16 जनवरी, 2018

राजस्थानी कविताएं / नीरज दइया / अनुवाद: मदन गोपाल लढ़ा

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माँ के लिए कविता
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एक शब्द लिखता हूँ
कागज पर- माँ
                 और आगे कुछ नहीं लिखा जाता।
किसी पंक्ति के बीच
जब कभी किसी शब्द के साथ आ जाता है माँ
तब अटक जाती है पंक्ति, आगे कुछ नहीं लिखा जाता।


माँ शब्द से जो यात्रा शुरू होती है
वह यात्रा वहीं हो जाती है संपूर्ण।
जीवन में जैसे सब कुछ परोट लेती है
ठीक वैसे ही कविता-
                    माँ के आगे कुछ नहीं...।
बस टाबर के लीक-लकोळिया
माँ के लिए कविता होते हैं।
००००

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रक्त में मिली हुई भाषा
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राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में मिली हुई है
यह पंक्ति आपको कविता की पंक्ति नहीं लगे
                                              तो कोई बात नहीं है...
कविता से ज्यादा जरूरी होती है भाषा की संभाल
भाषा की हेमाणी लेकर खड़ा हूँ मैं...

आपके मुख से फूल बरसे-
‘मर गई है राजस्थानी भाषा, जला दिया राज ने उसे सालों पहले
नहीं है राजकीय मान्यता।’

कोई बात नहीं है-
जब मर गई है मेरी भाषा
फूल चुगने के लिए दूसरा कौन आएगा
यह पक्का है कि आप अपनी जीवंत भाषा से उतने नहीं जुड़े
                                                         जितना मैं अपनी भाषा से।

यदि यह बात नहीं होती सच
तो ऐसी विकट घड़ी में
फूल बरसाने से बचते आप।
यह पंक्ति आपको कविता की पंक्ति नहीं लगे
तो कोई बात नहीं है...
राजस्थानी भाषा राजस्थानियों के रक्त में घुली हुई है।
००००

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घर
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तुमने और मैंने पाला
हजार-हजार रंगो का
एक सपना।

तुम्हारी और मेरी निगाहों का
तुम्हारे और मेरे ख्वाबों का
एक घर हो
जो अब धरती पर
नहीं बनेगा कभी।

मां कहती है-
बेवकूफी है
घर होते बियावान में भटकना।
आग लगा दो-
ऐसे नुगरे सपनों को
जो थका डालते हैं
और करवाते हैं
व्यर्थ यात्रा।
००००
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रचाव के रंग

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रचाव के रंग
खतम नहीं हुए हैं अभी।

अभी तक बाकी है आनी
दुनिया की
कई कालजयी
कविताएँ।

यह छोडो
कि कौन लिखेगा
उनको।
मगर भरोसा रखो
कि अभी तक लिखी जानी है
दुनिया की
कुछ और कविताएँ।

कवियों के इर्द-गिर्द
घूम रही है
उनकी आत्माएँ।

अवश्य देंगी वे
रचाव को
नई राग
नए रंग।
क्योंकि वे
आज भी हैं मुक्त
जीवन और मरण से।
००००
(वागर्थ, जनवरी 2018)
 
 

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