30 अक्तूबर, 2017

इज्जत की लेनदारी और देनदारी

नीरज दइया
इज्जत के ठेकेदारों का कहना है कि इज्जत देकर ही ली जा सकती है। गुंडाराज के हिमायतियों का भी मानना है- इज्जत देने-लेने की वस्तु है ही नहीं, उसे तो बस लूटा जा सकता है। ऐसे लोगों को इज्जत देने में ही भलाई है क्यों कि वे इज्जत का फलूदा अपने बाएं हाथ से करते हैं। शरीफ आदमी को बस अपनी इज्जत बचानी आती है, उसे इज्जत लूटनी नहीं आता। शरीफ आदमी अपनी इज्जत लुटकर भी मौन रहता है। इज्जत और मुंह का चोली-दामन का साथ है। इसमें जीभ का कमाल कौन नहीं जानता! जीभ के कारनामों से भी इज्जत का ग्राफ बदलता है।
मैं इज्जतदार आदमी हूं। आपको बस इज्जत बचाने के कुछ तरीकों साझा करता हूं। पहला तरीका तो यह है कि किसी को पुकारना हो तो सदा अदब से पुकारें। जैसे फन्ने खां को आप पुकारना चाहते हैं तो केवल फन्ने खां नाम लेखर पुकारना सरासर गलत है। शरीफ आदमी को चाहिए कि वह कहे- श्रीमान फन्ने खां जी साहब जी हजूर को तहे दिल की गहराइयों से प्रणाम। बंदगी करते हैं कि जनाव हमारा सलाम कवूल करें।
पढ़े-लिखें और भाषा के जानकारों के साथ बड़ी समस्या यह है कि वे इज्जत देना जानते ही नहीं। कहेंगे कि इतने विशेषणों की अबश्यकता नहीं। यह अनर्गल भाषा है। व्याकरण सम्मत नहीं। मैं पूछता हूं- विशेषणों की जरूरत क्यों नहीं है, इन विशेषणों से ही तो इज्जत की देनदारी और लेनदारी का संबंध है। आपको जानना चाहिए कि इससे सामने वाले को कितनी खुशी मिलती है। अगर हम इज्जत दे रहे हैं यह अहसास भी तो होना चाहिए। दुनिया में विशेषण और उपमाएं बने किस लिए हैं? श्री के साथ श्री श्री एक सौ आठ या हजारों लाखों में श्री का संख्यात्मक रूप इज्जत देना है। नाम का महत्त्व नहीं है जितना उसके आगे-पीछे के लगे श्री और जी का है। इसी से तो दिनग्रह बदलते हैं।
वैसे कुछ अफसर और साहब लोगों को सूखी इज्जत फसंद नहीं होती है। वे चाहते हैं कि बहुत इज्जत देनी ही है तो साथ में कुछ ऐसा दो जो काम आए। ऐसे इज्जतदार लोग अपनी इज्जत नगदी के लेन-देन में अधिक खुश होते हैं। वैसे इज्जतदार आदमी तो कुछ लेते-देते डरते हैं पर सीधे-सीधे कैसे पता चले कि कौन इज्जतदार है और कौन सूखी इज्जत नहीं वरना चुपड़ी-चुपड़ी और दो-दो इज्जत चाहता है। ऐसे चाहने वालों के लिए आपको धी पास रखना चाहिए कि पांचों अंगुलियां धी में डूबो देने में सफल हो जाएं।
पंच काका कहते हैं कि आज के दौर में इज्जत दो कौड़ी की रह गई है। सच्चाई यह है कि खुद भीतर झांक कर देखेंगे तो पता चलेगा कि फूटी कौड़ी की इज्जत भी किसी के पास नहीं बची है। अब यूज एंड थ्रो के इस जमाने में इज्जत देने-लेने के चक्कर में कोई किसी का इंतजार नहीं करता। एडवांस तकनीक के साथ बाजार का कमाल है कि इज्जत देने-लेने के साथ ही लूटने-लुटाने की अनेक दुकानें खुल गई हैं। पहले आप जिस इज्जत को इज्जत समझते थे, वह बीते जमाने की बात हो गई है। नए वक्त के साथ जीना सीखो। यह दौड़ती-भागती शताब्दी है, यहां इज्जत को खूंटी टांग कर घर से बाहर निकलो इसी में भलाई है। क्या समझें? नहीं समझे क्या? समझ जाओगे।
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