकती है पर यहां अंधेर नहीं है। उम्र के आधे मुकाम पर मैं पहुंच चुका हूं और आपको 50 की उम्र कम लगती है... खैर आपकी बधाई के लिए आभारी हूं।
• आप के लेखन को देख कर आप ही की तरह बहुमुखी विलक्षण प्रतिभा असमय हमें छोड़ गए आपके पिता कवि-कथाकार सांवर दइया याद आते हैं, उन्हें 35 वर्ष की उम्र में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला, उनके बाद आपको अब 50 की उम्र में... कैसा लग रहा है?
• कोई भी बेटा कभी अपने बाप की बराबरी नहीं कर सकता है। कम से कम किसी एक जीवन में तो हर्गिज नहीं। अपने पिता सांवर दइया जितना बड़ा लेखक मैं नहीं हूं। वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे और यह उनका आशीर्वाद है कि मैं लेखन के क्षेत्र में कुछ करने का प्रयास करता हूं। वे 44 वर्ष ही लेकर आए पर वह उनके जाने की उम्र नहीं थी। वे होते तो आज तुम से सवाल करते कि नवनीत तुम्हें भी तो पुरस्कार मिले हैं फिर तुम पुरस्कारों के खिलाफ क्यों हो?
• मैं पुरस्कारों के खिलाफ नहीं हूँ, अगर कोई लेखक ईमानदारी से काम करता है, उसे स्वीकृति-सराहना, सम्मान मिलना चाहिए लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि आज पुरस्कारों-सम्मानों की गरिमा को ठेस पहुंचायी जा रही है।
• हम जिस दौर में पहुंच चुके हैं उसमें शब्द अपने अर्थ खोते चले जा रहे हैं या कहें कि शब्द खोखले, बेजान और अर्थहीन हो चुके हैं। ऐसे में हमें उनकी गरिमा के कार्य करना है। मैं मानता हूं कि साहित्य और समाज का दायित्व आज पहले से अधिक हो गया है। पुरस्कारों-सम्मानों की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले कुछ स्वार्थी किस्म के लोग हमारे बीच हैं, जो अपने लाभ के लिए ऐसा कुछ करते हैं कि पूरे साहित्य-समाज की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है। किंतु पुरस्कार और सम्मान की गरिमा बनी रहनी चाहिए।
• पुरस्कारों के लिए मारामारी, लॉबिंग करना हद दर्जे तक घटियापन पर उतर आना भी तो होता है?
• आज हमारे चारों तरफ बाजार का बोलबाला है। हम सब नए बाजारीकरण के दौर में हैं। ऐसे में सभी तरह के रंग रूप यहां देखने को मिलते हैं तो हमें इसे सहजता से स्वीकारना चाहिए। पुरस्कार किसी की श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है। यह महज एक बार समाज का ध्यान खींचता है। इसे सामाजिक स्वीकृति कह सकते हैं। साहित्य का इतिहास गवाह है कि वह पुरस्कार को एक ब्यौरे की भांति दर्ज करता है जब कि रचनाओं का उसमें विधिवत उल्लेख होता है। चर्चा किसी पुरस्कार की बजाय रचना पर होनी चाहिए।
• साहित्य अकादेमी राजस्थानी पुरस्कारों के इतिहास में राजस्थानी की बात करें तो डॉ कुंदन माली के बाद केवल आपने आलोचना में यह पुरस्कार पाया है। डॉ. माली पुरस्कार मिलने के बाद से लेखन से नदारद हैं, तो क्या अब आप भी...?
• ऐसा नहीं है। डॉ. कुंदन माली लिखते रहे हैं और मैं भी इस पुरस्कार के बाद लिखता रहूंगा। कोई पुरस्कार किसी लेखक की मंजिल नहीं होता है। हम जो कुछ कहते हैं हमारी जानकारी के आधार पर कहते हैं और उसमें सदैव संभवानाओं को बनाए रखना चाहिए।
• पुरस्कारों के सिलसिले में यह देखा गया है कि पुरस्कार का अभिप्राय लेखक की संभावनाओं का अंत। ऐसा क्यों हो रहा है?
• पुरस्कार तो संभावनाओं का सम्मान है उसे अंत नहीं मानना चाहिए। आपके संकेत कुछ मामलों में सही भी हैं किंतु कुछ अपवाद रूप छोड़ दें तो पाएंगे कि सम्मान और पुरस्कार ने नई ऊर्जा का संचार किया है। वैसे संभावनाओं के अंत पर भी अनेक संभावनाएं शेष होती है। साहित्य में अंत जैसा कुछ नहीं होता, वह तो स्वयं अनंत है।
• राजस्थानी में आपने पुरस्कारों और लेखक का एक रिकार्ड बनाया है। पुरस्कारों के बारे में अक्सर आरोप लगते हैं कि इनके देने-लेने के पीछे साहित्येत्तर कारण होते हैं। वास्तव में ऐसा होता है?
• आपके सवाल में ही जबाब छिपा है। पुरस्कारों के देने लेने में यदि साहित्येत्तर कारण होते भी होंगे तो क्या हर बार यह संभव होता होगा। अगर हर बार यह संभव नहीं होता तो फिर पुरस्कारों और लेखन का रिकार्ड कैसे बन सकता है? आरोप हमेशा लगने के होते हैं और सच्चाई किसी आरोप की परवाह नहीं करती। अगर कोई किसी पर आरोप लगता है और आरोप सच्चा है तो उसे साबित किया जाना चाहिए। लेखक का काम ही सच्चाई को सामने लाने का होता है।
• क्या आपको इस बार साहित्य अकादेमी से इस निर्णय की उम्मीद थी?
• एकदम नहीं थी। इस वर्ष के लिए तो बिल्कुल नहीं थी। मैंने इस विषय में सोचा भी नहीं था। जब यह सूचना मिली तो मुझे आश्चर्य हुआ और खुशी भी हुई।
• अकादेमी इतिहास में क्षेत्रीय भाषा में शायद यह पहला ही उदाहरण है कि एक शहर में लगातार तीन वर्षों से पुरस्कार आ रहे हैं, सवाल उठने, उठाने स्वाभाविक हैं, आप क्या कहते हैं?
• लगातार चार वर्ष और पांच वर्ष भी हो सकते हैं। क्यों कि साहित्य अकादेमी यह पुरस्कार किसी शहर को नहीं देती है। मैं नहीं जानता कि आपको पता है या नहीं, पर साहित्य अकादेमी केवल किताब और लेखक के नाम के साथ अपना सर्वेक्षण करती है। एक शहर का यह संयोग बना है कि मधु आचार्य ‘आशावादी’, बुलाकी शर्मा और नीरज दइया बीकानेर में रहते हैं।
• राजस्थानी में बीकानेर और जोधपुर संभाग में अधिक लेखन हो रहा है, प्रांत के बाकी हिस्सों में बहुत कम... ऐसा क्यों है?
• राजस्थानी में अधिक से अधिक लेखन की आवश्यकता है और राजस्थान के प्रत्येक शहर में लेखन हो रहा है। आज सूचना तंत्र और मीडिया के विकास के कारण छोटे छोटे गांवों-कस्बों से लेखक आ रहे हैं। तुलनात्मक रूप से बीकानेर-जोधपुर संभाग आगे हो सकते हैं किंतु वह दिन दूर नहीं जब अन्य संभागों के लेखक भी अधिक सक्रिय होंगे।
• आलोचना की अक्सर निंदा होती है, आलोचकों को प्रतिष्ठा और पुरस्कार कम मिलते हैं। ऐसा क्यों?
• आलोचना सहन करने की क्षमता लेखकों में नहीं है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि आलोचकों में भी भय रहता है कि संबंध खराब हो जाएंगे। आलोचक और लेखक सभी सामाजिक प्राणी ही तो है। समाज में अपना-पराया सब होता है। द्वंद्व यह है कि आलोचना में अपना-पराया सब व्यर्थ की बातें हैं। ऐसे में आलोचना की निंदा होना स्वभाविक है।
• आपकी आलोचना में आलोच्य लेखकों और कृतियों के चयन को लेकर कुछ लेखकों की असहमति रही है और सवाल उठाए गए हैं, इसका क्या कारण है?
• सहमति और असहमति एक ही सिक्के के दो पक्ष है। आलोचना में ऐसा होना भी चाहिए अन्यथा सब ठीक है तो फिर आलोचना होगी किस की। साहित्य में प्रत्येक आलोचक अपने दृष्टिकोण से सही कार्य करने का प्रयास करता है। हरेक का अपना नजरिया होता है। कोई भी चयन कभी भी निरपेक्ष हो नहीं सकता है। मैं आप से ही कहता हूं कि अगर आप मुझे कोई चयन देंगे तो क्या उस पर सभी की सहमति संभव है क्या? आरोप लगाने से पहले हमें यह सब सोचना-विचारना चाहिए। हवा में बातें कहने वाले बहुत मिलते हैं पर आलोचना में जमीन पर खड़े होकर यर्थाथ को देखना होता है।
• आलोचना के लिए आप किस आधार पर लेखक अथवा कृति का चयन करते हैं?
• आरंभ में तो मैंने संपादकों और मित्रों के आग्रह पर आलोचनात्मक आलेख लिखे जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। एक लंबी यात्रा से कुछ आलेखों का चयन मेरी किताब ‘आलोचना रै आंगणै’ में आप देख सकते हैं। ‘बिना हासलपाई’ के लिए कार्य करते हुए आदरणीय नंद भारद्वाज से लंबा संवाद रहा और इस किताब की रूपरेखा पहली से भिन्न बनी। राजस्थानी में आधुनिक कहानी को लेकर अनेक अंतर्विरोध और द्वंद्व की स्थितियां रही है। इस यात्रा में अनेक कहानीकारों का समायानुकूल सम्यक मूल्यांकन भी नहीं हुआ। ऐसे में यह प्रयास किया गया कि कहानी विधा पर एक विविध आयामों को लेकर बात हो, जिसका परिणाम आप देख रहे हैं। मैं किसी लेखक अथवा कृति के प्रति कोई पूर्वाग्रह लेकर नहीं चलता हूं, ‘आंगळी-सीध’ कृति में आप पाएंगे कि राजस्थानी उपन्यास की समग्र यात्रा को देखने-दिखाने और समझने का मेरा प्रयास है। इस से आप या अन्य कोई कितना सहमत अथवा असहमत होता है यह उसकी अपनी स्वतंत्रता है।
• आपने ‘नेगचार’ पत्रिका निकाली और वह खूब चर्चित हुई, फिर अकादमी की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ का भी संपादन किया। राजस्थानी में अब भी पत्रिकाएं कम है ऐसे में ‘नेगचार’ को फिर से आरंभ क्यों नहीं करते?
• पत्रिका निकालना अथवा संपादन का कार्य करना बहुत कठिन है। ‘नेगचार’ के संपादन की अपनी परिस्थितियां थीं। संपादन और सक्रिय लेखन दो भिन्न-भिन्न कार्य-क्षेत्र है। जो दोनों को साधते हैं वे निसंदेह महान हैं। क्योंकि इन दोनों में बहुत समय की आवश्यकता होती है। दिन-रात एक करना पड़ता है। किसी भी संपादक का महत्त्व किसी लेखक से कम नहीं आंका जाना चाहिए। संपादक यदि संपादन के नाम पर केवल प्राप्त रचनाओं को एकत्रित कर पत्रिका प्रकाशित कराएं तो मैं इसे अनुचित मानता हूं। संपादक में एक दृष्टि की अनिवार्यता होती है। उसे अनेक बार बहुत चयन और आग्रह करने होते हैं। संपादक ही दूरदर्शी होता है जो भविष्य के साहित्य का निर्माण को दिशा देता है। उदाहरण के लिए संपादक तय करता है कि किस कृति की समीक्षा होनी है और किस से होनी है। राजस्थानी की बात करें तो भाषागत अनेक समस्याओं और समरूपता के लिए विवेकवान संपादकों से उम्मीद है।
• आपने अनुवाद के क्षेत्र में भी बहुत काम किया है। किसी कृति अथवा रचना को अनुवाद के लिए चयन करने का क्या आधार रहता है?
• चयन का आधार मेरी आलोचनात्मक दृष्टि ही कही जा सकती है। हमारी यह अभिलाषा है कि अनुवाद के क्षेत्र में सभी भारतीय भाषाओं का आस्वाद राजस्थानी में आए। समकालीन भारतीय साहित्य की चर्चा हम ऐसे अनेक कार्यों को देखते हुए ही कर सकते हैं। अनुवाद से ही राजस्थानी की साहित्यिक महानता को हम भारतीय साहित्य में सिद्ध कर सकेंगे। अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, मोहन आलोक, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना आदि अनेक ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में अद्वितीय कार्य किया है। मैंने साहित्य अकादेमी के लिए भी अनुवाद किए हैं किंतु मैं किसी रचना का अनुवाद के लिए अनुवाद करने की तुलना में अपने तर्कों और इच्छा के आधार पर रचना लेता हूं। तकनीकी अनुवाद के पक्ष में मैं अनुवाद की मशीन नहीं बनता हूं।
• मैं तुम्हारी रचना का अनुवाद करता हूं तुम मेरी करो, क्या अनुवाद में यह टेक एंड गिव का सिद्धांत काम करता है?
• आप खुद अनुवाद करते हैं और सब स्थितियों से परिचित हैं। इसमें कितना सच है और कितना झूठ यह किसी से छिपा नहीं है। मैं इसे भाषा के लिए हितकर भी मानता हूं कि ऐसे में कुछ आदान-प्रदान ही होता है। अगर दो लेखकों में ऐसा अनुवंध होता है तो यकीन कीजिए कि कुछ काम ही सामने आता है। आपके इस टेक एंड गिव को एक साहित्यिक अनुष्ठान समझा जाना चाहिए जहां दो रचनाकार अपनी अपनी भाषा के लिए कुछ रचनात्मक काम ही करते हैं। परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से ऐसे सभी कार्य भाषा की क्षमता को और लेखकों की सक्रियता को बढ़ाते हैं।
• पढ़ने-लिखने की बजाय लेखक पुरस्कार बटोरने का जुगाड़ करते दिखायी देते हैं, वे भाषा की मान्यता के लिए भी खुल कर आगे क्यों नहीं आते हैं?
• बहुत से लेखकों का मत है कि सभी पुरस्कार बंद हो जाने चाहिए। पुरस्कार विजेता ही ऐसी घोषणाएं करते हैं। जिन्हें पुरस्कार कभी नहीं मिला उन से पूछेंगे तो पुरस्कार का महत्त्व समझ में आएगा। पुरस्कार बटोरने का जुगाड़ करने वाले किसी एक पुरस्कार के लिए अपना जुगाड़ कितनी बार करेंगे, बाद में वह बिना जुगाड़ वालों को मिलने हैं। साहित्य के क्षेत्र में और खासकर राजस्थानी अथवा हिंदी के क्षेत्र में लेखन से किसी लेखक ने आज तक अपने लिए महल नहीं बनाएं है। साहित्य थेंकलेस जोब है। बहुत बार मैं खुद से सवला करता हूं कि मैं क्यों लिखता हूं, मैं लिखता हूं कि बिना लिखे रह नहीं सकता हूं। अनेक लेखक भाषा के लिए खुल कर आगे आएं हैं, आप क्या चाहते हैं? भाषा मान्यता के लिए शर्म बेचकर नंगे हो जाएं! भाषा मान्यता का मुद्दा केवल हम लेखकों का नहीं राजस्थान के आम नागरिक का भी है।
• हमारे प्रदेश के आम नागरिकों में भी राजस्थानी भाषा-साहित्य और संस्कृति के प्रति क्या अनुराग दिखाई देता है?
• अनुराग है और उसी अनुराग को बनाए रखने लिए हम सभी सक्रिय हैं। आप गांव-गांव ढाणी-ढाणी जा कर देख सकते हैं कि लोगों को अपनी भाषा से अथाह प्यार है। राजस्थानी उनके लिए जीवन का सवाल है। बहुत से लोगों को तो हिंदी-अंग्रेजी आती ही नहीं। ऐसे में राजस्थान के जन जन से यह हनुमान जी की भांति अपेक्षा करना कि अपना हृदय चीर कर दिखाए कि भाषाई अनुराग है मेरी दृष्टि में बेमानी है। राजस्थान सरकार ने केंद्र को व्यापक समर्थक से प्रस्ताव भेज रखा है और आशा है केंद्र सरकार द्वारा जल्दी ही स्वीकृति मिल जाएगी।
• राजस्थान में रोजगार की भाषा हिंदी है फिर राजस्थानी में लिखना-पढ़ना जरूरी क्यों मानते हैं?
• आप और हम आने मां-बाप और पूर्वजों को क्यों याद करते हैं? मेरी कविता में मैंने लिखा है- राजस्थानी म्हारी रगत रळियोड़ी भाषा है। जो भाषा मेरे रक्त में घुली हुई है। जिस भाषा को मैं अपने भीतर दौड़ता हूं पाता हूं और जिससे होने से ही मुझे लगता है मेरा होना है। उसके लिए आप ऐसा सवाल करते हैं तो मुझे यह ठीक नहीं लगता है। हिंदी से मेरा शरीर बेशक पोषित होता है किंतु मेरी आत्मा का पोषण करने वाली मेरी मातृभाषा मेरा स्वाभिमान है। राजस्थानी को हम सभी ने आत्मिक रूप से स्वीकार किया है और हिंदी में जो भी काम-काज करते हैं अथवा किया है उसमें घुलने में हमें बहुत समय लगा है। बहुत बार अनेक राजस्थानी शब्दों के हिंदी पर्याय ही नहीं मिलते थे। आप राजस्थान के आम आदमी की हिंदी देखेंगे तो उसमें राजस्थानी का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देगा। प्राथमिक स्तर के स्कूल में जा कर देखें कि भाषा की समस्या से हमारे शिक्षक कैसे जूझ रहे हैं। आप या कोई भी सत्ता सरकर बालकों के मन की भाषा को मसोस नहीं सकते हैं।
• कुछ का कहना है कि राजस्थानी कोई स्वतंत्र भाषा ही नहीं है, यह तो बस कुछ बोलियां है?
• जो ऐसा कहते हैं उनकी अज्ञानता है। किसी भी मूर्ख को कभी लगता ही नहीं कि वह मूर्खता कर रहा है। भाषा विज्ञान का पूरा अपना आधार राजस्थानी के पक्ष में है। सदियों पुरानी बात है कि राजस्थानी की बोलियों को हिंदी की बोलियों के रूप में वर्णित किया गया। इक्कीसवीं शताब्दी में आप अगर अठारहवीं शताब्दी की जानकारी रखेंगे तो यह मूर्खता नहीं तो भला क्या है? और अगर राजस्थानी कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है तो साहित्य अकादेमी और अनेक विश्वविद्यालयों ने इसे मान्यता क्यों दी है। राजस्थान सरकार ने भी राजस्थानी की मान्यता के लिए जो प्रस्ताव एक मत से भेजा है क्या वह भी गलत है? राजस्थानी ने सदा हिंदी को बल दिया है और राजस्थानी की मान्यता से हिंदी अधिक बलशाली होगी। हम राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते हैं इसके बाद भी हम हिंदी के विरोधी कैसे हो गए...!
• अब तक राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलने का प्रमुख कारण क्या है?
• राजस्थानी भाषा मान्यता के लिए राज्य सरकार द्वारा प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जा चुका है। राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का निर्णय जल्द ही माननीय प्रधानमंत्री जी करेंगे। प्रदेश में राजस्थानी को अब तक लागू नहीं करने का सबसे बड़ा कारण राजनीति में हमारे नेताओं की इच्छा-शक्ति की कमी माना जा सकता है। राज्य सरकार चाहे तो राजस्थानी को दूसरी राजभाषा घोषित कर काम काज के लिए अनुमति दे सकती है।
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 आभार : भाई राजेश चड्ढ़ा जी & डॉ.हरिमोहन सारस्वत 'रूंख' जी

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