10 दिसंबर, 2017

राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता

डॉ. नीरज दइया
    साहित्यिक पत्रकारिता के विकास में राजस्थान का महत्त्वपूर्ण योगदान इस रूप में रहा है कि यहां न केवल हिंदी, वरन राजस्थानी, उर्दू, सिंधी व अन्य भाषाओं की साहित्यिक पत्रिकाएं भी प्रकाशित हुई है। वर्तमान में भी अनेक पत्र-पत्रिकाएं राजस्थान के साहित्यिक वातावरण को गतिशील किए हुए है। कहा जा सकता है कि राजस्थान के संपादकों-पत्रकारों ने इस तथ्य को समझा है कि साहित्य की समाज में अहम भूमिका होती है। भारतीय साहित्य में अगर हम विविध विधाओं के विकास और संवर्द्धन की बात करें तो यहां के साहित्य का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हो सका है। यहां के रचनाकारों की दोहरी भूमिका उल्लेखनीय है कि उन्होंने साहित्य लेखन के साथ साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया है। वैसे साहित्यिक पत्रकारिता के मूल में मुख्य आधार वही सफल हुए हैं जहां संगठित होकर प्रयास किए गए हैं। फिर भी सरकारी और गैर सरकारी साहित्यिक संस्थाओं के अतिरिक्त अनेक व्यक्तिगत प्रयासों की भी सराहना करनी होगी कि जिनके अथक प्रयासों से यह परंपरा पोषित होती रही है। अधिकांश पत्रिकाओं का संपादन अवैतनिक और अव्यवसायिक रहा है।
    साहित्यिक पत्रकारिता में स्थितियां भले कभी कुछ लाभ की नहीं रही हो किंतु यह घर फूंक कर तमाशा देखना एक मिशन की बात है। आज तकनीकी विकास और आधुनिकता के दौर में साहित्यिक पत्रकारिका के संबंध में रहीम जी की पंक्तियां स्मरणीय हैं- रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि। जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि। राजस्थान की पत्रकारिता के संदर्भ में यह बात कुछ अधिक प्रासंगिक हो जाती है। राजस्थान के इतिहास में जाएं तो कहना होगा कि शौय-वीरता की इस धरती पर राजपूताना रियासतों के समय पत्रकारिता का आगाज हुआ। तत्कालीन समाज में राजनैतिक और समाजिक चेतना की जागृति हेतु समाचार पत्रों की महती भूमिका रही है। यहां की जनता पर राष्ट्रीय समाचार पत्रों का विशेष योगदान रहा, वहीं अजमेर, ब्यावर और जयपुर से अनेक समाचार पत्र प्रकाशित हुए। विभिन्न स्वतंत्रता सेनानियों जिनमें विजय सिंह पथिक, रामनारायण चौधरी, जयनारायण व्यास, सेठ जमनालाल बजाज आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है जिनका योगदान राजस्थान केसरी, नवीन राजस्थान, तरुण राजस्थान, प्रजा सेवक, अखंड भारत व आगीवाण जैसे पत्रों को प्रकाशित करने में रहा। साथ ही उन्होंने अनेक ने कविताओं और आलेखों के माध्यम से जनचेतना का संचार कर आजादी की अलख जगाने का प्रसार किया।
    पुस्तक ‘राजस्थान में जन-जागरण एवं पत्रकारिता’ के लेखक डॉ. रामचन्द्र रूण्डला अपनी शोध-खोज के आधार इस पर इस बात पर सहमत होते हैं कि राजस्थान में पत्रकारिका का आरंभिक दौर मनोरंजन और सुधारवादी दृष्टिकोण पर आधारित रहा। भारत में जहां पहला समाचार पत्र 1780 में प्रारंभ हुआ तो राजस्थान में 1949 में भरतपुर के शासक द्वारा हिंदी-उर्दू द्विभाषी पत्र ‘मजहरूल सरूर’ आरंभ हुआ। इस मासिक पत्र को राजपूताना का प्रथम पत्र माना जाता है। डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र अपनी कृति ‘हिंदी पत्रकारिता’ में जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य के निर्माण की भूमि तलाश करते हुए विभिन्न तथ्यों को उजागर करते हैं। किंतु राजस्थान की पहली साहित्यिक पत्रिका के विषय में अब भी शोध शेष है। इस दिशा में स्वतंत्र कार्य किए जाने की आवश्यकता है।
    आजादी के बाद प्रांतीय सरकारों ने साहित्य के विकास और उत्थान को ध्यान में रखते हुए अकादमियों की स्थापना की। इसी क्रम में राजस्थान में भी अकादमियां स्थापित हुई। आरंभ में राजस्थान साहित्य अकादमी (संगम) के नाम से वह हिंदी के साथ राजस्थानी भाषा के लिए कार्य करती रही थी प्रकारांतर में राजस्थानी के लिए पृथक से राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की स्थापना हुई। वर्तमान में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर की मासिक पत्रिका मधुमति की सक्रियता इस रूप में है कि यह पत्रिका नियमित प्रकाशित हो रही है। सरकारी पत्रिकाओं का स्वरूप और रूपरेखा उसके संपादक और यहां कहा जाना चाहिए कि अध्यक्ष के बदल जाने से परिवर्तित होती है। देश में प्रकाशित होने वाली इस प्रकार की पत्रिकाओं में प्रायः जो सरकारी ढंग की एकरूपता-एकरसता को देखा जा सकता है उससे यह अकादमी भी अछूती नहीं है। नए अध्यक्ष और संपादक जो कुछ करना चाहते हैं अथवा करते हैं वह कुछ गतिशील होता है कि उनका समय समाप्त हो जाता है। नए चेहरे बाजय काम को देखने के पुराने चेहरों के काम को नकारते हुए अपने ढंग से कोइ नया काम करने की चेष्टा में फिर से नई पारी का आरंभ करते हैं।
    इस विषय का एक पक्ष यह भी है कि साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक पत्रकारिता से जुड़ कर भी पत्रकार कहलाने के अधिकारी नहीं हैं। समाचार पत्रों के पत्रकार साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को पत्रकार की श्रेणी में नहीं मानते हैं। ऐसे संपादक-पत्रकार सदैव प्रकाशन संकट से जूझते, सीमित संसाधनों में पत्रिका निकालते हैं। वे रचनाकारों को मानदेय नहीं दे पाते हैं, रचनाकार भी अपनी वरियताओं के रहते इन्हें रचनाएं देने का अपना क्रम रखते हैं।
    कहने को तो अन्य प्रांतों की भांति राजस्थान से बहुत अधिक साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हुई अथवा हो रही हैं किंतु ये अपने जिले-प्रांत की सीमाओं से बाहर निकल कर कुछ रचनात्मक पहचान बनाए तभी इनकी सार्थकता है। साहित्यिक पत्रिका के संपादक जो लेखक-कवि हैं ने पत्रकारिता को एक जरिया बनाने का प्रयास किया है जिससे कि वे स्वयं और अपने मित्रों को महान सिद्ध करने का उपक्रम सिद्ध कर सकें। साहित्य में कुछ लाभ लेने-देने के दृष्टिकोण से आरंभ की गई ऐसी पत्रिकाओं का प्रकाशन ऐसी सिद्धियों के बाद रोक दिया जाता है। कहना होगा कि खरी और सच्ची पत्रिकाएं बहुत कम है, जिनसे राजस्थान का नाम वर्तमान परिदृश्य में गर्व से लिया जा सके। खैर जैसे भी स्थितियां और हालात रहे हों किंतु इन साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का वातावरण निर्माण और नए लेखकों को मंच देने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भाषा, साहित्य तथा संस्कृति के क्षेत्र में साहित्यिक पत्रिकाओं का अतुलनीय योगदान स्वीकारा गया है।
    राजस्थान के अनेक दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक समाचार पत्र साहित्य को प्रमुखता देते हुए अपने परिशिष्ट प्रकाशित करते हैं। साहित्यिक लघु पत्र-पत्रिकाओं के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि ’लहर‘, ’बिन्दु‘, ’वातायन‘ ‘कृति ओर’ और ’पुरोवाक‘ आदि अनेक पत्रिकाओं ने हिन्दी जगत में अपनी पहचान बनाई। लघु संसाधनों के बावजूद भी इन पत्रिकाओं ने बड़े पाठक वर्ग तक अपनी पहुंच का दायरा बनाया।
    वैसे तो राजस्थान से अनेक लघु पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित हुई और हो रही है किंतु यहां कुछ प्रमुख पत्रिकाओं की चर्चा इस आश्य से कर रहा हूं कि इस दिशा में व्यापक शोध-खोज से नए तथ्य प्रकाश में आएंगे। यहां किसी पत्रिका अथवा संपादक के कार्य का मूल्यांकन कम या अधिक के आधार पर नहीं किया जा रहा है, यह तो बस एक विहंगम परिदृश्य को देखने देखाने का प्रयास भर है।
अक्सर : त्रैमासिक रूप में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका के संपादक प्रख्यात कवि हेतु भारद्वाज है। जयपुर राजस्थान से प्रकाशित इस पत्रिका के अपने खास तेवर हैं। इस पत्रिका में जहां हिंदी साहित्य की विविध गतिविधियों और घटनाक्रम को समाहित किया जाता है वहीं परंपरा बोध के परिपेक्ष्य में साहित्यिक आलेख और अन्य सामग्री दी जाती है। गहरी सूझ-बूझ और विचारोत्तेजकता देख सकते हैं।
अनुकृति : यह त्रैमासिक पत्रिका जयश्री शर्मा के संपादन में जयपुर से प्रकाशित होती है।
अनुक्षण- प्रयास संस्थान चूरू की त्रैमासिक पत्रिका अनुक्षण के संपादक उम्मेद सिंह गोठवाल हैं। वर्ष 2015 में आरंभ हुई इस पत्रिका में कविता, कहानी, साक्षात्कार, संस्मरण आदि विधाओं को शामिल कर इसे भरा पूरा बनाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
अभिनव संबोधन- इसका प्रवेशांक हाल ही में आया है। इसमें दो अनुभवी रचनाकार जुड़े हुए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इनके द्वारा बेहतर काम होगा। प्रसिद्ध संपादक कमर मेवाड़ी पत्रिका के सलाहकार संपादक हैं तथा कहानीकार-कवि माधव नागदा संयुक्त संपादक है।
अरावली उद्घोष : इसका मासिक प्रकाशन उदयपुर से होता है। इसके संपादक बी पी वर्मा पथिक हैं। आदिवासी मीडिया व साहित्य के लिए समर्पित यह पत्रिका उल्लेखनीय है।
इतवारी पत्रिका : यह राजस्थान पत्रिका का प्रकाशन था, जिसमें प्रति रविवार साहित्य के अतिरिक्त समाज,देश और राजनीति पर साहित्यिक दृष्टिकोण से सजग साहित्यकारों के वैचारिक आलेख प्रकाशित होते थे। बड़े प्रकाशन समूह से जुड़े होने के बाद भी इतवारी पत्रिका ने व्यवसायिकता के साथ साहित्यिक दृष्टिकोण से लंबा सफर तय किया।
उत्पल : बोधि प्रकाशन द्वारा साहित्यिक पत्रिका प्रकाशन के क्रम में ‘उत्पल’ पत्रिका आरंभ की गई। कवि-संपादक और प्रकाशक मायामृग ने पत्रिका बड़े साज-सज्जा के साथ निकाली किंतु इसे नियमित नहीं रखा जा सका। इसके अंक संग्रहणीय कहे जा सकते हैं।
एक और अंतरीप : जयपुर से अजय अनुरागी इस पत्रिका को पिछले 23 वर्षों से प्रकाशित कर रहे हैं। इसका ताजा अंक अप्रैल-जून, 2017 को वरिष्ठ लेखक हेतु भारद्वाज पर केन्द्रित किया गया है।
कथारंग- युवा नाटककार-कवि हरीश बी. शर्मा ने बीकानेर शहर और संभाग में कथा साहित्य की परंपरा में तेजी से आए बदलावों को केंद्रित करते हुए अनेक कहानीकारों को कथारंग पत्रिका के माध्यम से मंच दिया है। यह एक अनुपम उदाहरण है कि किसी क्षेत्र विशेष में इतनी संख्या में कथाकार हो सकते हैं। इसका नया और तीसरा अंक लघुकथा पर केंद्रित आया है।
कथाराज- श्रीडूंगरगढ़ जब चूरू जिले में था तब यह कहानी केंद्रित पत्रिका चेतन स्वामी के संपादन में प्रकाशित होती थी। राजस्थान में नई कहानी के दौर में इस पत्रिका की अहम भूमिका रही है। 
कालबोध : प्रख्यात लेखक यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’ ने बीकानेर से कालबोध पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। विशेष रूप से यह गद्य साहित्य और कथा केंद्रित पत्रिका कही जाती थी। बाद में 1957-58 के आस पास ‘नई चेतना’ नाम से पत्रिका का प्रकाशन किया गया।
किरसा : सूरतगढ़ से युवा साहित्यकार सतीश छिम्पा ने इस अनियतकालीन पत्रिका के तीन चार अंक प्रकाशित हुए। इसमें युवा रचनाशीलता के साथ संपादक की गहरी सूझ-बूझ देखी जा सकती है।
कुरजा संदेश : पत्रकर लेखक ईश मधु तलवार के संपादन में इस पत्रिका के अनेक विशेषांकों से कीर्तिमान स्थापित किया है। इसके सभी विशेषांक बेहद चर्चित रहे हैं। फिलहाल राजस्थानी कहानी पर केंद्रित भव्य और विशाल विशेषांक चर्चा के केंद्र में है।
कृति ओर- वरिष्ठ कवि विजेंद्र और डॉ. रमाकांत शर्मा के संयुक्त प्रयासों से इस पत्रिका ने कविता और आलोचना के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है। अपनी सुदीर्घ यात्रा में यह पत्रिका रुकी पर कभी झुकी नहीं। लंबे अंतराल पर भी अपने पाठकों-लेखकों का विश्वास बनाए रखा। इस पत्रिका का “लोकधर्मी कविता विशेषांक” अंक 60-61 विशेष चर्चा में रहा। इसका नया अंक 83-84 जनवरी-जून, 2017 विजेंद्र के निर्देशन में संपादक अमीरचंद वैश्य द्वारा प्रकाशित किया गया है।
खोजो और जाने : यह पत्रिका विद्या भवन उदयपुर की है जो शिक्षा जगत और समाजिक वैचारिकता पर केंद्रित है।
चर्चा : जोधपुर के कवि योगेन्द्र दवे ने लंबे समय तक कविता के विविध रूपों पर केंद्रित इस पत्रिका को चलाया। चर्चा के कवि और कविता पर केंद्रित अनेक अंक चर्चा में रहे।
तटस्थ : सीकर के शोध विद्वान डॉ. कृष्णबिहारी सहल ने इस त्रैमासिक पत्रिका को लघुपत्रिकाओं के निराशाजनक दौर में चालीस से अधिक वर्ष सतत सक्रिय बनाए रखा। यह बहुत पुरानी पत्रिका है जिसमें रचनात्मकता व विविधता किसी व्यवसायिक पत्रिका से कमतर नहीं है।
दृष्टिकोण : यह पत्रिका नरेन्द्र कुमार चक्रवर्ती कोटा से प्रकाशित कर रहे हैं।
नई गुदगुदी- जयपुर से प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका का आकार भले छोटा हो किंतु हास्य और व्यंग्य के क्षेत्र में इसका बहुत नाम है। वर्षों से सक्रिय इस पत्रिका ने अनेक लेखकों और व्यंग्यकारों को जहां मंच दिया, वहीं सही और सच्ची बात करने से भी कभी गुरेज नहीं किया।
नजरिया : युवा कवि दिनेश चारण ने 2013 में इस पत्रिका को आरंभ किया और अब तक के प्रकाशित अंकों के आधार पर वे संभावनाओं से भरे संपादक के रूप में छवि बना चुके हैं। नजरिया में भाषा, साहित्य और संस्कृति के साथ समग्र कला माध्यमों को एक नजरिये से देखने-परखने और प्रस्तुत करने का साहस देखा जा सकता है। एक पुस्तक पर अनेक समीक्षकों से मूल्यांकन और भारतीय भाषाओं की रचनाओं को हिंदी में प्रस्तुत करना इसकी अन्य विशेषता कही जा सकती है। 
नया शिक्षक : शिक्षा विभाग राजस्थान की इस द्विभाषी पत्रिका का प्रकाशन त्रैमासिक होता था। इसका शिक्षा जगत में बड़ा नाम रहा है। इसमें साहित्यिक पुस्तकों की समीक्षा का अपना स्तर था। 
परंपरा- राजस्थानी शोध संस्थान जोधपुर की इस शोध पत्रिका ने अपनी सुदीर्घ यात्रा में राजस्थान और राजस्थानी को केन्द्र में रखा। इसके अनेक अंक आज भी स्मरणीय और धरोहर के रूप में याद किए जाते हैं। प्राचीन, मध्यकालीन साहित्य और अप्रकाशित साहित्य भंडार पर उल्लेखनीय कार्य हुआ।
पुरोवाक- पीयूष दईया के संपादन का यह उनकी पत्रकारिता का पहला आस्वाद था। इसमें निर्मल वर्मा और कृष्ण बलदेव बैद सरीखे लेखकों के साथ राजस्थान के कला जगत को और आधुनिक दृष्टिकोण को केंद्र में रखा गया था। एक दो अंकों के बाद इसका प्रकाशन स्थगित हो गया।
प्रतिलिपि : कवि गिरिराज किराडू ने इसे आरंभ में इंटरनेट पर और बाद में प्रिंट रूप में प्रकाशित किया। विशेष चयन दृष्टि और कुछ प्रिय लेखकों-कवियों के रचना-संसार में एक नए लेखक की उत्सुकता और सम्मान की दृष्टि यहां देखी जा सकती है। वर्तमान में भी अपनी वेव साइट और प्रिंट अंकों से कुछ खास रुचि के रचनाकारों पर इनका कार्य मंथर गति से चल रहा है।
प्रतिश्रुति : इसे जोधपुर से साहित्यकार रामप्रसाद दाधीच ने त्रैमासिक प्रकाशित किया। मरुधर मृदुल द्वारा संपादित यह पत्रिका लगभग दस वर्षों तक राजस्थान की रचनाशीलता को व्यापक परिदृश्य में स्थापित करती रही।
बनास : संपादक पल्लव ने उदयपुर से ’बनास‘ का प्रकाशन आरंभ में अनियतकालीन रखा। अब यह दिल्ली से प्रकाशित हो रही है। यह साहित्य में व्यक्ति और साहित्य केंद्रित उपक्रम से अपने हर अंक में एक नयी और जीवंत बहस को स्थापित करने वाली पत्रिका है। ‘काशी का अस्सी‘ के बहाने इस पत्रिका ने हिन्दी उपन्यास के स्वरूप पर गंभीर बहस कर साहित्यकारों एवं पाठकों का ध्यान खींचा। समकालीन रचनाशीलता पर किसी कृति अथवा कृतिकार पर अंक प्रकाशित करना संपादक की जिद और जनून है, जिसके रहते वे हर बार असंभव दिखने वाला कार्य संभव कर दिखाते हैं।
बाल वाटिका- प्रख्यात बाल साहित्यकार भैरूंलाल गर्ग ने बाल साहित्य के क्षेत्र में अनुपम काम कर दिखया है। अब तक दो सौ पचास से अधिक अंकों में बाल वाटिका राजस्थान ही नहीं वरन देश की ऐसी पत्रिका है जिसे बाल साहित्य के क्षेत्र में किसी भी प्रकार की चर्चा से पृथक नहीं किया जा सकता है। बाल साहित्य की विविध विधाओं और आलोचना के साथ विचार-विमर्श में संपादक भैरूंलाल गर्ग की गहरी सूझ-बूझ और प्रखर दृष्टि देखी जा सकती है।
बालहंस (पाक्षिक) राजस्थान पत्रिका के इस प्रकाशन ने बाल पाठकों में अपना गहरा स्थान बनाया है। यह पत्रिका राष्ट्रीय स्तर भी चर्चित और लोकप्रिय पत्रिका रही है।
मधुमति- राजस्थान सहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका मधुमति की सुदीर्घ यात्रा रही है। यह उदयपुर से नियमित प्रकाशित हो रही है। वर्तमान में डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’ अपनी साहित्यिक दृष्टि से इस पत्रिका को एक नया स्वरूप देने में संलग्न हैं।
मरूदीप - बीकानेर से प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका में मक्खन जोशी का योगदान रहा। चौथा सप्तक के कवि आलोचक डॉ. नंदकिशोर आचार्य की ख्याति संपादक-पत्रकार के रूप हुई जिसमें इस पत्रिका का स्मरण किया जाता हैं। अपने वैचारिक आलेखों और रचनात्मकता से मरूदीप ने अपने समय में पूरे देश का ध्यान आकृषित किया।
मरूभारती- बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी की यह पत्रिका लंबे समय तक प्रकाशित होती रही। इसने शोध-खोज की दिशा में सराहनीय कार्य किया।
मारवाड़ी डाइजेस्‍ट : इसके संपादक रतन जैन, पडि़हारा (चूरू) हैं। यह नियमित प्रकाशन है।
लहर- प्रकाश जैन के संपादन में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका का साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़ा नाम रहा है।
वरदा- राजस्थान साहित्य समिति बिसाऊ की यह शोध पत्रिका डॉ. मनोहर शर्मा के संपादन में देश-दुनिया में चर्चित रही है। प्रचानी और मध्यकालीन साहित्य पर इस पत्रिका ने विशद कार्य किया है।
वातायन- बीकानेर के कवि हरीश भादाणी ने अपने संघर्ष के दिनों में अपने मित्रों के साथ तत्कालीन हिंदी साहित्य में इसे वरेण्य पत्रिका बना दिया था। वातायन चर्चा और विचार विमर्श के साथ समकालीन रचनाशीलता की प्रमुख पत्रिका रही। लंबे अर्से बाद इसका पुनर्प्रकाशन भी हुआ किंतु फिर से इसे बंद करना पड़ा। सूर्यप्रकाशन मंदिर के सूर्यप्रकाश बिस्सा ने भी वातयन के पुनर्प्रकाशन का दायित्व संभाला किंतु यह नियमित नहीं हो सकी।
विकल्प- बीकानेर के अजीत फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित इस पत्रिका में वैचारिक आलेख, शोध और समीक्षा आदि प्रकाशित होती है।
शबनम ज्योति : इस अनियतकालीन पत्रिका का संपादन अब्दुल समद राही सोजत सिटी से करते हैं। वे पिछले तीस वर्षों से पत्रकारिता से जुड़े हैं। इस पत्रिका में राजस्थान के लेखकों की विविध विधाओं की रचनाओं को महत्त्व दिया जा रहा है। प्रतिष्ठ रचनाकारों के साथ नए और उदयीमान रचनाकारों के उत्थान में इस पत्रिका का सराहनीय योगदान रहा है।
शिविरा- शिक्षा विभाग राजस्थान की बीकानेर से प्रकाशित होने वाली इस शैक्षिक पत्रिका के प्रत्येक अंक में पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित होती है। इसका प्रचार-प्रसार पूरे राजस्थान के गांव गांव ढाणी ढाणी में है क्यों कि इसमें शिक्षा विभाग के आदेश प्रकाशित होते हैं। विगत वर्षों से सितम्बर महिने का अंक साहित्य की विविध विधाओं पर केंद्रित किया जा रहा है जिसमें राजस्थान के सृजनशील कर्मचारियों की रचनाशीलता को देखा जा सकता है।
शेष : त्रैमासिक पत्रिका के रूप में हसन जमाल ने इसे राजस्थान की सीमाओं से बाहर पाकिस्तान तक में लोकप्रिय बनाया है। वे इसे जोधपुर से विगत 16 वर्षों से प्रकाशित करा रहे हैं। इस पत्रिका में शोध-खोज के साथ विषय केंद्रित विशेषांक अपनी पूरी गरिमा और गंभीरता के साथ प्रकाशित किए गए हैं।
संबोधन- यह त्रैमासिक पत्रिका कमर मेवाड़ी के संपादन में कांकरोली (राजसमंद) से प्रकाशित हो रही है। पिछले 44 वर्षों से नियमित प्रकाशित हो रही इस लघु पत्रिका ने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इसके अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषांकों को राजस्थान की हिंदी पत्रिकारित के क्षेत्र में उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं। इसमें विविधतापूर्ण रचनाओं का प्रकाशन होता है। विविध विधाओं और स्थापित रचनाकारों के साथ नए लेखकों को स्थान मिलता रहा है। कुछ ऐसे भी विशेषांक आए है जिनका संपादन संपादन ने राजस्थान के बाहर के रचनाकारों को सौंप कर इस पत्रिका की गरिमा को बढ़ाया है।
संस्कृति-मीमांसा : इसमें चिंतनपरक सांस्कृतिक लेखों और टिप्पणियों के साथ ही सृजनात्मक पक्षों को भी यथोचित स्थान दिया जाता है। समान्तर संस्थान जयपुर से आलोचक राजाराम भादू ने इसे विचारोत्तेजक आलेख और संवाद की पत्रिका के रूप में लोकप्रिय बनाया है।
समय माजरा : यह मासिक प्रकाशन है जिसका प्रकाशान राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन, जयपुर से होता है। यह विगत 17 वर्षों से प्रकाशित हो रही है। विचार, सृजन और जनसरोकारों की इस पत्रिका के संपादक ओम सैनी हैं। 
साहित्य समर्था- नीलिमा टिक्कू इस पत्रिका की संस्थापक और संपादिका हैं। वे एक रचनाकार के साथ-साथ स्पंदन महिला साहित्यिक संस्थान जयपुर की अध्यक्ष के रूप में भी सक्रिय हैं। विगत 6 वर्षों से प्रकाशित होने वाली इस त्रैमासिक पत्रिका के वरिष्ठ महिला रचनाकारों पर केंद्रित अंक चर्चा में रहे हैं। पद्मश्री सम्मान से सम्मानित लेखिका डॉ. सुनीता जैन के रचनाकर्म पर केंदित अंक अप्रैल-जून 2016 आदि साहित्य समाज में व्यापक चर्चा का विषय रहे हैं। इसके प्रत्येक अंक को विख्यात साहित्यकारों पर केंद्रित कर उनके अवदान पर चर्चा की जाती है।
सिम्पली जयपुर : इस पत्रिका में पुस्तक समीक्षा और साहित्यिक विषय पर आलेख के अतिरिक्त वर्तमान सरोकारों के साथ समय, समाज और राजनीति की चर्चा विशेष रहती है।
सुजस- सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय, राजस्थान जयपुर की इस पत्रिका को साहित्यिक नहीं कहा जा सकता किंतु जिस लकदक साज-सज्जा और रंग-रूप में यह प्रकाशित होती है वह उल्लेखनीय है। इसमें साहित्य, कला व संस्कृति के विविध घटकों को समाहित किया जाता है।
सृजन कुंज : विगत चार वर्षों से श्रीगंगानगर से पत्रकार और व्यंग्यकार कृष्णकुमार आशु इस पत्रिका का त्रैमासिक प्रकाशन कर रहे हैं। सृजन कुंज सीमित संसाधनों के उपरांत भी महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहा है। इन दिनों इस पत्रिका का ‘महिला लेखन अंक’ चर्चा में है।
    कहना होगा कि हिन्दी भाषी व्यापक समाज में इन और ऐसी लघुपत्रिकाओं की आवश्यकता सदा बनी हुई है और आलोच्य पत्रिकाओं के साथ सैकडों छोटी-बडी पत्रिकाएँ यह दायित्व पूरा भी कर रही है। राजस्थान में अनेक पत्रिका प्रकाशित हुई, बंद हुई। कुछ का स्मरण यहां अपनी सीमाओं के कारण नहीं हो सका है उसके लिए लेखक खेद व्यक्त करता है। ऐसे छूटे हुए संपादक इसे अन्यथा नहीं लेंगे। जो पत्रिकाएं अपने संसाधनों से प्रकाशित हो रही हैं, वे निसंदेह सम्मान की अधिकारी हैं।
    वर्तमान में प्रतिलिपि, अपनी माटी, हस्ताक्षर आदि अनेक ई-पत्रिकाएं नई तकनीक से जुड़ते हुए इस कार्य में नई संभावनाओं के साथ सामने आ रही है। अनेक दैनिक समाचार पत्र नियमित रूप से अथवा साप्ताहिक रूप से साहित्य पर केंद्रित अपने परिशिष्टों से अनेक रचनाकारों को सक्रिय बनाए हुए हैं, वहीं साहित्यिक परिदृश्य को विकासित करने में दूरदर्शन और आकाशवाणी का भी सराहनीय योगदान है। यह आलेख राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता का एक आइना भर है, इस विषय में अनेक तथ्यों और संभावनाओं को जोड़ा जाना शेष है। यह तो बस एक आगाज है, इसका अंजाम आपके सहयोग से ही होगा।
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