06 नवंबर, 2017

सच और झूठ की लड़ाई

डॉ. नीरज दइया
राम और रावण की लड़ाई सच और झूठ की लड़ाई थी। कौरवों और पांडवों की लड़ाई भी सच और झूठ की लड़ाई थी। किंतु ये बहुत पुरानी कहानियां है। सच और झूठ की ऐसी अनेक कहानियां है। कहानियां अब भी चल रही है, पर समस्या यह है कि सच और झूठ की जो लड़ाई की ये कहानियां नई-नई है। कहानियां अभी चल रही है इसलिए कोई फैसला देना जल्दबाजी होगा। सच और झूठ की ये कहानियां अब चुनाव चिह्नों के साथ जुड़ गई है। अपने पायदे के लिए कोई सच-झूठ भी पार्टी बदल सकता है। बदल रहे हैं। भीड़ का क्या है, आज सच के साथ है सच को जिंदाबाद कहती है, कल सच को झूठ से टिगट मिल गया तो उसके अनुगामी झूठ के साथ हो जाएंगे और दम लगाकर कहेंगे- झूठ जिंदाबाद।
असल में यह छद्म युद्ध है। यहां नाम-काम सब दाम के सहारे अदल-बदल होते हैं। ऐसी चालें और घातें पहले नहीं थी। जिसे देखो सच का झूठ और झूठ का सच करने में लगा है। दोनों का चेहरा इतना बदल गया है कि इन्हें आम आदमी अब पहचाना ही नहीं सकता। वह अपनी धुन में रहता है। सच आम आदमी के पास गया और बोला- मैं सच हूं। आम आदमी ने कहा- मैं क्या करूं? वह बोला- बस यूं ही बता रहा हूं। आप को ध्यान होना चाहिए कि मैं सच हूं। मुझे वोट देना। आम आदमी ने रूखाई से कहा- मुझे किसी से कोई मतलब नहीं। मैं आम आदमी हूं और मेरा वोट गोपनीय है। मैं अपना काम करूंगा, तुम अपना करो। फिर झूठ भी आम आदमी के पास पहुंचा और बोला- मैं झूठ हूं। वोट मुझे देना। आम आदमी ने रटा-रटाया जबाब दिया- मैं क्या करूं? मेरा वोट गोपनीय है। झूठ ने प्रतिवाद किया- अभी तुम्हारे पास जो आया था, वह क्या कह रहा था? आम आदमी ने सिर नीचे किए रखा, उसे सिर उठाने की फुर्सत नहीं थी। उसने उसकी तरफ देखे बिना ही कहा- मुझे किसी से कोई मतलब नहीं। तुम जब मतलब होता है तभी आते हो। तुम जा सकते हो।
आम आदमी की त्रासदी है कि उसने सच और झूठ दोनों को नहीं देखा। वे भेस बदल बदल कर उसे प्रभावित करते रहे हैं। उसे अब अरुचि हो गई है। वह बस चाहता है कि उसे दाल-रोटी मिल जाए। उसे इन पड़पंचों में नहीं उलझना। उसे ना इस से सरोकार है ना उस से तकरार है। वह हर बार सुनता है कि जबरदस्त मुकाबला चल रहा है। कोई उससे कहता है कि यह लड़ाई आम आदमी के लिए है, कोई उसे कहता है देखना अब हालात बदल जाएंगे। वह सुनता है कि वह यानी आम आदमी जिसे चाहेगा वह जीतेगा। आम आदमी एक फीकी मुस्कान के साथ इस पंचवर्षीय योजना में मूक बना हुआ है।
पंच काका कहते हैं- यह तो अच्छा है कि आम आदमी अपने कामों में खोया है। उसे फुर्सत नहीं है कि वह पार्टियों के सच-झूठ को देखे-सुने और फैसला करे। अगर देख भी लेगा तो वह क्या कर सकता है? उसके पास कुछ नहीं है बस केवल एक वोट है। सच और झूठ की लोकतांत्रिक लड़ाई में खेल-भावना का बड़ा महत्त्व है। अंत में सब गले मिलते हैं और फिर शीत-समाधि के बाद समय आने पर ही मोर्चा संभालते हैं। आम आदमी की जान इस मुखौटा-युग में सही सलामत रह जाए यही बहुत है।
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