1
पहले तो आप बधाई स्वीकारें कि यह जाता हुआ वर्ष और आता हुआ वर्ष यानि 2017 और 2018 आपके लिए सृजनात्मक रहा और पुरस्कारों के लिए भी, आप राजस्थान के साथ कोलकाता और देश की राजधानी में भी सम्मानित होंगे यह समाचार सभी को खुशियां दे रहा है। कैसा लग रहा है?
अच्छा लग रहा है। मेरी लेखक के रूप में जिम्मेदारी और जबाबदेही बढ़ी है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जिसमें समाज और साहित्य में अंतराल बढ़ रहा है, इन पुरस्कारों और साहित्यिक आयोजनों का बड़ा महत्त्व है। इनसे समाज का साहित्य के प्रति ध्यानाकर्षक होता है। मैं पुरस्कारों को एक समाजिक स्वीकृति के रूप में देखता हूं। कोलकता के अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन अथवा दिल्ली के साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कारों की चर्चा से मेरे आसपास के सामाजिक जीवन में हलचल है। उन्हें लगता है कि लेखन के क्षेत्र में मैंने कोई बड़ा काम किया है जिसके रहते अनेक पुरस्कारों के लिए चयनित हो रहा हूं। यह अच्छा होगा कि नए पाठक मेरी रचनाओं तक पहुंचेंगे।
2
कभी सोचा था कि आप आलोचना से सृजनात्मक लेखन में आएंगे?
आलोचना अपने आप में सृजनात्मक होती है, और होनी चाहिए। किसी सृजन के बाद आलोचना का जन्म होता है और सृजन ही वह प्रेरणा है जिससे आलोचना का उद्भव संभव है। जैसे अनुवाद में अनुवाद का मौलिक हो जाना उसका परम लक्ष्य है, वैसे ही आलोचना में आलोचना का रचना हो जाना एक उपलब्धि है। मैं रचना को किसी बंधी-बंधाई शास्त्रीय आलोचना के पक्ष में नहीं हूं। प्रत्येक रचना अपने आप में सृजन के क्षेत्र में अभिनव प्रयास है और उसका मूल्यांकन करते समय आलोचना को हर बार अभिनव होना होता है। परंपरा और आधुनिकता की विकास-यात्रा में किसी रचना का निर्धारण अथवा स्थापना बिना सृजनात्मकता के संभव ही नहीं है। आलोचना में काम करते हुए भी मैं सृजनात्मक लेखक में ही हूं। मेरी सृजनात्मकता ही मुझे बेहतर आलोचनात्मक दृष्टिकोण देती है।
3
क्या कारण है कि राजस्थानी लेखन और बीकानेर अब पर्याय होने लगा है?
राजस्थान के अन्य जिलों की तुलना में बीकानेर जिले और बीकानेर संभाग में लेखन प्रचुर मात्रा में हुआ है और हो रहा है। यहां राजस्थानी भाषा की मान्यता की मांग लंबे समय से प्रमुखता से उठाई जाती रही है। बीकानेर में राजस्थानी, हिंदी, उर्दू और सिंधी के साथ अन्य भाषाओं के साहित्य को पढ़ने-लिखने वाले तुलनात्मक रूप से अधिक संख्या में हैं। यहां साहित्यिक आयोजनों की बाहर रहती है। साहित्य के प्रति लोगों का रुझान इन वर्षों में बढ़ा है। ऐसे में बीकानेर राजस्थानी लेखक का पर्याय है तो अन्य जिलों को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए।
4.
राजस्थानी के साहित्य अकादेमी पुरस्कार में पहले मधु आचार्य, बुलाकी शर्मा और अब आप? क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि बीकानेर को लगातार पुरस्कार मिले हैं। यह सोची-समझी रणनीति तो नहीं, या इसे करनी माता का आशीर्वाद समझ लिया जाएं ?
राजस्थानी संस्कृति में आस्था और आशीर्वाद का बड़ा तो महत्त्व है। आप इसे मेरे माता-पिता और परमपिता का आशीर्वाद कह सकते हैं। वर्ष 1985 में यह पुरस्कार मेरे पिता श्री सांवर दइया को उनके कहानी संग्रह ‘एक दुनिया म्हारी’ के लिए मिला और 32 वर्षों के बाद मुझे कहानी-आलोचना पर मिल रहा है। लगातार तीन वर्षों की बात भी सही है। पर इसमें कोई रणनीति नहीं, यह महज एक संयोग है। यदि रणनीति से पुरस्कार मिलते हों तो हमें मिलकर नोबल पुरस्कार के लिए रणनीति बनानी चाहिए। वैसे आप जानते ही है कि साहित्य अकादेमी नई दिल्ली के पुरस्कारों की अपनी लंबी और गोपनीय प्रक्रिया है। वह लेखकों से पुस्तकें आमंत्रित नहीं करती। अकादेमी अपने स्तर पर ग्राउंड लिस्ट बनवा कर अपने पैनलों से उसे रिफाइंड करवाती है। साहित्य अकादेमी के भाषा सलाहकारों अथवा संयोजक को भी पता नहीं रहता कि निर्णायक कौन है। संयोजक के सामने अंतिम बैठक के दिन ही यह भेद खुलता है। इस प्रक्रिया में कोई रणनिति काम कर सकती। अगर कोई ऐसा करता है तो उसे हमेशा के लिए इस प्रक्रिया से बाहर करने का नियम है। हां इस बार यह आश्चर्य का विषय है कि लगातार तीसरी बार मुख्य पुरस्कार बीकानेर के रचनाकार को मिल रहा है। राजस्थानी कहानी आलोचना की पुस्तक “बिना हासलपाई” (2014) को साहित्य अकादेमी पुरस्कार का अभिप्राय बस इतना है कि वर्ष 2011 से 2015 के बीच प्रकाशित पुस्तकों में यह पुस्तक निर्णायकों की नजर में बेहतर सिद्ध हुई है।
5.
आप व्यंग में भी उतने सहज है जितने आलोचना में ऐसे कैसे हुआ?
व्यंग्य और आलोचना मैं स्वयं को समान भावभूमि पर खड़ा पाता हूं। दोनों के उद्देश्यों में भी कुछ मायनों में समानता है। बिना सहजता के व्यंग्य और आलोचना विधा में काम नहीं किया जा सकता। पाठकों और संबंधितों को भी इन्हें सहजता से लेना चाहिए क्यों कि इन दोनों के पीछे सुंदर और आदर्श समाज का भाव निहित होता है।
6.
आप लगातार लिख रहे हैं, घर की सभी जिम्मेवारियों को भी निभा रहे हैं, फिर भी कहीं लगता है कि कहीं कुछ छूट रहा हैं?
असल में हमारा जीवन ही ऐसा है कि जिसमें निरंतर बहुत कुछ पीछे छूटता चला जाता है। इस पीछे छूटते जीवन को कुछ अंश तक साहित्य द्वारा बचाने का प्रयास रचनाकार करते हैं। वर्तमान दौर में हिंदी अथवा राजस्थानी लेखन से कोई अपना घर-परिवार नहीं चला सकता। ऐसे में आपको नौकरी भी करनी होती है। मैं नौकरी करते समय एक राजकीय कर्मचारी और घर में अपने संबंधों के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाने के बाद ही अपने भीतर के लेखक को जगाता हूं कि आ जा भैया अब तेरा समय है। हां इतना जरूर है कि घर में पत्नी और बेटे-बेटियां इस बात कि चिंता रखते हैं कि जब मैं लिखता हूं अथवा पढ़ता हूं तब वे मुझे बहुत अवकाश देते हैं। उनके और मित्रों के इसी सहयोग के चलते मैं अपना काम ठीक से करने का प्रयास करता हूं।
7.
आप एक शिक्षक है और केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ा रहे है और अपने विद्यार्थियों में खासे लोकप्रिय भी, जब उनको पता लगा कि आप को साहित्य अकादेमी के सम्मान से सम्मानित किया जाएगा तो पहली प्रतिक्रिया कैसी थीं, उनकी?
बच्चों को बड़ी खुशी होती है और जाहिर हैं वे पहली प्रतिक्रिया के रूप में पार्टी मांगते हैं। एक बार की बात है मैं किसी प्रशिक्षण में था और वहां भोजनावकाश के बाद एक सवाल किया गया कि आपके बच्चे कितने हैं। बहुत से संभागी अपने अपने विषय में बता रहे थे और जब मेरी बारी आई तो मैंने जबाब दिया दो हजार। सारे चौंके और सवाल करने वाले ने ताली बजाकर सही उत्तर की घोषणा की। मैं मनाता हूं कि एक शिक्षक के रूप में विद्यालय में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी मेरे अपने बच्चे हैं। इस भावना के बिना हम बच्चों के साथ न्याय नहीं कर सकते। इसलिए उनका हक है कि वे पार्टी मांगे, उन्हें पार्टी मिलेगी। हमारे प्राचार्य सरजीत जी ने भी पुरस्कार के बाद बच्चों की पार्टी को पुरस्कार का टीडीएस की संज्ञा दी है। बच्चों को यह टेक्स देते हुए खुशी होती है।
8.
कितना समय लेखन को, कितना पर्यटन को और कितना घर को देते हैं ?
मेरी एक राजस्थानी कविता है। जिसकी कुछ पंक्तियां हिंदी अनुवाद में यहां साझा करना चाहता हूं। कविता का शीर्षक है- ‘रक्त में मिली हुई भाषा’ आरंभिक पंक्तियां कुछ इस तरह है- “राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में मिली हुई है / यह पंक्ति आपको कविता की पंक्ति नहीं लगे / तो कोई बात नहीं है... / कविता से ज्यादा अधिक जरूरी है भाषा को संभालना / भाषा की हेमाणी लिए खड़ा हूं मैं...” मैंने लेखन के संस्कार अपने लेखक पिता से पाए हैं और मैं अपने भीतर के लेखक को मेरे आस-पास की परिस्थियों के अनुरूप कभी भी सक्रिय कर सकता हूं। मैं जितना भी समय संभव होता है लेखक को देता हूं और देना चाहता हूं, पर्यटन कम संभव होता है पर मैं घर में ही रहना अधिक पसंद करता हूं। किसी आयोजन के लिए बाहर निकलना भी मुझे जरा मुश्किल लगता है। ऐसे में आयोजक मित्रों की यह शिकायत भी रहती है।
9.
दिनचर्या क्या रहती हैं, मसलन लेखन की और घर के संदर्भ में ?
सुबद जल्दी उठकर कंप्यूटर पर लिखने-पढ़ने की आदत है। विद्यालय जाने से पहले कुछ जरूरी काम करने के बाद अपने लेखक को भूल जाता हूं। मैं हिंदी पीजीटी के रूप में विद्यालय के कार्यों में व्यस्त रहता हूं। पुस्तकालय में जब कभी लेखक जागता है तो उसे मना लेता हूं कि भैया घर पर लौटकर बात करेंगे। घर लौटकर मैं घर-परिवार के छोटे-मोटे काम के बाद मेरी प्राथमिकता लिखना-पढ़ना है। मैंने छोटा-मोटा एक पुस्तकालय घर में ही बना रखा है। किताबों में खो जाने बाद मैं बाहर भी दुनिया को भूल जाता हूं। हां कोई पारिवारिक काम हो तो उसे मैं मेरी प्राथमिकता उसे मानता हूं।
10.
पहली रचना कौन सी थीं, व्यंग को अपने दिल के करीब मानते हैं या आलोचना से उतना ही सरोकार हैं ?
आज ठीक से पहले रचना की जानकारी नहीं है पर मैंने संभवतः उच्च प्राथमिक स्तर पर लिखना आरंभ किया था। मेरे पिता श्री सांवर दइया को उनके कहानी संग्रह पर राज्य की साहित्य अकादमी के पुरस्कार की घोषणा मैंने दसवीं कक्षा में मंच से होती सुनी तो मुझे गर्वानुभूति हुई और किताब के रूप में मेरा पहला लघुकथा संग्रह 1989 में अकादमी अनुदान से प्रकाशित हुआ था। मेरी साहित्यिक यात्रा में मेरे पिता का योगदान इसलिए भी है कि जब 1992 में उनका असामयिक निधन हो गया तब पहले मैंने उनके साहित्यिक कार्यों को प्रकाश में लाने को प्राथमिकता पर रखा और लगभग पांच वर्षों में उनका अप्रकाशित साहित्य पारिवारिक संसाधनों से प्रकाशित करवाया। उसके बाद मैंने अपना पहला कविता संग्रह ‘साख’ 1997 में प्रकाशित किया। व्यंग्य की तुलना में मैं खुद को आलोचना के करीब मानता हूं। मैंने आलोचना के क्षेत्र में कुछ नवीन प्रयोग करने का प्रयास किया और मुझे खुशी है कि मेरे प्रयास को ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन’ के अवसर पर बाबू मावली प्रसाद श्रीवास्तव साहित्य पीठ, रायपुर द्वारा प्रदत्त पुरस्कार ‘बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार’ पर अर्पित किया गया। चयन समिति ने संस्तुति में कहा- श्री दइया की इस कृति में संग्रहित निबंध किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने और परखने की कथित रूप से जरूरी अकादमिक और क्लासिक परंपरावाली क्लिष्टता और संशलिष्टता के बरक्स आत्मीय और सहज रागात्मक भाषा में मूल्यांकन के नये और कारगर टूल्स को चिह्नांकित करते हैं ।
11.
जिंदगी का लक्ष्य क्या है?
मातृभाषा राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में देखना मेरा एक सपना है, यह पूरा हो जाए। मैं लेखन में अपनी सक्रियाता बनाए रख सकूं और मेरे विद्यार्थी देश के सुयोग्य नागरिक बने।
12.
पुरस्कारों की राजनीति भी होती हैं, क्या ? इस पर कुछ कहेंगे ?
हां, कुछ पुरस्कारों में राजनीति हुई है। राजनीति की बात करें तो इसमें जनमत बदलता है, वैसे ही ऐसे पुरस्कारों और लेखकों की साख भी बदलती रहती है। महानता से पुरस्कार मिल सकते हैं, पर पुरस्कारों से महानता हासिल नहीं की जा सकती है। इस दौर में मूल्यों और आदर्शों का पतन हुआ है किंतु यह लंबे समय तक यह चलने वाला नहीं है। मेरा अपने कार्य के प्रति विश्वास बना रहता है, अगर असहमतियों के बीच भी मुझे लगता है कि मैं सही हूं तो मुझे रुकना नहीं है, निरंतर आगे बढ़ना है।
13.
साहित्य अकादेमी का वाल साहित्य पुरस्कार आपको 1994 में मिला और मुख्य पुरस्कार 2017 मिल रहा है, अनुवाद पुरस्कार कब मिलेगा?
पुरस्कार मिलना या नहीं मिलना किसी लेखन के हाथ में नहीं है। पुरस्कारों की अपनी अपनी प्रक्रिया होती है। मैंने राजस्थानी बाल साहित्य, कविता, आलोचना आदि विधाओं के साथ अनुवाद के क्षेत्र में भी काफी कार्य किया है। मैं अनुवाद के क्षेत्र में राजस्थानी और हिंदी के लिए कार्य कर सका यह बात किसी भी पुरस्कार से बड़ी है। मैंने अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, मोहन आलोक, भोलाभाई पटेल, डॉ. नन्दकिशोर आचार्य और सुधीर सक्सेना जैसे रचनाकारों की पुस्तकों का अनुवाद किया है। ‘सबद-नाद’ पुस्तक में मैंने भारतीय भाषाओं की कविता को आधुनिक राजस्थानी कविता के संदर्भ में समझने-समझाने का एक प्रयास किया है। अनेक रचनाओं का हिंदी अनुवाद और पाठकों की सराहना ही मेरा पुरस्कार है। रही बात साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार की तो वह प्रक्रिया है कि मिलने पर ही पता चलेगा कि मिल गया है।
००००
पहले तो आप बधाई स्वीकारें कि यह जाता हुआ वर्ष और आता हुआ वर्ष यानि 2017 और 2018 आपके लिए सृजनात्मक रहा और पुरस्कारों के लिए भी, आप राजस्थान के साथ कोलकाता और देश की राजधानी में भी सम्मानित होंगे यह समाचार सभी को खुशियां दे रहा है। कैसा लग रहा है?
अच्छा लग रहा है। मेरी लेखक के रूप में जिम्मेदारी और जबाबदेही बढ़ी है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जिसमें समाज और साहित्य में अंतराल बढ़ रहा है, इन पुरस्कारों और साहित्यिक आयोजनों का बड़ा महत्त्व है। इनसे समाज का साहित्य के प्रति ध्यानाकर्षक होता है। मैं पुरस्कारों को एक समाजिक स्वीकृति के रूप में देखता हूं। कोलकता के अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन अथवा दिल्ली के साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कारों की चर्चा से मेरे आसपास के सामाजिक जीवन में हलचल है। उन्हें लगता है कि लेखन के क्षेत्र में मैंने कोई बड़ा काम किया है जिसके रहते अनेक पुरस्कारों के लिए चयनित हो रहा हूं। यह अच्छा होगा कि नए पाठक मेरी रचनाओं तक पहुंचेंगे।
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कभी सोचा था कि आप आलोचना से सृजनात्मक लेखन में आएंगे?
आलोचना अपने आप में सृजनात्मक होती है, और होनी चाहिए। किसी सृजन के बाद आलोचना का जन्म होता है और सृजन ही वह प्रेरणा है जिससे आलोचना का उद्भव संभव है। जैसे अनुवाद में अनुवाद का मौलिक हो जाना उसका परम लक्ष्य है, वैसे ही आलोचना में आलोचना का रचना हो जाना एक उपलब्धि है। मैं रचना को किसी बंधी-बंधाई शास्त्रीय आलोचना के पक्ष में नहीं हूं। प्रत्येक रचना अपने आप में सृजन के क्षेत्र में अभिनव प्रयास है और उसका मूल्यांकन करते समय आलोचना को हर बार अभिनव होना होता है। परंपरा और आधुनिकता की विकास-यात्रा में किसी रचना का निर्धारण अथवा स्थापना बिना सृजनात्मकता के संभव ही नहीं है। आलोचना में काम करते हुए भी मैं सृजनात्मक लेखक में ही हूं। मेरी सृजनात्मकता ही मुझे बेहतर आलोचनात्मक दृष्टिकोण देती है।
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क्या कारण है कि राजस्थानी लेखन और बीकानेर अब पर्याय होने लगा है?
राजस्थान के अन्य जिलों की तुलना में बीकानेर जिले और बीकानेर संभाग में लेखन प्रचुर मात्रा में हुआ है और हो रहा है। यहां राजस्थानी भाषा की मान्यता की मांग लंबे समय से प्रमुखता से उठाई जाती रही है। बीकानेर में राजस्थानी, हिंदी, उर्दू और सिंधी के साथ अन्य भाषाओं के साहित्य को पढ़ने-लिखने वाले तुलनात्मक रूप से अधिक संख्या में हैं। यहां साहित्यिक आयोजनों की बाहर रहती है। साहित्य के प्रति लोगों का रुझान इन वर्षों में बढ़ा है। ऐसे में बीकानेर राजस्थानी लेखक का पर्याय है तो अन्य जिलों को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए।
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राजस्थानी के साहित्य अकादेमी पुरस्कार में पहले मधु आचार्य, बुलाकी शर्मा और अब आप? क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि बीकानेर को लगातार पुरस्कार मिले हैं। यह सोची-समझी रणनीति तो नहीं, या इसे करनी माता का आशीर्वाद समझ लिया जाएं ?
राजस्थानी संस्कृति में आस्था और आशीर्वाद का बड़ा तो महत्त्व है। आप इसे मेरे माता-पिता और परमपिता का आशीर्वाद कह सकते हैं। वर्ष 1985 में यह पुरस्कार मेरे पिता श्री सांवर दइया को उनके कहानी संग्रह ‘एक दुनिया म्हारी’ के लिए मिला और 32 वर्षों के बाद मुझे कहानी-आलोचना पर मिल रहा है। लगातार तीन वर्षों की बात भी सही है। पर इसमें कोई रणनीति नहीं, यह महज एक संयोग है। यदि रणनीति से पुरस्कार मिलते हों तो हमें मिलकर नोबल पुरस्कार के लिए रणनीति बनानी चाहिए। वैसे आप जानते ही है कि साहित्य अकादेमी नई दिल्ली के पुरस्कारों की अपनी लंबी और गोपनीय प्रक्रिया है। वह लेखकों से पुस्तकें आमंत्रित नहीं करती। अकादेमी अपने स्तर पर ग्राउंड लिस्ट बनवा कर अपने पैनलों से उसे रिफाइंड करवाती है। साहित्य अकादेमी के भाषा सलाहकारों अथवा संयोजक को भी पता नहीं रहता कि निर्णायक कौन है। संयोजक के सामने अंतिम बैठक के दिन ही यह भेद खुलता है। इस प्रक्रिया में कोई रणनिति काम कर सकती। अगर कोई ऐसा करता है तो उसे हमेशा के लिए इस प्रक्रिया से बाहर करने का नियम है। हां इस बार यह आश्चर्य का विषय है कि लगातार तीसरी बार मुख्य पुरस्कार बीकानेर के रचनाकार को मिल रहा है। राजस्थानी कहानी आलोचना की पुस्तक “बिना हासलपाई” (2014) को साहित्य अकादेमी पुरस्कार का अभिप्राय बस इतना है कि वर्ष 2011 से 2015 के बीच प्रकाशित पुस्तकों में यह पुस्तक निर्णायकों की नजर में बेहतर सिद्ध हुई है।
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आप व्यंग में भी उतने सहज है जितने आलोचना में ऐसे कैसे हुआ?
व्यंग्य और आलोचना मैं स्वयं को समान भावभूमि पर खड़ा पाता हूं। दोनों के उद्देश्यों में भी कुछ मायनों में समानता है। बिना सहजता के व्यंग्य और आलोचना विधा में काम नहीं किया जा सकता। पाठकों और संबंधितों को भी इन्हें सहजता से लेना चाहिए क्यों कि इन दोनों के पीछे सुंदर और आदर्श समाज का भाव निहित होता है।
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आप लगातार लिख रहे हैं, घर की सभी जिम्मेवारियों को भी निभा रहे हैं, फिर भी कहीं लगता है कि कहीं कुछ छूट रहा हैं?
असल में हमारा जीवन ही ऐसा है कि जिसमें निरंतर बहुत कुछ पीछे छूटता चला जाता है। इस पीछे छूटते जीवन को कुछ अंश तक साहित्य द्वारा बचाने का प्रयास रचनाकार करते हैं। वर्तमान दौर में हिंदी अथवा राजस्थानी लेखन से कोई अपना घर-परिवार नहीं चला सकता। ऐसे में आपको नौकरी भी करनी होती है। मैं नौकरी करते समय एक राजकीय कर्मचारी और घर में अपने संबंधों के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाने के बाद ही अपने भीतर के लेखक को जगाता हूं कि आ जा भैया अब तेरा समय है। हां इतना जरूर है कि घर में पत्नी और बेटे-बेटियां इस बात कि चिंता रखते हैं कि जब मैं लिखता हूं अथवा पढ़ता हूं तब वे मुझे बहुत अवकाश देते हैं। उनके और मित्रों के इसी सहयोग के चलते मैं अपना काम ठीक से करने का प्रयास करता हूं।
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आप एक शिक्षक है और केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ा रहे है और अपने विद्यार्थियों में खासे लोकप्रिय भी, जब उनको पता लगा कि आप को साहित्य अकादेमी के सम्मान से सम्मानित किया जाएगा तो पहली प्रतिक्रिया कैसी थीं, उनकी?
बच्चों को बड़ी खुशी होती है और जाहिर हैं वे पहली प्रतिक्रिया के रूप में पार्टी मांगते हैं। एक बार की बात है मैं किसी प्रशिक्षण में था और वहां भोजनावकाश के बाद एक सवाल किया गया कि आपके बच्चे कितने हैं। बहुत से संभागी अपने अपने विषय में बता रहे थे और जब मेरी बारी आई तो मैंने जबाब दिया दो हजार। सारे चौंके और सवाल करने वाले ने ताली बजाकर सही उत्तर की घोषणा की। मैं मनाता हूं कि एक शिक्षक के रूप में विद्यालय में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी मेरे अपने बच्चे हैं। इस भावना के बिना हम बच्चों के साथ न्याय नहीं कर सकते। इसलिए उनका हक है कि वे पार्टी मांगे, उन्हें पार्टी मिलेगी। हमारे प्राचार्य सरजीत जी ने भी पुरस्कार के बाद बच्चों की पार्टी को पुरस्कार का टीडीएस की संज्ञा दी है। बच्चों को यह टेक्स देते हुए खुशी होती है।
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कितना समय लेखन को, कितना पर्यटन को और कितना घर को देते हैं ?
मेरी एक राजस्थानी कविता है। जिसकी कुछ पंक्तियां हिंदी अनुवाद में यहां साझा करना चाहता हूं। कविता का शीर्षक है- ‘रक्त में मिली हुई भाषा’ आरंभिक पंक्तियां कुछ इस तरह है- “राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में मिली हुई है / यह पंक्ति आपको कविता की पंक्ति नहीं लगे / तो कोई बात नहीं है... / कविता से ज्यादा अधिक जरूरी है भाषा को संभालना / भाषा की हेमाणी लिए खड़ा हूं मैं...” मैंने लेखन के संस्कार अपने लेखक पिता से पाए हैं और मैं अपने भीतर के लेखक को मेरे आस-पास की परिस्थियों के अनुरूप कभी भी सक्रिय कर सकता हूं। मैं जितना भी समय संभव होता है लेखक को देता हूं और देना चाहता हूं, पर्यटन कम संभव होता है पर मैं घर में ही रहना अधिक पसंद करता हूं। किसी आयोजन के लिए बाहर निकलना भी मुझे जरा मुश्किल लगता है। ऐसे में आयोजक मित्रों की यह शिकायत भी रहती है।
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दिनचर्या क्या रहती हैं, मसलन लेखन की और घर के संदर्भ में ?
सुबद जल्दी उठकर कंप्यूटर पर लिखने-पढ़ने की आदत है। विद्यालय जाने से पहले कुछ जरूरी काम करने के बाद अपने लेखक को भूल जाता हूं। मैं हिंदी पीजीटी के रूप में विद्यालय के कार्यों में व्यस्त रहता हूं। पुस्तकालय में जब कभी लेखक जागता है तो उसे मना लेता हूं कि भैया घर पर लौटकर बात करेंगे। घर लौटकर मैं घर-परिवार के छोटे-मोटे काम के बाद मेरी प्राथमिकता लिखना-पढ़ना है। मैंने छोटा-मोटा एक पुस्तकालय घर में ही बना रखा है। किताबों में खो जाने बाद मैं बाहर भी दुनिया को भूल जाता हूं। हां कोई पारिवारिक काम हो तो उसे मैं मेरी प्राथमिकता उसे मानता हूं।
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पहली रचना कौन सी थीं, व्यंग को अपने दिल के करीब मानते हैं या आलोचना से उतना ही सरोकार हैं ?
आज ठीक से पहले रचना की जानकारी नहीं है पर मैंने संभवतः उच्च प्राथमिक स्तर पर लिखना आरंभ किया था। मेरे पिता श्री सांवर दइया को उनके कहानी संग्रह पर राज्य की साहित्य अकादमी के पुरस्कार की घोषणा मैंने दसवीं कक्षा में मंच से होती सुनी तो मुझे गर्वानुभूति हुई और किताब के रूप में मेरा पहला लघुकथा संग्रह 1989 में अकादमी अनुदान से प्रकाशित हुआ था। मेरी साहित्यिक यात्रा में मेरे पिता का योगदान इसलिए भी है कि जब 1992 में उनका असामयिक निधन हो गया तब पहले मैंने उनके साहित्यिक कार्यों को प्रकाश में लाने को प्राथमिकता पर रखा और लगभग पांच वर्षों में उनका अप्रकाशित साहित्य पारिवारिक संसाधनों से प्रकाशित करवाया। उसके बाद मैंने अपना पहला कविता संग्रह ‘साख’ 1997 में प्रकाशित किया। व्यंग्य की तुलना में मैं खुद को आलोचना के करीब मानता हूं। मैंने आलोचना के क्षेत्र में कुछ नवीन प्रयोग करने का प्रयास किया और मुझे खुशी है कि मेरे प्रयास को ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन’ के अवसर पर बाबू मावली प्रसाद श्रीवास्तव साहित्य पीठ, रायपुर द्वारा प्रदत्त पुरस्कार ‘बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार’ पर अर्पित किया गया। चयन समिति ने संस्तुति में कहा- श्री दइया की इस कृति में संग्रहित निबंध किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने और परखने की कथित रूप से जरूरी अकादमिक और क्लासिक परंपरावाली क्लिष्टता और संशलिष्टता के बरक्स आत्मीय और सहज रागात्मक भाषा में मूल्यांकन के नये और कारगर टूल्स को चिह्नांकित करते हैं ।
11.
जिंदगी का लक्ष्य क्या है?
मातृभाषा राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में देखना मेरा एक सपना है, यह पूरा हो जाए। मैं लेखन में अपनी सक्रियाता बनाए रख सकूं और मेरे विद्यार्थी देश के सुयोग्य नागरिक बने।
12.
पुरस्कारों की राजनीति भी होती हैं, क्या ? इस पर कुछ कहेंगे ?
हां, कुछ पुरस्कारों में राजनीति हुई है। राजनीति की बात करें तो इसमें जनमत बदलता है, वैसे ही ऐसे पुरस्कारों और लेखकों की साख भी बदलती रहती है। महानता से पुरस्कार मिल सकते हैं, पर पुरस्कारों से महानता हासिल नहीं की जा सकती है। इस दौर में मूल्यों और आदर्शों का पतन हुआ है किंतु यह लंबे समय तक यह चलने वाला नहीं है। मेरा अपने कार्य के प्रति विश्वास बना रहता है, अगर असहमतियों के बीच भी मुझे लगता है कि मैं सही हूं तो मुझे रुकना नहीं है, निरंतर आगे बढ़ना है।
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साहित्य अकादेमी का वाल साहित्य पुरस्कार आपको 1994 में मिला और मुख्य पुरस्कार 2017 मिल रहा है, अनुवाद पुरस्कार कब मिलेगा?
पुरस्कार मिलना या नहीं मिलना किसी लेखन के हाथ में नहीं है। पुरस्कारों की अपनी अपनी प्रक्रिया होती है। मैंने राजस्थानी बाल साहित्य, कविता, आलोचना आदि विधाओं के साथ अनुवाद के क्षेत्र में भी काफी कार्य किया है। मैं अनुवाद के क्षेत्र में राजस्थानी और हिंदी के लिए कार्य कर सका यह बात किसी भी पुरस्कार से बड़ी है। मैंने अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, मोहन आलोक, भोलाभाई पटेल, डॉ. नन्दकिशोर आचार्य और सुधीर सक्सेना जैसे रचनाकारों की पुस्तकों का अनुवाद किया है। ‘सबद-नाद’ पुस्तक में मैंने भारतीय भाषाओं की कविता को आधुनिक राजस्थानी कविता के संदर्भ में समझने-समझाने का एक प्रयास किया है। अनेक रचनाओं का हिंदी अनुवाद और पाठकों की सराहना ही मेरा पुरस्कार है। रही बात साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार की तो वह प्रक्रिया है कि मिलने पर ही पता चलेगा कि मिल गया है।
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