07 जनवरी, 2018

आलोचना विधा में पढ़ना पहली शर्त है : डॉ दइया

साहित्य अकादेमी के मुख्य पुरस्कार 2017 से सम्मानित डॉ. नीरज दइया से डॉ. गौरीशंकर प्रजापत की बातचीत

साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्ति निसंदेह एक बड़ा सम्मान माना जाता है, ऐसे शुभ अवसर पर आप कैसा अनुभव कर रहे हैं?
सम्मान की घोषणा से निसंदेह हर्षित हुआ हूं, किंतु साथ ही मैं आश्चर्यचकित हूं। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि इस बार यह सम्मान मुझे मिलेगा। गत वर्ष हमारे ही शहर के श्री बुलाकी शर्मा और उनसे पहले श्री मधु आचार्य ‘आशावादी’ को यह सम्मान मिला था, इसलिए सभी का यह विचार लगभग पक्का था कि इस बार राजस्थान के किसी अन्य क्षेत्र का कोई लेखक होगा। किंतु यह घोषणा इस बात को प्रमाणित करती है कि साहित्य अकादेमी के मूल्यांकन का आधार कोई क्षेत्र अथवा लेखक नहीं होकर कृति होती है। ‘बिना हासलपाई’ राजस्थानी कहानी आलोचना के संदर्भ में बड़ी मेहनत और लगन से किया हुआ मेरा काम है। मैं समझता हूं कि यह मेरे आलोचना-कार्य का सम्मान है। मेरा मानना है कि इस सम्मान से मेरी जिम्मेदारी और जबाबदेही बढ़ी है।  
लेखन धर्मिता एवं साहित्य अकादेमी पुरस्कार के संदर्भ में आपके प्रेरणा स्रोत क्या रहे हैं?
मैं लेखक के रूप में कार्य करता रहा हूं और मेरा मानना है कि लेखक को पुरस्कार की आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए। हमारा काम बस बेहतर लिखना होता है, पुरस्कार तो लेखन और प्रकाशन के बाद की महज एक प्रक्रिया है। यह कहना भी आपका गलत नहीं है कि पुरस्कार से प्रेरणा मिलती है। मेरे पिता श्री सांवर दइया को साहित्य अकादेमी सम्मान 1985 में मिला था। संभव है कि कहीं अवचेतन में ऐसे बीज रहे भी हो किंतु मैंने अपने पिता से सतत लेखन की प्रेरणा ग्रहण की है।  
ऐसा माना जाता है कि रचनाधर्मिता पर परिवेश का प्रभाव पड़ता है, परिवेश को अगर व्यापक संदर्भों में देखें तो पारिवारिक परिवेश भी सम्मिलित होता है। इस विषय पर क्या कहना चाहते हैं?
परिवेश का व्यापक प्रभाव पड़ता है। मेरा आरंभिक लेखन पिता के पद्चिह्नों पर चलते हुए हुआ। विधाता को उनका अधिक साथ मंजूर नहीं था इसलिए वे 1992 में इस संसार से विदा हो गए। उनके रहते मेरी केवल एक किताब 1989 में श्री सूर्यप्रकाश बिस्सा ने प्रकाशित की थी। उनके नहीं रहने पर मैंने निश्चय किया कि पहले उनका साहित्य प्रकाश में आएगा। जब उनका अधिकांश लेखन लगभग पांच वर्षों में प्रकाशित हो गया तब मैंने अपना पहला कविता संग्रह ‘साख’ 1997 में प्रकाशित किया। पिता की स्मृति में नेगचार पत्रिका के तीन अंक भी प्रकाशित किए और प्रकाशन से जुड़ना उस समय की मांग थी।
तो क्या आप स्वीकार करते हैं कि स्मृतिशेष सांवर दइया साहब के रचना-संसार से आपकी लेखनी प्रभावित हुई है?
एकदम। मैंने सदा उन्हें एक आदर्श लेखक के रूप में पाया है। मुझे याद आता है बचपन का वह दिन जब प्रार्थना-सभा में मेरे पिता के बारे में घोषणा हो रही थी। यह वह दिन था जब उनको कहानी संग्रह ‘धरती कद तांई धूमैली’ पर राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का पुरस्कार घोषित हुआ था। मैं उनको वर्षों पढ़ते-लिखते देखते रहा था, ऐसे में पता ही नहीं चला कि कब मैंने कलम थाम ली और पहली कविता लिखी। बाद में मुझे उनका मार्गदर्शन मिला और मैं लघुकथाकार के रूप में पहचाना जाने लगा। तब कुछ लोगों का यह भी कहना था कि मेरे पिता लघुकथाएं मेरे नाम से लिख रहे हैं, यह मेरे लिए बहुत बड़ा पुरस्कार था। मैं नया लेखक होकर भी इतना सधा हुआ समझा जाने लगा था।   
स्मृतिशेष दइया साहब के अतिरिक्त उनके समकालीन साहित्यकारों का कितना प्रभाव रहा है?
उनके मित्रों से भी मैं प्रभावित रहा। बचपन में हरदर्शन सहगल, महेशचंद्र जोशी, बुलाकीदास ‘बाबरा’ और कन्हैयालाल भाटी जैसे वरिष्ठ लेखकों का स्नेह मिला तो बाद में भंवरलाल ‘भ्रमर’, माणक तिवाड़ी ‘बंधु’ और बुलाकी शर्मा आदि अनेक रचनाकारों से मेरा विमर्श होने लगा था। अकादमी द्वारा प्रकाशित कहानी संग्रह ‘उकरास’ के संपादन के दौरान मुझे उनके साथ काम करने और खास कर समग्र राजस्थानी कहानी का काम देखने का सुअवसर मिला। संभवतः वर्ष 1985 में उनको और हिंदी कहानीकार निर्मल वर्मा को एक साथ साहित्य अकादेमी पुरस्कार ने मुझे प्रेरणा दी होगी कि मैंने निर्मल वर्मा के कथा साहित्य को शोध के लिए चुना। शिक्षा ग्रहण करते समय मेरे अनेक गुरुजन कवि थे। मोहम्मद सद्दीक, अजीज आजाद, जगदीश प्रसाद ‘उज्जवल’, भवनीशंकर व्यास ‘विनोद’, पृथ्वीराज रतनू, सरल विशारद और प्रो. अजय जोशी आदि अनेक नाम है। डॉ, उमाकांत जी के मर्गदर्शन में शोध करते हुए मैं आलोचना के पथ पर व्यवस्थित रूप से बढ़ा। मेरा मानना है कि हमें हमारे वरिष्ठ लेखकों से बहुत कुछ सीखना चाहिए।
मूलतः आप राजस्थानी साहित्य के लब्ध प्रतिष्ठित आलोचक हैं, वर्तमान में समग्रतः राजस्थानी साहित्य के बारे में आप क्या कहना चाहते हैं?
मैं आलोचक हूं यह आपका मानना है। कुछ ऐसा भी कहते हैं कि मैं आलोचक ही नहीं हूं। कुछ मुझे कवि, अनुवादक, बाल साहित्यकार और संपादक के रूप में श्रेष्ठ मानते हैं। सबकी अलग अलग धारणा है। मैं जो भी हूं किंतु मैं वर्तमान राजस्थानी साहित्य को लेकर बहुत आशावादी हूं। एक समय था जब राजस्थानी में लोककथाओं का जमाबड़ा था, किंतु अब कहानी और आधुनिक कहानी के बाद उत्तर आधुनिक कहानियां हम देख सकते हैं। पहले अनेक विधाओं में बहुत कम सृजन होता था किंतु विगत वर्षों में देखें तो पता चलेगा कि विपुल सृजन हुआ है। राजस्थानी में नए रचनाकारों का पूरे विश्वास के साथ लिखना उत्साहजनक है। अनेक पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगी है। अब राजस्थानी साहित्य के विकास के प्रति समाज भी जागरूक हो रहा है।
समूचे प्रदेश में राजस्थानी की मान्यता का प्रश्न युगीन संदर्भ में नितांत आवश्यक अनुभूत किया जा रहा है, आपकी दृष्टि में कौन-कौन सी बाधाएं इस मध्य उत्पन्न हो रही है।
राजस्थानी की मान्यता एक ऐसा प्रश्न है जिसका जबाब पूरे प्रांत द्वारा दिया जा चुका है। राज्य सरकार के प्रस्ताव पर केवल केंद्र सरकार की मंजूरी लंबित है। आशा की जाती है कि हमारी जनभावनाओं को देखते हुए माननीय प्रधानमंत्री जी शीतकालीन सत्र में राजस्थानी मान्यता की घोषणा करेंगे। भाषा वैज्ञानिक आधारों पर राजस्थानी एक स्वतंत्र भाषा सिद्ध हो चुकी है। हमारी सारी बाधाएं दूर हो चुकी है अब हमें केवल सरकारी घोषणा का इंतजार है। यह मानता हूं कि सरकारी उदासीनता के चलते राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के कार्य लंबे समय से बंद पड़े हैं। ऐसे में हमें एकजुट होकर आवाज बुलंद करनी चाहिए। राजस्थान की जनता को अपनी भाषा के लिए मरणा मांडना होगा।    
छतीसगढ़ राज्य की विधान सभा मे छतीसगढ़ी भाषा को प्रस्ताव द्वारा मान्यता प्रदत्त कर दी, आज संपूर्ण राज्य में कामकाज की भाषा के रूप में प्रयुक्त हो रही है। राजस्थानी के लिए ऐसा क्यों नहीं हुआ है?
राजस्थानी के प्रति नेताओं में इच्छा शक्ति का अभाव है। वे जिस भाषा में वोट मांगते हैं जीतने के बाद उसे भूल जाते हैं। भाषा और साहित्य की तुलना में उन्हें अपनी सीट अधिक प्यारी है। भाषा का संबंध आत्मा से है और अगर हमें हमारी संस्कृति को बचाना है तो हमें छत्तीसगढ़ से प्रेरणा लेनी चाहिए। पूरा राजस्थानी समाज इन दिनों सोया हुआ है और ऐसे में मुझे मनुज देपावत का स्मरण होता है। जिन्होंने वर्षों पहले लिखा था- धोरावाळा देस जाग रे, ऊंठावाळा देस जाग, छाती पर पैणां पड्या नाग  रे..। जिस दिन सभी राजस्थानी जाग जाएंगे, उसी दिन हमें हक मिल जाएगा।
कहते हैं कि सफल व्यक्ति के पीछे पत्नी का सहयोग होता है आप क्या मानते हैं?
घर ही वह स्थल है जहां मैं शांतिपूर्वक लेखन कर सकता हूं। जाहिर है ऐसे में पत्नी और बच्चों का बड़ा त्याग रहा है कि वे लेखन के लिए अवकाश उपलब्ध कराते हैं। 
युवा रचनाकारों को क्या संदेश देना चाहते हैं?
फिलहाल तो मैं खुद ही पचास की उम्र का युवा रचनाकार हूं। पुरानी पीढ़ी के रचनाकार जो मेरे पिता के समकालीन रहे हैं उनके सामने मुझे युवा बने रहने में ही गर्व महसूस होता है। मैं दावा तो नहीं करता किंतु प्रयास करता हूं कि अधिक से अधिक नए और पुराने साहित्य के बारे में जानकारी कर सकूं। लिखने के लिए पढ़ना बहुत जरूरी है और आलोचना विधा में पढ़ना पहली शर्त है। हम युवाओं को भाषा और साहित्य के प्रति गंभीरतापूर्वक ठोस कार्य करने हैं। युवाओं को भाषा और साहित्य के प्रति जिम्मेदारी और जबाबदेही समझनी चाहिए।

डॉ. नीरज दइया का परिचय

प्रकाशन सूची
मौलिक पुस्तकें-
• भोर सूं आथण तांई (लघुकथा संग्रह) 1989 मुन्ना प्रकाशन, बीकानेर
• साख (कविता संग्रह) 1997 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• देसूंटो (लांबी कविता) 2000 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• आलोचना रै आंगणै (आलोचनात्मक निबंध) 2011 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• जादू रो पेन (बाल साहित्य) 2012 शशि प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर
• उचटी हुई नींद (हिंदी कविता संग्रह) 2013 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• बिना हासलपाई (आधुनिक कहाणी आलोचना) 2014 सर्जना, बीकानेर
• पाछो कुण आसी (कविता संग्रह) 2015 सर्जना, बीकानेर
• मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार (आलोचना) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (आलोचना) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• पंच काका के जेबी-बच्चे (व्यंग्य संग्रह) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
अनूदित पुस्तकें-
• कागद अर कैनवास (अमृता प्रीतम की पंजाबी काव्य-कृति का अनुवाद) 2000 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• कागला अर काळो पाणी (निर्मल वर्मा के हिंदी कहाणी संग्रह का अनुवाद) 2002 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
• ग-गीत (मोहन आलोक के कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद) 2004 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित।
• सबद नाद (भारतीय भाषाओं की कविताएं) 2012 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• देवां री घाटी (भोलाभाई पटेल के गुजराती यात्रा-वृत) 2013 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित।
• ऊंडै अंधारै कठैई (डॉ. नन्दकिशोर आचार्य की चयनित कविताएं) 2016 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• अजेस ई रातो है अगूण (सुधीर सक्सेना री की चयनित कविताओं का राजस्थानी अनुवाद) 2016 लोकमित्र, दिल्ली
संपादित पुस्तकें-
• मंडाण (युवा कविता) संपादक : नीरज दइया 2012 राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
• मोहन आलोक री कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2010 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2011 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2017 राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर
• आधुनिक लघुकथाएं (संपादन) प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरु मार्ग, बीकानेर- 334003
• नेशनल बिब्लियोग्राफी ऑफ इंडियन लिटरेचर (राजस्थानी : 1981-2000) साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली

प्राप्त पुरस्कार एवं सम्मान   
• साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से राजस्थानी बाल साहित्य पुरस्कार 2014
• राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर से “बापजी चतुरसिंहजी अनुवाद पुरस्कार”
• नगर विकास निगम से “पीथळ पुरस्कार” ।
• नगर निगम बीकानेर से वर्ष 2014 में सम्मान
• अखिल भारतीय पीपा क्षत्रिय महासभा युवा प्रकोष्ठ बीकानेर द्वारा सम्मान- 2014
• सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बीकानेर से तैस्सितोरी अवार्ड- 2015
• रोटरी क्लब, बीकानेर द्वारा “खींव राज मुन्नीलाल सोनी” पुरस्कार-2016
• कालू बीकानेर द्वारा नानूराम संस्कर्ता राजस्थानी साहित्य सम्मान-2016
• कांकरोली उदयपुर द्वारा मनोहर मेवाड़ राजस्थानी साहित्य सम्मान-2016
• फ्रेंड्स एकता संस्थान बीकानेर द्वारा साहित्य सम्मान-2016
• दैनिक भास्कर बीकानेर द्वारा शिक्षक सम्मान- 2016
• सृजन साहित्य संस्थान, श्रीगंगानगर द्वारा सुरजाराम जालीवाला सृजन पुरस्कार-2017
• राजस्थानी रत्नाकर, दिल्ली द्वारा श्री दीपचंद जैन साहित्य पुरस्कार’- 2017
• ओम पुरोहित ‘कागद’ फाउण्डेशन हनुमानगढ़ द्वारा कागद सम्मान- 2017
• साहित्य कला एवं संस्कृति संस्थान नाथद्वारा द्वारा हल्दीघाटी में साहित्य रत्न सम्मान- 2017
• जिला लोक शिक्षा समिति, बीकानेर द्वारा साक्षरता दिवस पर सम्मान- 2017
• मावली प्रसाद श्रीवास्तव सम्मान 2017 अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन द्वारा
• अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन द्वारा सीताराम रूंगटा सीताराम रूंगटा राजस्थानी साहित्य पुरस्कार- 2017
• केंद्रीय विद्यालय संगठन, जयपुर संभाग द्वारा क्षेत्रीय प्रोत्साहन पुरस्कार, 2017
• गौरीशंकर कमलेश स्मृति राजस्थानी भाषा पुरस्कार- 2017
•  कथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा डॉ. नारायणसिंह भाटी अनुवाद सम्मान

अन्य   
राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ का संपादन। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की उच्च माध्यमिक कक्षा की पाठ्यपुस्तक का संपादन।
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान, अजमेर की राजस्थानी पाठ्यक्रम विषय-समिति के पूर्व-संयोजक।
राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर की कार्यकारणी और सामान्य सभा के सदस्य।
“कविता कोश” राजस्थानी विभाग सहायक-संपादक।
समन्वयक : राजस्थानी भाषा साहित्य संस्कृति विभाग, हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी, दिल्ली।
राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए अंतरजाल पर सक्रिय रचनाकार, अनेक ब्लॉगों के लेखक।
राजस्थान भाषा मान्यता के प्रवल समर्थक।

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