12 जनवरी, 2018

केन्द्रीय साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत आलोचक डॉ. नीरज दइया से बातचीत

मैं प्रयास करूंगा कि पाठकों का भरोसा कायम रखूं
• लगभग तीस से अधिक वर्षों की साधान के बाद साहित्य अकादेमी का मुख्य पुरस्कार पा कर कैसा लग रहा है?
• मुझे इसकी कोई उम्मीद नहीं थी। जब मुझे मालूम चला खुश हुआ किंतु मुझे बेहद आश्चर्य भी हुआ।
• आश्चर्य क्यों, पुरस्कार तो हर बार किसी न किसी को मिलता ही है?
• हां, मगर विगत दो वर्षों से मुख्य पुरस्कार बीकानेर के खाते था। कहानीकार बुलाकी शर्मा और उपन्यासकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ के बाद इस बार यह आश्चर्यजनक और ऐतिहासिक निर्णय है। इससे प्रमाणित होता है कि अकादेमी की निगाह में कृति पर रहती है।
• कृतियां तो अन्य भी बहुत रही फिर आपकी ‘बिना हासलपाई’ में ऐसा क्या खास है?
• ‘बिना हासलपाई’ आधुनिक कहानी के सिलसिले में मेरा आलोचनात्मक प्रयास है। राजस्थानी कहानी के विकास, बदलते स्वरूप और उतार-चढ़ाव का पच्चीस कहानीकारों के संदर्भ में मैंने विशेष अध्ययन प्रस्तुत किया है। वैसे यह पुरस्कार महज इस बात का प्रमाण है कि वर्ष 2011 से 2015 के बीच प्रकाशित कृतियों में निर्णयाकों ने इसे अति-उत्तम माना है। अन्य कृतियां जो अंतिम चयन में रहीं, वे भी महत्त्वपूर्ण हैं।
• मेरी और अनेक अन्य कहानीकारों की बात ‘बिना हासलपाई’ में नहीं की गई है। ऐसा क्यों है?
• प्रत्येक काम की अपनी एक सीमा होती है। राजस्थानी में अनेक कहानीकार हैं और सब पर पृथक आलेख लिखे जाने चाहिए, किंतु क्या यह काम केवल मुझे ही करना चाहिए? मैंने अगाज किया है और ‘बिना हासिलपाई’ में किसी कहानीकार विशेष पर आलेख लिखने की तुलना में मेरा ध्येय कहानी आलोचना के लिए एक नई दृष्टि विकसित करने का रहा है। चयनित कहानीकार तो महज उदाहरण स्वरूप देखें जाने चाहिए। रही बात आप की तो मैंने ‘देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां’ का संपादन करते हुए आप पर लिखा है। अन्य कहानीकारों पर भी काम करूंगा।
• आप अनेक विधाओं में लिखते हैं फिर आपका आलोचक रूप इतना प्रमुख क्यों है?
• यह तो आप जैसे विद्वान रचनाकार बता सकते हैं कि मेरी प्रमुखता क्या है। मैं तो पूरी ईमानदारी से बस अपना लेखन करता हूं। मुझे लगता है कि मैं बेबाक हूं, सही को सही लिखता हूं। मुझ पर पाठकों का यह भरोसा है। मैं प्रयास करूंगा कि उनका भरोसा कायम रखूं।
• उपन्यास विधा पर भी कुछ आलोचना का काम आने वाला है?
• हां, राजस्थानी उपन्यास-यात्रा पर मेरी किताब नई कृति ‘आंगळी-सीध’ लगभग तैयार है। मैं प्रयास करूंगा कि इस वर्ष वह पाठकों के हाथों में पहुंच जाए। राजस्थानी में संकट लिखने से अधिक उसके प्रकाशन का है। बहुत से रचनाकारों की कृतियां समय पर प्रकाश में नहीं आती है। यह महत्त्वपूर्ण है कि राजस्थानी उपन्यास विधा का पर्याप्त विकास रचनाकारों ने संभव बनाया है। इस क्षेत्र में आपका भी बड़ा योगदान रहा है।
• आपको आलोचना के लिए साहित्य अकादेमी सम्मान मिल रहा है, राजस्थानी में आलोचना की स्थिति कैसी है।
• आलोचना एक गंभीर कार्य है। इसमें पहले पर्याप्त अध्ययन, चिंतन-मनन के साथ विशेष दृष्टि की आवश्यकता होती है। रचनाकार के प्रति सम्मान भावना के साथ मैं निर्मम तुलनात्मक अध्ययन का पक्षधर हूं। राजस्थानी भाषा में तुलना यहां की परिस्थितियों को देख-समझ कर करेंगे तो बेहतर रहेगा। कहानी आलोचना में समग्र रूप से डॉ. अर्जुनदेव चारण के बाद मेरा काम आया है। अभी इस दिशा में अन्य काम भी सामने आने वाले हैं। ऐसे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि आलोचना की स्थिति बहुत अच्छी है किंतु निराशाजनक भी नहीं है।
• राजस्थानी भाषा की मान्यता के विषय में क्या मनना है?
• मान्यता इसी वर्ष मिल जाएगी। आप जैसे वरिष्ठ रचनाकारों का इसके लिए पूरा संघर्ष रहा है। अब जब सारी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी है, मैं मानता हूं कि माननीय प्रधानमंत्री जी शीतकालीन सत्र में संवैधानिक मान्यता की घोषणा करेंगे।
- देवकिशन राजपुरोहित

दैनिक नवज्योति 11-01-2018

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