(डॉ. नीरज दइया का जन्म 22 सितम्बर,1968 को रतनगढ़ (चूरू) राजस्थान में हुआ। कवि, आलोचक, व्यंग्यकार, अनुवादक और संपादक
के रूप में राजस्थानी और हिंदी साहित्य में उनकी पहचान है। साख, देसूंटो और पाछो कुण
आसी जैसी काव्य कृतियों के अलावा उनकी आलोचना रै आंगणै और बिना हासलपाई कृति
चर्चित हुई हैं। साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से उन्हें पुरस्कृत किया है। उनकी कुछ
कविताएं यहां प्रस्तुत है, संपर्क 09461375668)
तुम को संबोधितकौन हो तुम ?
कौन हो सकते हो तुम ?
तुम को संबोधित है-
मेरी सारी कविताएं।
मैं खोजता हूं-
कविताओं में तुम को !
हमारे समय में
यह एक रहस्य है
जब कविताओं में तुम
खोजते नहीं खुद को...
खोजता हूं मैं जिसे
पा लेता हूं- तुम को।
तुम से जुदा
मैं स्मृतियों में खोया-
तुम को सामने पाकर
तुम को संबोधित हूं !
००००
मुझे क्या ?
इस पृथ्वी पर
कुछ भी हो जाए कहीं
मेरे आस-पास या दूर कहीं
मुझे क्या ?
मैं खैरियत में हूं
बस अपना काम करूंगा-
खाना-पीना और सोना
इस के अलावा
नहीं है जीवन....
यह जीवन भी
बस एक सपना है-
मैं सुख में हूं
खाता हूं, पीता हूं,
भर नींद सोता हूं....
मेरा सपना टूटेगा
गुजते दिनों में
किसी दिन गुजर जाऊंगा
मुझे क्या इस पृथ्वी से!
कहीं भी कुछ भी हो जाए
मेरे आस-पास या दूर कहीं
इस पृथ्वी पर
मैं बस धीरे-धीरे गुजर रहा हूं....
००००
सीधा खड़ा
इतना झुका हूं
सब कुछ मानते हुए
सब कुछ जानते हुए
सहज स्वीकारते हुए
होना चाहता रहा- एक
तुम ऐंठते रहे
नहीं मिलना चाहते
इतने इंतजार के बाद
लेना है एक फैसला
भाई ! तुम ऐंठे रहो
ऐसे ही ऐंठे रहो
और ऐंठते चले जाओ
अगर कुछ गलत रहा मैं
पूरे सही तो तुम भी कहां !
अब मैं हो गया हूं सीधा खड़ा
देखता हुआ आगे-पीछे के रास्तों को
चलूंगा आगे बिना तुम्हारे
रोना और गिड़गिड़ाना भी
नहीं होगा मुझसे
मैं निर्दोष
क्यों दूं तुम्हें दोष
नहीं होता दोष किसी का
दोष प्रारब्ध का
कर्मों की रेखाओं का
कैसी भी बने सूरत
नहीं दूंगा दोष
अब हर सूरत
मिलूंगा मैं
सीधा खड़ा....
००००
भाड़
मैं अकेला चना
सोचता हूं-
किसलिए बना ?
सोचते-सोचते मैं चला
पहुंचा झुंड के पास...
अरे, अब मैं
अकेला कहां!
हम चनों का है-
एक संसार....
तुम हां तुम
क्यों खड़े हो वहां
आ जाओ यहां
मिलकर हम चलेंगे
भाड़ के पास....
००००
जानना चाहिए जितना !
नहीं-नहीं, मैं नहीं जानता
मैं कुछ भी नहीं जानता
सिवाय मेरे
और कहां जानता हूं मैं
अपने को भी पूरा
या कि जानना चाहिए जितना !
००००
कोई कवि है मेरे भीतर
हो गया हूं तैयार....
लिखूंगा एक कविता
वैसे बता दूं-
मैं नहीं लिखता कविता
कोई कवि है मेरे भीतर
जो कविता लिखने की सोचता है,
मैं तो अक्सर सोचता हूं-
क्या होगा लिखने से कविता !
इस खतरनाक समय में
मैं बचना चाहता हूं
कविता ही नहीं
किसी भी झमेले से
अब जब कुछ भी करना-कहना
नहीं है खतरे से खाली
फिर से कुछ होता है मेरे भीतर
होती है कोई कविता
क्या मैं ही उसे जाल में ले लेता हूं
नहीं मैं तो आजाद रहना चाहता हूं
और भीतर का कवि समझाता है-
यही है आजादी...
मैं उससे पूछता हूं-
कविता लिखना और कविता होना क्या है?
बस कुछ शब्दों से सजी
पंक्तियों की जालसाजी है कविता !
मैं भयभीत हूं
मेरे भीतर है कोई कवि
जो समय के सामने खड़ा होता है
लाता है कुछ शब्दों के संगठित समूह
उन्हें कर देता है नियंत्रित
कुछ इधर करता है कुछ उधर करता है
कुछ पंक्तियों को करीने से रखता है
और बन जाती है कविता !
मैं गौर से देखता हूं-
अपने कंप्यूटर का की-पेड, कभी मोनिटर
नहीं मिलता किसी कविता का सूराग
मैं अपने हाथों को आंखों के सामने ले जाता हूं
मेरे खाली कागज और कलम के करीब जाता हूं
कहीं मिलती कोई कविता
कोई है मेरे भीतर जो देखता है कविता।
कवि, तुम्हारी मर्जी नहीं चलेगी
मैं भी देखना चाहता हूं कविता।
हो गया हूं तैयार....
लिखूंगा एक कविता !
००००


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