06 दिसंबर, 2017

टांय टांय फिस्स / नीरज दइया

   बड़े-बूढ़ों के साथ रहना सच में बहुत बड़ी मुसिबत का काम है। वे बात बात पर हमारी कमियां निकालते रहते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे भगवान ने उनके हाथ में परमानेंट कोई आइना दे दिया हो और वे बात-बात पर हमें आइना दिखाते रहते हैं। हम अपनी असलियत को स्वीकारते हुए सकुचाते हैं। अब देखिए मैं जो कुछ भी जैसा भी लिखता हूं, वह एकदम नया और मौलिक होता है। पंच काका को क्या पड़ी है कि वे कमियां निकालते रहते हैं। हर बार हर रचना पर वे मुझे टोकते हैं! कहते हैं- बात बनी नहीं।
    हमारी किसी बात पर हमें कोई पराया ऐसा-वैसा कहे तो उतना बुरा नहीं लगता, जितना अपना कोई सागा कहे तो लगता है। आप समझ रहे हैं ना, मैं क्या कहना चाहता हूं। पूरा उल्टा हिसाब है, पूरी दुनिया जिसे वाह-वाह करती है वह घर के जोगी जोगना हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि काका की नजर ही कमजोर नहीं हुई साहित्य को समझने की समझ ही कमजोर हो गई है। ऐसा कहने में यदि आपत्ति है तो इसको घुमाकर कहा जा सकता है- काका की साहित्यिक समझ इतनी विकसित हो गई है कि उन्हें अच्छी से अच्छी रचना जमती नहीं।
    अगर मेरी हर रचना का विषय पुराना यानी बासी है तो ताजा कहां से लाना है। माना कि आप बड़े हैं, अनुभवी है और आपको कहने का हक है। जब ऐसा कुछ कहते हो तो इसका इलाज भी तो बताओ। आप जिसे नया और उम्दा मानते हैं उसके बारे में कोई संकेत तो कीजिए। यह क्या हुआ कि मैं हिम्मत रखते हुए फिर-फिर प्रयास करता हूं। यकीन कीजिए मैं दुगने जोश-होश से प्रयास करता हूं। मैं हर बार सोचता हूं अबकी विषय नया और निर्वाहन नया है, काका दाद देंगे पर उनके आगे हमेशा मेरी टांय टांय फिस्स। इस टांय टांय फिस्स से टकरा-टकरा कर मेरे लेखन की गति सुस्ता गई है।
    पंच काका कहते हैं- जीवन की गाड़ी जब तक चल रही है चल रही है, ना जाने किस दिन टांय टांय फिस्स हो जाए। इस जीवन का परम सत्य टांय टांय फिस्स है।
    कोई बात जब नई नई होती है तो अच्छी लगती है। एक ही बात बीस बार सुनते हैं तो बोरियत होने लगती है। काका ने जैसे टांय टांय फिस्स को तकिया कलाम बना लिया है। कोई बात कहो-करो वे कहीं न कहीं से जैसे तैसे इस फिस्स तक पहुंच ही जाते हैं। कबीर दासजी ने कहा था- ‘चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय, दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।’ मेरे लिए पहला पाट पंच काका है अर दूसरा टांय टांय फिस्स। लगता है काका और उस तकिया कलाम से जल्दी ही मेरी टांय टांय फिस्स होने वाली है।
    मैंने एक प्रयोग किया। जब काका को मेरे लिखे में खोट ही खोट दिखाई देता है तो उनकी पारखी नजर की परख भी हो जाएगी और हो सकता है कि कोई रास्ता ही मिल जाए। मैं काका के सामने प्रेमचंदजी की कहानी कफन मेरी बना कर ले गया।
    बोला- काका कहानी लिखी है। नाम रखा है- ‘कफन’।
    काका बोले रख दे मैं पढ़ कर बात करूंगा। मैं कहानी छोड़ कर आ गया। काका ने जैसे ही कहानी को पूरा किया तो मुझे आवाज लगाई। मैं गया और मन ही मन डर रहा था कि कहीं यह ना कह दे कि कहानी चुरा कर लाया है। पूरी की पूरी चोरी हुई कहानी देकर मुझे मूर्ख बनाता है। पर नहीं, काका शायद पकड़ नहीं पाए थे। पकड़ने वाले होते तो कहानी का नाम ‘कफन’ सुनते ही उनके दिमाग की बत्ती जलती और प्रेमचंद का नाम क्लिक होता। नए कहानीकारों की बात तो अलग यहां तो बड़े बड़े कहानीकारों को अभी तक लोगों ने पढ़ा नहीं। काकाजी के पढ़ने में जब प्रेमचंद सरीखे रचनाकार का यह हाल है, तो दूसरे रचनाकार की तो बात ही क्या करें!
    काका कहने लगे कि तेरी यह कहानी ठीक से जमी नहीं। मैं मन ही मन बोला- जमी नहीं, अरे इस कहानी से प्रेमचंदजी की दुकान अब तक जमी हुई है और आप कहते हैं कि जमी नहीं। काका ने उलटे सवाल किया- तूने कफन के चंदे से बाप-बेटे को शराब पीते दिखाया सो तो ठीक है पर वे क्या जंगल में रहते थे। यदि नहीं तो गांव में आस-पास या दूर दराज कोई औरतें नहीं थी क्या? एक स्त्री को ऐसे तड़फता दिखाय है। जापे में तो स्त्रियां एक दूसरे का सहयोग करने दूर दूर से चली आती हैं। यह कोई त्वरित घटना तो होती नहीं फिर और ऐसे काम में तो अनजान भी मदद करते हैं। किसी भी घर का दरवाजा बजाने की देर थी उन्हें मदद मिल जाती।
    काका के श्रीमुख से इतनी बातें सुनकर मेरे पैर कच्चे पड़ गए और मेरा खेल टांय टांय फिस्स। मैंने कह दिया- यह कहानी तो प्रेमचंदजी ने लिखी थी। आपको भूलवश मेरी कहानी की जगह उनकी दे दी थी।
    काका ने हंसते हुए कहा- मुझे क्या मूर्ख समझ रखा है। मैं जानता था कि तुम ऐसा करोगे । तुम इतनी महान और बारीक कहानी जिंदगी भर लिखोगे तब भी नहीं लिख सकोगे। लेखकों में फर्क बस इतना ही है कि प्रेमचंद कम गलती करते थे और तुम हो जो गलतियों की खान हो। कहानी या कोई भी रचना हो मुंह बोलनी चाहिए। तुम्हारे यहां तो दो लाइन पढ़ो और जांच करो तो टांय टांय फिस्स। रचना का उठाव अच्छा होना चाहिए। अब देखो यह कहानी प्रेमचंदजी की। इसमें माना कि कुछ छोटी मोटी कमियां है पर उठाव जबरदस्त है। एकदम पठनीय और सधी हुई भाषा। मैं समझता हूं कि इस कहानी में जो कमजोरियां मैंने बताई है वे ही इस कहानी का नयापन है। नया यानी जो जैसा हम नहीं जानते वही तो मौलिक हुआ। कफन से स्त्रियों को प्रेरणा मिलेगी कि ऐसी विकट स्थितियों में वे उनके पास रहे। अरे माना कि धीसू और माधव ने नहीं बुलाया तो क्या यह उनका धर्म नहीं था।
    बे बोल रहे थे और मैं सुन रहा था। ऐसी टांय टांय सुनना सच, बड़ी मुसिबत है! फिस्स....। और कमरा दुर्गंधमय हो गया।
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