19 दिसंबर, 2017

उत्तर आधुनिक सच / डॉ. नीरज दइया

हमारा विकास इतना हुआ है कि अब छुपाए नहीं छुप सकता। सुनो, सब लोग कह रहे हैं कि हां विकास हो गया है, हां विकास हो गया। किसी कोने से अगर कोई आवाज आएगी- विकास नहीं हुआ है तो हम उसे हमारे इस विकास होने के शोर में दबा देंगे। वैसे हमारे पास सब कुछ है मसलन आधुनिक तकनीक है। हम ऐसी बेसुरी आवाजों को तकनीक से कुचल सकते हैं। विकास के होने अथवा नहीं होने के मुद्दे पर मतदान करा सकते हैं। लोकतंत्र में मतदान का प्रवल महत्त्व है। अगर दस आदमी कहे- विकास नहीं हुआ है और नब्बे कहें कि हुआ है तो सच क्या है? सीधी बात है- दस की बात को सच नहीं मान जा सकता।
आदमी का विकास देखिए- वह क्या से क्या हो गया। पहले सच बोलता था, फिर जमाना बदला और वह आधुनिक सच बोलने लगा। आजकल वह लोकतंत्र में ऐसे उत्तर आधुनिक सच सुनना और बोलता है। उसके संस्कारों में प्रगति करना है और वह प्रगति करता जा रहा है। बहुमत का जमाना है। और बहुमत कहता है कि विकास हुआ है। आप धारा के विरूद्ध नहीं जा सकते हैं। अरे आप देशद्रोही थोड़ी बनाना चाहेंगे। जो विकास को विकास नहीं मानते और हमारे जयधोष में काले झंडे दिखाते हैं या कुछ काली पट्टियां लगाते हैं वे मूर्ख है। समझते नहीं कि काले झंडे लहराने से भला क्या होगा। दो मिनट को बस आप ध्यान भंग करा देंगे। यह उत्तर आधुनिक सच है कि दो मिनिट का क्या महत्त्व है? बस दो मिनट में आप वो कर सकते हैं। वो नहीं समझे, अरे वो... वो जो आजकल हर घर में बनाने की बात सरकार कर रही है। आपके घर में शौचालय है ना? अब दूसरों के घरों में बन जाएंगे तो इसे विकास नहीं कहेंगे क्या? स्वच्छता अभियान है और खुले में शौच मना है। अगर आप खुले में जाएंगे तो आप विकास के विरूद्ध हैं।
आम आदमी की जरूरत है- रोटी, कपड़ा और मकान। इन तीनों चीजों का अंतर्संबंध शौचालय से भी है। हमारी विकास-यात्रा में यह बहुत युगों पुरानी बात है कि हम भले कितनी ही प्रगति कर लें, विकास कर लें किंतु हमें बार बार शौचालय तो जाना ही पड़ेगा। इससे पीछा नहीं छूट सकता। उत्तर आधुनिक सच है कि आप कलेक्टर भी बन जाएंगे तो आपको दैनिक दिनचर्या में यह तो करना ही होगा। देखिए जितने भी अफसर है उनके लिए यह विशेष व्यवस्था उनके कमरे में अलग से होती है। पता नहीं अफसर को हाजत हो जाए और वह निवृत होना चाहे। लघु शंकाओं और दीर्घ शंकाओं से अफसर का बहुत वास्ता पड़ता है। वैसे अफसर ऐसी व्यवस्था अपने लिए रखते हैं तो वे पहले ऐसी ही एक सामूहिक व्यवस्था दूसरों के लिए भी करते हैं। घर और दफ्तर में ऐसी व्यवस्थाएं हैं तो भला अगर आप कहीं जा रहे हो या कहीं से आ रहे हो तब इस व्यवस्था का क्या होगा? यह व्यवस्था तो हमारे आस-पास रहनी चाहिए। भीड़ में यह कर नहीं सकते और खुले में करने की सरकारी मनाही है इसलिए भावनाओं को समझते हुए विकास में एक विकास फिर जुड़ रहा है कि अव आप गूगल मैप द्वारा शहर के शौचालय देख सकेंगे।
पंच काका कहते हैं कि जीपीएस की मदद से शहर में किसी भी स्थान के नजदीकी यूरिनल तक पहुंचना अब संभव हो जाएगा। अरे भाई हम कुत्ते नहीं हैं कि कहीं भी टांग उठा लेंगे। आप समझ गए ना इस विकास को।
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