27 दिसंबर, 2017

मूल : बुलाकी शर्मा / अनुवाद : नीरज दइया

राजस्थानी कहानी- हिलोर

    हमीद ने झोंपड़ी के पास मोटरसाइकिल रोकी और क्वाटरों के काम का जायजा लेने के लिए आगे रवाना हुआ।
    लाइन से क्वाटर बन रहे थे। पंद्रह-बीस आदमी-औरतें काम में लगे थे।
    “बालनजोगी, टांगों में सत नहीं है क्या? ऐसे कैसे बेसके पड़ रही है? फुर्ती से हाथ-पैर नहीं चलाए जाते?... अरे रामले, तुझे क्या हुआ? टी.बी. के मरीज जैसे क्या मरा मरा सा फावड़ा चलता है? गारा बनाने में इस साहब को क्या जोर आता है भाई..... ?”
    सोहन चलवे की बातें सुन कर हमीद मुस्कुराया। एक तरफ रखी खाट पर बैठते हुए कुछ जोर से बोला, “कैसे चलवोजी, काम ठीक-ठाक चल रहा है ना?”
    बीड़ी का कश खींचते हुए सोहनजी ने पीछे मुड़ क्र देखा, “ओह... ठेकेदारजी आप।”
    “जल्दी-जल्दी हाथ-पैर चलावो देखें।” सोहनजी मजदूरों को हिदायत देते हुए हमीद के पास पहुंचे और खाट के पैताने बैठ गए।
    कमीज के जेब से हमीद ने सिगरेट का पाकेट निकाला। उस में से एक सिगरेट निकाल कर पाकेट सोहनजी के आगे कर दिया। फिर पेंट की जेब से लाइटर निकाल कर सिगरेट जलाई और एक जोरदार कश खींचा। सोहनजी ने भी सिगरेट जलाई।
    “बहुत कामचोर है ये लड़के-लड़कियां। इन से तो बूढ़े भले जो बेचारे अपने वश से भी अधिक काम करते हैं। इन नलायकों को कितना ही डांटो, किंतु चलेंगे तो अपनी ही चाल से।” काम करते मजदूर की तरफ देखते हुए सोहनजी ने कहा।
    भोमा पानी के दो मग ले कर आया।
    हमीद ने मग मुंह से थोड़ा ऊंचा कर एकधार गटागट पानी पीया। पी कर एक कुरला किया और मग को खाट के नीचे रख दिया।
    “आपकी गालियों का भी असर नहीं होता?” हमीद ने मुस्कुराते हुए पूछा।
    “नहीं जी।” एक हाथ से पगड़ी ऊंची करते हुए दूसरे से सिर खुजाते वह बोला, “मेरा ही गला खराब होता है, इन नालायकों को क्या फर्क पड़ता है।”
    इतने में वे गरजे- “तुझे बहुत हंसी आ रही है चिड़कली। कामचोर से काम तो होता नहीं, खड़े-खड़े दांत निकालती है। जल्दी से तगारी भर कर पहुंचाया नहीं जाता क्या?”
    पगड़ी उन्होंने वापस सिर पर रखली।
    चिड़कली की हंसी थम गई पर आंखें अब भी हंस रही थी। होले से बोली- “मैं क्या करूं, संतिया ई तगारी नहीं भरता।”
    “किस बात की मजाक करता है रे संतिया।” अब वे संतिये पर गुस्सा हुए- “यह क्या तेरे, मैं कह दूंगा अभी लगती है। तगारी भरी नहीं जाती क्या? कहां से आ कर जम गए ऐसे ढीठ?”
    संतिये ने गारे से तगारी भरी। चिड़कली उठा कर कारीगर की तरफ रवाना हो गई।
    हमीद उसे ही देखता रहा। उसे यह नई लगी। करीब अठारह साल की होगी। मंझला कद। सुंदर नैन-नक्स, उन में किनारे तक लगाया कजल। गहरी मांग भरे थी। पीली ओढ़नी और हरी छींट का लंहगा पहने हुए। ओढ़नी का एक सिरा कांचली में दबाए हुए।
    सोहनजी ने उसकी नजरों का कहा जैसे सुन लिया- “कल ही आई है यह। बहुत हाथ-पैर जोड़ने लगी तब रख ली।”
    “अच्छा किया।” हमीद ने कहा।
    संतिया गारे से तगारी भरता है, चिड़कली झुक कर उठाती है और इंटे लगाते कारीगर तक गारा पहुंचाती है। फिर से आती है, गारे से तगारी भरावती है और वही क्रम।
    हमीद की नजरें लगातार उस के पीछे।
    सोहनजी उसे देख कर मुस्कुराए। आवाज दी- “अरे चिड़कली, जा लिच्छू की होटल से ठेकेदारजी के लिए चाय ले कर आ।”
    उस ने गारे की तगारी भरवाई, उठाई और रवाना हो गई। जैसे सुना ही नहीं।
    वे गुस्सा होते खाट से खड़े हुए। जोर से कहा- “बहरी है क्या? सुना नहीं मैं क्या कह रहा हूं?”
    “मैं अपना काम कर रही हूं ना, किसी दूसरे से कह दें।” कारीगर के पास तगारी खाली करती हुई वह वापस आ कर भोमले से तगारी भरवाने लगी। तगारी भर गई, उस ने उठाई और फिर रवाना हो गई।
    अब सोहनजी से कहां सब्र होता। वे उसी के पास पहुंच गए और तगारी छीन कर दूर फेंकते तीखे स्वर में बोले- “बहुत काम कर के निहाल कर दिया। जा केतली ले कर चाय ला। आई है बहुत काम करने वाली।”
    चिड़कली के सिर पर तीन सलवटें घिर आई। कुछ समय वह चलवोजी की तरफ देखती रही। चलवोजी गुस्से में थे। केतली ले कर वह चुपचाप रवाना हो गई।
    सोहनजी ने चलवे हमीद के सामने देखा और दोनों एक ही भाव से होले-से मुस्कुराए।
    हमीद ने नई सिगरेट जलाई। एक शानदार कश लिया और खाट से खड़ा हो लिया।
    काम करने वालों की तरफ आया। बनते क्वाटरों का चक्कर लिया। कुछ समय कारीगरों को ईंटें लगाते देखता रहा। फिर होले-होले उस के कदम झोंपड़ी की तरफ बढ़ने लगे।

  
    चिड़कली चाय ले कर आई। केतली और कप खाट के करीब रखे और कुछ गर्म हो कर बोली- “यह लो चाय, चलवोजी।”
    सोहनजी मजदूरों की तरफ खड़े थे। वहीं से नाराज होते कहा- “तुम तो एकदम पागल हो। अरे कपों में डाल। एक कप ठेकेदारजी को दे कर आ। वे झोंपड़ी में बैठे हैं।”
    बेमन उस ने कपों में चाय डाली। एक कप ले कर झोंपड़ी के सामने पहुंची और वहीं खड़ी होकर बोली- “लिजिए चाय।”
    हमीद भीतर खाट पर बैठा था। नजरे मिलाती बोली- “लेना।”
    चिड़कली के पैर वहीं चिपक गए।
    “अरे भाई, चाय ठंडी हो रही है ना।” हमीद कोमलता से बोला।
    वह भीतर गई। एक कदम दूर से ही कहा- ‘लिजिए” आउर कप जमीन पर रखने के लिए नीचे झुकी।
    “नहीं-नहीं, नीचे नहीं रखना।” हमीद तपाक से खड़ा हो गया- “धूल गिर जाएगी।... लाओ मुझे दो।”
    हमीद ने हाथ लंबा किया। कप लिए उसा ने हाथ आगे कर दिया।
    “आ बैठ... ” वह चिड़कली को कहने वाला ही था पर उस से निजरे मिलते ही उस की आंखों से गुस्सा बरस रहा था। आंखों में भड़का हुआ गुस्सा जोर पर था। गुलाबी पंखुड़ियों सरीखे होंठ फड़फड़ाने लगे। सांसें तेज चलने लगी।
    हमीद यह तेज लावा सहन नहीं कर सका और उसका हाथ सुस्त हो गया।
    चिड़कली ने कप नीचे रखा। लाल आंखों से उस को देखा और झोंपड़ी से बहार निकल गई। हमीद को जैसे पसने छूट गए। सुन्न-सा निढाल खाट पर गिर गया।
    उस में डर समा गया। चिड़कली ने शोर-शराबा कर दिया तो? इस प्रकार की लपटों से पहली बार सामना हुआ था। खूब औरतों को देखा था लेकिन चिड़कली जैसी एक भी नहीं। वह मजाक करता तब मजदूरनियां खुश होती, आंखें मटकारती हंसती और उसे आगे का रास्ता मिल जाता।
    पर यह चिड़कली? जरूर उस ने गुस्से में उस के बारे में उलट-पुलट कर दिया होगा। मजदूर कुछ नहीं कहेंगे, पर उन की आंखों में घिरते सवालों के उत्तर उस के पास कहां होंगे? उस की बरसों की साख आज मिट्टी में मिलेगी। झोंपड़ी से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई उस की।
    चिड़कली झोंपड़ी से बाहर आ कर काम करने लगी। किसी से कुछ नहीं कहा। पर चेहरे पर गुस्से की टेढी-मेढ़ी रेखाएं साफ नजर आ रही थी।
    दोपहर का समय हुआ तब उस की सहेली झमकू ने पास आ कर कहा- “आ, नाश्ता कर लें।”
    “मुझे भूख नहीं।” उस ने सामने ही नहीं देखा।
    “क्या हुआ री भूख के?” झमकू ने उसे शक की निगाहों से देखते कहा।
    “कह दिया ना, इच्छा नहीं है।”
    झमकू आगे कुछ पूछे उस से पहले वह अलग दिशा में चली गई।
    पानी के कुंड के पास पहुंच कर चिड़कली ने दोनों हाथों से पानी ले कर मुंह को छींटे दिए। सिर को भी गिला किया। फिर कांचली में ठूंसी हुई ओढ़नी का सिर निकाल कर उस से सिर-मुंह पोंछा।
    फिर वह बजरी पर पलाथी लगा कर बैठ गई। कोहनियां पलाथी से सटा कर हथेलियों में अपना चेहरा लिए सोचती रही।
    मजदूरी पर आते आज उस का दूसरा ही दिन था। काम करने आना जरूरी था। घर के हालात किसे से छुपे नहीं। शादी की मेंहदी अभी हाथों से गई नहीं। छह महीने ही नहीं हुए शादी को। घर में बड़ा परिवार। बस एक कमाऊ उस का पति। उस ने तो मनाही दी, बोला रहने दे ऐसे ही गुजार-बसर हो जाएगी। जैसे-तैसे कर लेंगे। पर उस से अपने मरद की दौड़-भाग नहीं देखी गई। कितना काम करता है। सुबह हाथ गाड़ा ले कर निकलता है। दिन में ऊन के बोरे एक कोटड़ी से दूसरी कोटड़ी में पहुंचाता है। रात गए आता है तब बैठने की भी हिम्मत नहीं रहती।
    पर ठेकेदारजी ऐसे करेंगे तब कैसे बसर होगा। अपने आदमी को बताए तो और भी बुरा। वह मरने-मारने पर उतर आएगा। उसे काम छोड़ना होगा और एकेला घाणी के बैल जैसा वह शरीर तोड़ता रहेगा।
    चिड़कली की आंखें गिली हो आईं।


    उस दिन के बाद चिड़कली की हंसी-मजाक सब बंद हो गई। चुपचाप काम करना, किसी के बिना मतलब के बोलना नहीं। सहेलियां कभी मजाक करती- “घरवाले की याद सताती रहती है, ऐसे क्या गुमसुम बनी रहती हो?”
    वह कुछ जबाब नहीं देती।
    चलवोजी भी उस से अधिक गुस्से से नहीं बतियाते। क्या कहे, वह बिना आराम किए काम करती रहती, काम में ढीठाई करे तब अवसर मिले उन्हें कुछ कहने का।
    हमीद दस बजते ही खाट पर आकर बैठ जाता। बैठा-बैठा सिगरेटे फूंकता। दो-चार बार घूम कर काम का जायजा लेता, कभी झोंपड़ी में आ कर आराम करता। उस ने यह सोच कर धैर्य धारण किया कि चिड़कली ने किसी से कुछ नहीं कहा। काम पर भी लगातार आ रही है, समय के साथ खुद ही मजदूरी के नियम-कायदे सीख जाएगी। उस की निगाहें चिड़कली पर ही रहती।
    नीचे झुक कर ईंटें उठाती, गारे की तगारी उठाती, ओढ़नी के छोर से पसीना पोंछती, प्याज-रोटी खाते, सहेलियों को आंखें निकालती, हथनी जैसी मंथर चाल से घूमती-फिरती चिड़कली- यकायक हमीद की निगाहों में स्थिर हो जाती है।
    हंस कर उस की बात मानने वाली लड़कियों को वह दूसरे ही दिन भूल जाता पर चिड़कली की रक्तिम आंखें वह नहीं भूला सका। गुस्से से तमतमाये चेहरे की जगह वह मुस्कुराता चेहरा देखना चाहता है और चाहता है कि चिड़कली अपने आप मान जाए।
    दोपहर के समय एक बार चिड़कली कीकर के नीचे बैठी सुस्ता रही थी। होले-होले पैर रखते हुए हमीद उस कीकर के पास पहुंचा। चिड़कली खुद में खोई थी। उसे के आने की उसे खबर ही नहीं लगी।
    कुछ दूरी पर खड़ा वह चिड़कली को निहारता रहा। चेहरे पर चिंता और मजबूरी की रेखाएं। बाएं हाथ में एक तिनका लिए, वह उस से दांत कुचर रही थी।
    सिर पर होले-से थपकी दे कर हमीद ने उसे सचेत करने की सोची पर हिम्मत का हाथ बढ़ ना सका।
    “सुस्त कैसे है, चिड़कली?” मधुर स्वर में हमीद बोला।
    वह चौंकी जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो। फुर्ती से खड़ी होने लगी।
    “बैठी रहो, बैठी रहो” हमीद ने हाथ से टोक दिया- “मैं कुछ नहीं करूंगा।"
    वह सचेत हो कर बैठ गई। अब वह तिनके से जैसे मिट्टी पर मांडने बनाने लगी।
    “क्या हुआ तुम्हारे? ऐसे कैसे सुस्त और उदास रहती है?”
    उस ने जबाब नहीं दिया।
    कीकर की फली तोड़ कर हमीद ने उसे होले-होले मसला और दूर गिराते कहा- “मेरी नियत खराब नहीं पर तुम मुझे अच्छी लगती हो। जिस समय देखा, उसी समय से मेरे मन में तेरी ठौर बन गई।”
    “इस में मैं क्या करूं ठेकेदारजी”, चिड़कली शांत नहीं थी, यह बात उसकी ऊपर-नीचे होती कांचली कह रही थी।
    “अच्छा लगता है उसे हर कोई पाना चाहता है।” हमीद का स्वर बहुत धीमा था।
    “आप को तो मेरा काम अच्छा लगना चाहिए, तभी मुझे रोजगार मिलेगा।”
    “तुम तो निरी भोली हो, चिड़कली”, वह उसे समझाने लगा- “तू ने मेरे मन को गिरफ्त में ले लिया। एक बार मन की बात रख दे। रोजगार की चिंता फिर रहेगी ही नहीं।”
    गर्दन उठा कर उस ने उस के सामने देखा। कुछ समय एकटक देखती रही, फिर पूछा- “मन रखने के बाद आप अपने घर ले कर चलेंगे क्या? पत्नी बना क्र रखेंगे मुझे?”
    उस से जल्दी से उत्तर नहीं बना। कीकर की डाले पकड़ता छोड़ता रहा। कांट गड गया और अंगुली से खून गिरने लगा। अंगुली चूस कर खून बंद किया। फिर दीनता से हंसने की चेष्टा करते हुए बोला- “मजाक कर रही है क्या? तुम दूसरे की ब्याहता घर में कैसे रख सकता हूं।"
    “मैं मेरे मरद को छोड़ कर आ जाऊंगी। बोलिए है मंजूर? फेर जैसा आप चाहे होगा।” चिड़कली की नजरें उस पर टिक हुई थी।
    हमीद का गला सूखने लगा। माथे पर पसीने की बूंदे चमकने लगी। उसे समझ नहीं आया कि आज इतना बेवश कैसे हो गया। दूसरी मजदूरनियां उस के सामने होंठ तक नहीं हिला सकती पर यह तो सवालों के और वे भी इतने ऊंचे टीलों जैसे खड़े कर दिए कि वह उन टीलों में धंसता ई जा रहा है।
        कुछ समय चिड़कली उस को देखती रही, फिर नम्रता से बोली- “आप मेरे माई-बाप हो ठेकेदारजी। मजबूरी की मारी मैं आती हूं। आप को पैसों के बल पर मुझ से भी रूपवती मिल जाएगी। आप के किस बात की कमी। आप मुझे माफ कर दें ठेकेदारजी।”
    चिड़कली ने हमीद के पैर पकड़ लिए।
    “आपकी चाहत मैं पूरी नहीं कर सकती। अप को मेरी चाम प्यारी है पर यह मेरे मरद की है। उस पर मैं आंच नहीं आने दूंगी।” चिड़कली खड़ी हो गई- “अब यहां नहीं तो किसी दूसरी जगह काम करूंगी। मुझे माफ करना ठेकेदारजी।”
    उस ने एक बार हमीद की तरफ देखा, फिर गर्दन नीची किए रवाना हो गई।
    हमीद संज्ञाविहीन हो गया। जाते उसे देखता रहा। फिर जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता उस के करीब पहुंचा और दीनता से बोला- “नहीं-नहीं यहीं काम कर। तुझे मेरी सौगंध। तुझे यहीं काम करना है। ... तुझे कोई कुछ नहीं कहेगा। किसी चीज वस्तु की जरूरत हो तो चेलवोजी से कह देना।”
    वह चिड़कली के सामने भी नहीं देख सका।
    तेज-तेज कदमों को उठाता मोटरसाइकिल के करीब पहुंचा, किक लगा कर स्टार्ट की और धुंआ छोड़ता निकल गया।
  
    ढाई-तीन महीनों क्वाटरों का काम चला पर हमीद एक बार भी नहीं आया। चलवोजी ही काम देखते रहे।
    काम करते हुए चिड़कली ने एक दिन अचानक सोचा- “ठेकेदारजी इन दिनों एक बार भी नहीं आए, क्या हुआ होगा उन के.... एक बार आए तो कितना अच्छा रहे....।”
०००००
अनुवाद : नीरज दइया


अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति,अमेरिका की प्रमुख त्रैमासिक पत्रिका “विश्वा” (प्रधान संपादक श्री रमेश जोशी, ओहायो) के अक्टूबर, 2017 अंक में प्रख्यात कहानीकार श्री बुलाकी शर्मा की प्रसिद्ध राजस्थानी कहानी का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। 




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें