03 जनवरी, 2018

डॉ.नीरज दइया से पांच सवाल / डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

आलोचानात्मक कृति 'बिना हासलपाई' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार की घोषणा से कैसा अनुभव कर रहे हैं। बतौर लेखक पुरस्कार के क्या मायने हैं?
पुरस्कार और सम्मान किसे अच्छा नहीं लगता, किंतु इस घोषणा से मुझे आश्चर्य हुआ है। पिछली बार कहानीकार बुलाकी शर्मा और उससे पहले उपन्यासकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ को यह पुरस्कार मिला और संयोग से दोनों कथाकार बीकानेर के हैं। तीसरा पुरस्कार की इस घोषणा से यह प्रमाणित होता है कि अकादेमी और निर्णायकों की निगाह में पुस्तक सर्वोपरि होती है। वैसे कोई भी पुरस्कार सामाजिक प्रतिष्ठा के अतिरिक्त भला क्या महत्त्व रखता है? बतौर लेखक मैं मानता हूं कि यह पुरस्कार मेरे लिए नई जिम्मेदारियां लेकर आया है।
लिखने की प्रक्रिया क्या रहती है। हिंदी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में कई विधाओं को एक साथ कैसे साध पाते हैं?
जीवन जीना और लिखना मेरे लिए पर्याय है। लेखन के संस्कार मुझे मेरे लेखक पिता सांवर दइया से मिले हैं। मैं केवल लिखने के नहीं लिखता हूं, मेरे भीतर एक बेचैन लेखक रहता है जो मुझे लेखन के लिए बाध्य कर देता है। जैसे उसे प्रतिदिन लिखने के लिए अवकाश देना मेरी नियति है। राजभाषा हिंदी व मातृभाषा राजस्थानी दोनों भाषाओं में लिखने को मैं देशभक्ति और मातृभक्ति से रूप में देखता हूं। हिंदी मेरे पेट को पोषित करती है तो राजस्थानी मेरी आत्मा को। विधाओं का चयन परिस्थितियां और समय-सापेक्ष होता है।       
क्या आपको कभी ऐसा लगा कि आलोचना की राह में बहुत कांटे हैं?
बिल्कुल, बहुत कांटें हैं और ऐसे हैं कि चाह कर भी उन्हें बुहारा नहीं जा सकता है। आलोचना किसी रचना अथवा रचनाकार की तरफ एक अंगुली करने जैसा है। जब किसी दिशा में हम एक अंगुली करते है तो तीन अंगुलियां हमारी तरफ स्वतः हो जाती है। मैं खुद से तीन सवाल करने के बाद प्रतिपक्ष से सवाल किए जाने के पक्ष में हूं। मैं तीन नहीं आलोचन में अनेक सवालों से मुठभेड़ करता हूं। कृति और कृतिकार की दिशा से मैं चीजों को देखने-समझने का प्रयास करता हूं। किसी रचना के प्रति पूर्वधारणाओं की बजाए नए आयुधों की तलाश में रहता हूं। मेरा मानना है कि परंपरा और आधुनिक विकास-यात्रा में रचना के मर्म को जानना-समझना और मूल्यांकन करना हमारे पाठ के आनंद को छिन्न-भिन्न कर देता है। इसलिए सच्ची और खरी आलोचना तो सदा हमारे पाठक ही करते हैं।
खुद को मूल रूप से क्या मानते हैं- कवि, आलोचक, बाल साहित्यकार, व्यंग्यकार, अनुवादक या संपादक?
मूल रूप से तो मैं इन सब का एक आवास-स्थल हूं। मेरे भीतर का लेखक ही हर बार यह चयनित करता है कि वह क्या है और क्या लिखने वाला है, क्या करने वाला है।
राजस्थानी की मान्यता का सपना कब पूरा होगा?
जिस दिन पूरी राजस्थानी जनता जाग जाएगी, उसी दिन सपना पूरा होगा।

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