16 दिसंबर, 2017

सभ्य भाषा में झगड़े का नाम चुनाव

    झगड़ा करना अच्छे लोगों का काम नहीं होता। मैं खुद को अच्छे लोगों में शुमार करता हूं और भविष्य में भी इसी पोजिशन में बने रहना चाहता हूं। वैसे पोजिशन चीज ही ऐसी है कि जिस पर सबसे ज्यादा खतरा मंडराता रहता है। खैर सारी बातें अपनी जगह है और समय ही फैलता करता रहा है। अब समय है फैसले का और मैं किसी भी प्रकार का झगड़ा करने के पक्ष में तो बिल्कुल नहीं हूं। और साथ में तुर्रा यह भी है कि किसी से भी झगड़ा क्यों किया जाए। ना जाने किस की कब जरूरत आन पड़े। आज झगड़ा और कल सुलह करनी पड़े तो भाई पहले से ही पुखता इंतजाम होना चाहिए।
    हमारे बड़े कवि कबीर जी कह गए- ‘कबिरा खड़ा बजार में मांगे सब की खैर। ना काहू से दोस्ती न काहू से वैर।’ छोटे कवि और मुझ जैसे आपके मित्र ऐसे संकटों में भी पड़ने से जरा गुरेज करते हैं। भाई बजार में खड़े होने की फुर्सत अपने पास नहीं है और इतने भी ठाले नहीं बैठे कि सब की खैर मांगे। यहां अपनी खैर के लिए दिन रात रोते रहते हैं और अपनी खैर की चिंता की ही तो बात कर रहे हैं कि झगड़ा करने का अर्थ अपनी खैर को खोना है। हां अगर बजार में कहीं खैर मिलती हो पैसे देकर, या फ्री में बांटी जा रही हो तो भैया हमें बजार में खड़ा होना भी मंजूर है। बिना खैर के बजार में खड़े हो कर खैर मांगने के पक्ष में हम नहीं हैं। दोस्ती और बैर की भी बात अगर कबीर स्टाइल में रखी जाएगी तो अपना काम कौन करेगा। जिनसे जान-पहचान है उनके लिए तो बस दो ही श्रेणियां है- दोस्ती या दुश्मनी।
    झगड़ा करना यानी दुश्मनी मोल लेना। वही तो नहीं चाहते सो पूछ रहे हैं कि झगड़ा करने का सही समय क्या है। झगड़ा कुर्सी का है और साहब को फरियाद करने जाना है। साहब हमको बड़े वाले और अच्छे वाली कुर्सी चाहिए। आपकी किरपा हो जाए तो सुसरे रामलाल और श्यामलाल को छोड़ कर मुंगेरीलाल को धकेल कर हमें कुर्सी दे दी जाए। ये चुनाव-वुनाव तो सब चोंचले हैं। होगा तो वही जो श्रीमान चाहेंगे। आप अफसर है और आप जिस कुर्सी पर बैठे हैं उसके लिए किसी तीसरे की पंचायत तो हो नहीं सकती है। अगर चुनाव से पहले झगड़ा करेंगे तो हम आंखों में आ जाएंगे और हम वैसे तो आपकी आंखों में ही रहना चाहते हैं पर ऐसे नहीं... आंख रहने और आंख में रखने में बहुत फर्क है। सरा खेल ही आंख का है। वर्षों से हम अर्जुन वाली आंख कुर्सी पर गड़ाएं बैठे हैं। इसी चक्कर में तो सब से दोस्ती रखी और बैर मोल नहीं लिया। कवीर जी के मंतर को जरा मरोड लिया साहब- अपनी सबसे दोस्ती ना काहू से बैर। किसी को हंस कर पटाए रखा, किसी को मुस्कुरा कर फसाए रखा। जरूर हुई तो चाय-पानी से मामला बैठाया। उससे भी नहीं बनी बात तो पार्टी देकर खुश किया। खुश क्या धोखा दिया। हमारा असली मकसद ऐन-केन-प्रकरेण इस बड़े वाली कुर्सी तक पहुंचने का है।
    पंच काका कहते हैं कि सभ्य भाषा में झगड़े का नाम चुनाव है। सो अरज हमारी यह है कि हम को तो सर्वसम्मति से आप जोड़-तोड़ कर कुर्सी पर एक बार बिठला दो, बाकी सब हम संभाल लेंगे। एक बार बैठ गए तो ऐसे चिपक कर बैठेंगे कि हम हमार बिटवा के बड़े होने तक यहीं बैठे रहेंगे। 
डॉ. नीरज दइया

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