10 दिसंबर, 2017

असंवेदनशील बयानों के बीच उलझती फिल्म / डॉ. नीरज दइया


कला के भीतर सतत साधना की मांग अंतर्निहित है। अन्य कला माध्यमों में अपेक्षाकृत सिनेमा के सर्वाधिक लोकप्रिय होने का श्रेय अथवा आधार सामूहिक रचनात्मक कहा जा सकता है। प्रत्येक कला माध्यम की अपने समाज के प्रति जबाबदेही होती है और होनी भी चाहिए। ऐसे में सिनेमा जैसे माध्यम में यह जिम्मेदारी और जबाबदेही सामूहिक है। संभवतः फिल्म ‘पद्मावती’ के निर्माण से जुड़े कलाकार दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर, रणवीर सिंह और निर्माता-निर्देशक इसलिए सामूहिक रूप से विवादों के घेरे में हैं। दोष किसी एक का नहीं फिर भी इसके सूत्रधार निर्देशन संजय लीला भंसाली हैं जिन्होंने फिल्म की पटकथा लिखी और साथ ही प्रकाश कपाड़िया जिनका नाम भी लेखक के रूप में दिया गया है। इस पूरे विवाद के बाद ताजा स्थिति में संजय लीला भंसाली का जबाब चर्चा में है- “फिल्म को लेकर सारा विवाद अफवाहों पर आधारित है। मैंने तथ्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं किया है। फिल्म मलिक मुहम्मद जायसी के काव्य पर आधारित है।” यह उनका खुद को और फिल्म को बचने का एक संकट-द्वार है जिससे उम्मीद है कि वे इस प्रयास में बच सकते हैं। यदि मान भी लिया जाए कि इस फिल्म का आधार यह कृति है तो अब यह देखना होगा कि इनमें कितना साम्य है और कितने कहां बदलाव किए गए हैं। यह शोध-खोज का विषय है पर इतना जरूर है कि लोक विश्वास और ऐतिहासिक सत्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना जनभावनाओं को आहत कर सकता है। बिना पर्याप्त तथ्यों के काल्पनिक अथवा सपने में ऐसा कुछ दिखाया जाना मनोवैज्ञानिक आधार एवं गहरी सूझ-बूझ की अपेक्षा तो रखता ही है।
    वैसे सत्य यह भी है कि आज स्त्री-पुरुष समानता की बातें करने वाले हमारे भारतीय समाज में राजस्थान का भी अपना एक अध्यय रहा है जिसमें स्त्री को पर्दों में रखा जाता था। यहां तक कि उसे पैर की जूती के बाराबर दर्जा दिया हुआ था। स्त्री-चेतना और अस्मिता की बात करें तो हमारे समक्ष प्राचीनतम उदाहरण कन्नड़ कवयित्री अक्क महादेवी और उसके बाद मध्यकालीन समय में मीरा है। इन संदर्भों और यात्रा के बीच एक अध्याय और सुनहरा पन्ना अपनी अस्मिता के लिए रानी पद्मिनी ने जौहर की आग में कूद कर रचा। अपनी आन-बान और शान पर आंच नहीं आने देना का यह अनुपम उदाहरण है। कहना होगा कि यह स्त्री जाति का प्रवल प्रतिरोध है कि उनका प्राणोत्सर्ग गरिमामय है। नारी जाति और रानी पद्मिनी के प्रति जनता में यह सम्मान है कि संजय लीला भंसाली की फिल्म-प्रोमो देखकर वे उसके तामझाम और चकाचौंध में नहीं उलझे। रानी पद्मावती के प्रति इसे उनकी श्रद्धा और सम्मान माना जाना चाहिए कि वे न्याय के लिए वगावत पर आमादा हुए।
    एक दूसरा पक्ष यह भी ध्यान दिए जाने योग्य है कि फिल्म को सेंसर बोर्ड से पास होने पहले चयनित दर्शकों को दिखाना अनुचित है। माना कि फिल्म के विरोधियों को फिल्म के बारे में पर्याप्त और पूरी जानकारी नहीं है। उन्हें नहीं पता कि ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ हुई है या यह उनका भ्रम है। भीड़ और विरोधी शोर में शामिल जनता की अपेक्षाएं भी अनुचित हो सकती है। कहा जा रहा है कि इतिहासकारों और प्रचलित कहानियों के अनुसार पद्मिनी की कहानी में गोरा-बादल प्रमुख चरित्र है, जिन्होंने राणा रतन सिंह की मदद की थी। इस विषय पर प्रसिद्ध कथाकार यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’ की ‘गौरा-बादल’ पुस्तिका और पं. नरेन्द्र मिश्र की कविता बेहद लोकप्रिय है। वहीं पद्मावती की कहानी और संदर्भ ‘भारत एक खोज’ (जवाहर लाल नेहरू) में भी आता है। जिसे पर्दे पर दिखाया भी जा चुका है। उनमें कहीं विवाद नहीं हुआ तो फिर ऐसा इस फिल्म में क्या है जिस पर इतना विवाद हो रहा है। रानी पद्मिनी (पद्मावती) विषय लोक आस्था यह है कि चित्तौड़ की औरतों से दो विकल्पं से जौहर को चुना। उन्हें विजयी सेना के समक्ष अपमानित होने को अस्वीकार किया। सभी महिलाओं की एक राय पर विशाल चिता सजाई गई और रानी पद्मिनी के बाद सारी औरतें धधकती अग्नि में स्वाभिमान के लिए कूद गईं और दुश्मन बाहर खड़े देखते रह गए। इस अविस्मरणीय जौहर का गौरव लोकगीतों और कथाओं में आज भी जीवित है।   
    अगर फिल्म कवि जायसी के प्रेमकाव्य पर आधारित है तो यह जानकारी अनिवार्य है कि यह एक लोकप्रिय कृति है जो अनेक विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रमों में वर्षों से पढ़ाई जा रही है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, विजयदेव नारायण साही सहित अनेक आलोचकों-रचनाकारों ने इस के संबंध में बहुत कुछ लिखा और कहा है। रानी पद्मिनी के जौहर की अमरगाथा से संबंधित अनेक तथ्य और प्रमाण राजस्थान के इतिहास में विभिन्न इतिहासकारों ने अभिव्यक्त किए हैं। ‘त्रिवेणी’ की भूमिका में आचार्य शुक्ल ने लिखा हैं- “जायसी का क्षेत्र तुलसी की अपेक्षा परिमित है, पर प्रेमवेदना अत्यंत गूढ़ है।” तो साही ने तो जायसी को हिंदी का पहला विधिवत कवि कह कर अपनी पुस्तक ‘जायसी’ में सम्मानित-चर्चित किया है। इस कृति में इतिहास और कल्पना का मणिकंचन योग स्वीकारा गया है। मूल कृति ‘पद्मावत’ में चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमकथा है, जो सूफी मसनवी शैली में 57 खंडों में अभिव्यक्त हुई है। इसके पूर्वाद्ध को कल्पना और उत्तरार्द्ध को ऐतिहासिक आधार से युक्त स्वीकारा गया है। ‘पद्मावत’ महाकाव्य में रहस्यवाद और आध्यात्मिक रंग और संदर्भों की अपनी कहानियां हैं जिनको जाने-समझे बिना संजय लीला भंसली द्वारा दिया गया बयान संभवतः बहुत दूर तक नहीं चलेगा।
    गौर किए जाने वाली बात यह है कि किसी भी श्रव्य-माध्यम की रचना को जब दृश्य-श्रव्य-माध्यम में रूपांतरित करते हैं तो अनेक समस्याएं आती है। यदि मलिक मुहम्मद जायसी के इस काव्य पर आधारित यह फिल्म बनानी होती तो इसमें अनेक घटनाओं, तथ्यों और विवरणों के साथ देश-काल की सम्यक जानकारी आवश्यक थी। यह विवाद थमने वाला नहीं है क्यों कि श्री राजपूत करणी सेना के संरक्षक और संस्थापक लोकेंद्र सिंह काल्वी ने कहा था- “हम किसी भी कीमत पर फिल्म में विकृत तथ्यों को दिखाए जाने की अनुमति नहीं देंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि फिल्म भारत के आधे हिस्से में प्रदर्शित ना हो सके।” अब इस मुद्दे पर राज्य सरकार कानून और व्यवस्था की दुहाई पर सक्रिय हुई है। कोर्ट ने किसी भी प्रकार के फैसले को पहले देने से इंकार कर दिया है। ऐसी स्थिति में अभिनेत्री रवीना टंडन का अपना मत है कि ‘पद्मावती’ विवाद केवल राजनीतिक ड्रामा है और इलेक्शन खत्म होते ही सब ठीक हो जाएगा। वहीं इस फिल्म की अभिनेत्री दीपिका पादुकोण जो रानी पद्मिनी या चित्तौड़ की पद्मावती का किरदार निभा रही हैं का कहना ठीक लगता है कि बिना फिल्म देखे ही विरोध अनुचित है। कलाकारों से विरोध की प्रराकाष्ठा यह है कि उन्हें जान से मारने की धमकियां दी जा रही है और करणी सेना ने तो पादुकोण को यह धमकी दी है कि रामायण में जिस तरह शूर्पणखा की नाक काट दी गई थी, करणी सैनिक उसी तरह उनकी भी नाक काट सकते हैं। लोकतांत्रिक देश में ऐसा गर्व प्रदर्शन भी बेहद चिंताजनक और असंवेदनशील है। यहां संजय लीला भंसाली से यह भी कहना है कि अगर फिल्म जायसी के काव्य पर आधारित है तो इसका श्रेय और नाम क्यों नहीं दिया गया। ऐसी स्थिति में यह एक पटकथा लेखक और निर्देशक की असंवेदनशीलता कही जाएगी।
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