16 जनवरी, 2018

उठा-पटक लेखक संघ / डॉ. नीरज दइया

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता इस उक्ति से प्रेरित होकर उन्होंने प्रस्तावित किया- सभी लेखको ! एकजुट हो जाओ। वे समझाने लगे- देखिए एक हाथ से ताली नहीं बजती, इसलिए मिलकर रहेंगे तो खुशियां मनाएंगे। वे ऐसा समझा ही रहे थे कि एक लेखक जैसा दिखने वाला आदमी खड़ा हुआ और ताली बजाने लगा। उसे देख कर कुछ दूसरे लेखक-कवि यानी वहां उपस्थित लोग उठ खड़े हुए। सभी तालियां बजाने लगे। बाद में पता चला कि उन्होंने ‘उठा लेखक संघ’ बना लिया है। इस उठा लेखक संघ का उद्देश्य रखा गया- अपनों को उठाओ और ऊंचा उठाओ। इतना ऊंचा उठाओ कि सब हमारे संघ के लेखक-कवियों को उठे हुए यानी कुछ ऊंचे दर्जे के मानने को विवश हो जाए। चारों तरफ अपनों की धूम होनी चाहिए।
    दो-चार सिर-फिरे नियम-कानून मानने वाले सिरफिरे लेखक-कवि उठा लेखक संघ के इस सिलसिले से रुष्ट हो गए। विरूद्ध हुए लेखक बयान देने लगे- कविता-कहानी का ‘क’ तक नहीं जानते, और चले हैं लेखक बनने। ये दो कोड़ी के लोग हैं, कोई लेखक-कवि लोग ऐसे होते हैं क्या? ऐसी हल्की और अशोभनीय बातें सुनकर भी ‘उठा लेखक संघ’ वाले एकजुट रहे। उन्होंने घोषणा कर दी हम एक ही थेली के चट्टे-बट्टे और पक्के रहे। जब एक चना भाड़ नहीं फोड़ सकता तो ये दो चार लोग क्या कर सकते हैं। हमे हमारे संघ के मूल मंत्र पर अडिग रहना है। अपने भाई-बहन यनी संघ के संगी-साथी साहित्य में कुछ भी टूटा-फूटा लिखे या कहीं कोई कुछ बात कहे, बोले तो बस हमें ‘वाह-वाह, बहुत शानदार’ ‘क्या बात कहीं है सर’ जरूर कहना और लिखना है। इन जलों को इतना जलाएंगे कि ये जल कर राख हो जाएंगे। यानी केवल हम ही हम रहेंगे।
    जब ‘उठा लेखक संघ’ के सदस्यों और पदाधिकारियों ने जोर-शोर से अपनी गतिविधियां आरंभ कर दी तो अखबारों में कभी फोटो-रहित, तो कभी फोटो-सहित समाचार छपने लगे। ऐसे में जले भुनों के लिए उनका सामना करने के लिए दूसरे दल का निर्माण करना आवश्यक लगा। फिर क्या था, दूसरा दल अपने दल-बल के साथ उद्घाटित हुआ। जब प्यार किया तो डरना की तर्ज पर उन्होंने ‘जब विरोध किया तो डरना क्या...’ उक्ति से प्रेरणा ली। विरोधिरों ने नाम भी खुल कर प्रतिरोध का रखा। विरोध हो तो जाहिर भी होना चाहिए। उन्होंने नाम रखा- ‘पटक लेखक संघ’। उठा के सामने पटक का मेल तो अद्वितीय होना ही था। इस पटक लेखक संघ ने अपने उद्देश्यों में एक परम उद्देश्य गुप्त रखा। गुप्त आजकल नाम का ही गुप्त है, वैसे वह जगजाहिर ही होता है। ऐसा कोई गुप्त रहस्य नहीं देश में फिर आर टी आई का जमान है तो जाहिर उद्देश्यों में गुप्त उद्देश्य था- उठा उठा के उठा लेखक संघ वालों पटको। ऐसी पटखनी लगाओ कि पूरे उठ जाएं या फिर उठने और उठाने का नाम ही भूल जाएं।
    यह पुराना रिवाज है कि एक संघ वाला दूसरे संघी को पटकनी देता है, तो उसकी हूट दूर तलक जाती है। इतनी दूर तलक कि कोई अगली बार उसे मंच के करीब आते हुए भी डर लगने लग जाता है। हमारा भारत महान तो है ही, इसमें प्रांत और छोटे छोटे शहरों में ऐसी अनेक उठा-पटक तो चलती ही रहती है। जिधर हाथ करो उधर कोई न कोई कबड़ा उजागर हो ही जाता है। वैसे यह जिस शहर की कथा है वह शहर छोटा था और छोटे शहर में चूहा दौड़ होने लगी। थोड़े ही दिनों में उठा की पटक और पटक की पटक दिखने लगी।
    ‘उठा लेखक संघ’ त्रिदिवयी कार्यक्रम करता तो उसकी घोषणा के दूसरे ही दिन ‘पटक लेखक संघ’ वाले पांच दिवसीय कार्यक्रम घोषित करते। वे एक दूसरे से सवाया घोषित करने की उधेड़-बुन में लगे रहते। ऐसे में कभी पटक संघ वाले आगे, तो कभी उठा संघ वाले बाजी मार ले जाते। शहर के बुद्धिजीवियों को ग्रहण लग गया। उनकी इस दौड़ से उनके गले आफत बढ़ती गई। नित नए कार्यक्रमों की बाहर। एक दिन में दो-दो तीन-तीन कार्यक्रम होने लगे। आम आदमी श्रोता यानी दर्शक-श्रोता का दुखी होना ऐसे में जायज था। एक दुखिया आम आदमी इतना दुखी हुआ था कि वह ‘उठा लेखक संघ’ के कविता-पाठ कार्यक्रम में दुखी मन से पहुंच गया, और उसे भी कवि के रूप में अवसर मिल गया। उसने सुनया साहिर लुधियानवी का गीत- ‘जाएं तो जाएं कहां, समझेगा कौन यहां, दर्द भरे दिल की जुबां।’ वहां तो कमाल हो गया, सब उपस्थित जनों ने खूब तालियां बजाई और उससे अनुनय करने लगे- ‘हमारे संघ में आ जाओ। आपका गला बहुत अच्छा है। आपने बहुत अच्छा गीत लिखा है। आपके गीत को तो किसी फिल्म में होना चाहिए। हम सब मिलकर प्रयास करेंगे।’
    आम आदमी को शरारत सूझी, उसने यही प्रयोग दूसरे संघ के कार्यक्रम में जाकर किया। ‘पटक लेखक संघ’ फिर से अपना दर्द साहिर से उधार लेकर सुनाया- ‘जाएं तो जाएं कहां, समझेगा कौन यहां, दर्द भरे दिल की जुबां।’ यहां भी खूब तालियां बजी। वाह-वाही हुई। समवेत स्वर में फिर आमंत्रण मिला- ‘खूब लिखते हो मेरे भाई, हमारे संघ में आ जाओ। खूब तरक्की करोगे। आपके जैसा शब्दों का जादूगर हमें मिल जाए तो देखना हम क्या से क्या करते हैं। आपको कहां से कहां पहुंचा देंगे। आज ही हमें अपना मानो।’
    शहर में हर दिन कोई न कोई कार्यक्रम हो रहा था। एक  पंथ दो काज, ठाले लोग साहित्य लेखन की सेवा में जुड़ते चले जा रहे थे। लोग मिलते रहें और कारवां कवियों का जुड़ता गया। साठोत्तरी कविता तो बहुत पुरानी हो गई यहां साठोत्तरी बंधु-बांधवों का मिलाप हुआ और उनका अच्छा टाइम पास होने लगा। या ऐसा भी कह सकते हैं कि वे अपना अपना और सबका टाइम पास करने लगे। ऐसे में कोई ऐसा तीर चलाया जाना था कि जिससे एक तीर में कई शिकार हो जाए। एक तीर कहीं से आए और उठा लेखक संघ घायल हो जाए और फिर वही तीर पटक लेखक संघ को धरती पटकने में कामयाब हो जाए। आजकल सभी को उठा-पटक पसंद है तो ऐसे में कोई दूर किनारे बैठा कर साहित्य-साधना कैसे करे? आपको कोई दूसरा ज्ञानी लगता तो उससे बतियाना मैंने तो डूबती नैया पंच काका के भरोसे छोड़ दी।
    पंच काका बोले- इस समय में सच कहना-सुनना जरा कठिन है। सचाई यह है कि ये सारे लेखक संघ एक की दो कहने वाले हैं। करते-कराते कुछ नहीं, भड़ास और छपास रोग के मारे मरे जा रहे हैं। गाल बजाना या गला फाडऩा कभी कविता होती है क्या? शहर में साहित्यिक क्रांति नहीं शांति की जरूरत है। शांति के लिए दोनों संघों को मिलाकर संयुक्त गठबंधन में मैं नए संघ का निर्माण करूंगा। संघ का नाम होगा- ‘उठा-पटक लेखक संघ’। साहित्य में केवल उठाने और बस उठते जाने से काम नहीं चलता, और ना ही यह दुकानदारी फकत पटकने और पटकाने से चलने वाली है। किसी भी संघ के उद्देश्यों में सभी पक्षों को शामिल करना जरूरी होता है। वैसे बिना उठा-पटक के तो एकदम शांति हो जाती है। अंत में आम आदमी से काका बोले- निकालो पांच सौ रुपये, मैं तुम्हें ‘उठा-पटक संघ’ का सदस्य बना रहा हूं। अब आम आदमी का मुंह बिल्कुल आम जैसा हो गया था।
००००

डॉ. नीरज दइया
(हास्य-व्यंग्य मासिक “अट्टहास” (संपादक श्री अनूप श्रीवास्तव) जनवरी, 2018 राजस्थान व्यंग्य विशेषांक में प्रकाशित)



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें