09 अक्टूबर, 2017

हंसों और कव्वों की भई दोस्ती

० डॉ. नीरज दइया
    सच और झूठ के मेल से दुनिया चलती है। जब यह मेल गड़बड़ाता है तो गाड़ियां पटरियों से उतरने लगती है। पटरियां मजबूत है, पूरी व्यवस्था है। फिर भी यदि गाड़ियां अपना धर्म छोड़े क्या करें? जब धर्म की डोर में बंधे बाबा अपने धर्म से भ्रष्ट हो तो क्या करें? अब तो कौन कितना चोर हैं, पता नहीं! जो पकड़ा गया वह चोर और नहीं पकड़ा गया वह साहूकार। सच और झूठ का अनुपात ही राम-रहीम से जोड़ता और तोडता है। कोई कहता है कि राम सच्चा, कोई कहता रहीम। कौन सच्चा, कौन झूठा किसे पता? कवि कवीर ने वर्षों पहले कहा था- हिन्दू कहे मोहि राम पियारा, तुर्क कहे रहमाना,आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना। मेरा मानना है- सारा खेल समय और अनुपात का है। इस खेल में दोषी कौन उसे सावित करने की पूरी प्रकिया है। जिसमें समय लगेगा और अंत में दूध का दूध, पानी का पानी होगा। उससे पहले भले आप पानी-पानी होते रहो। माना आप जवानी में केस पाइल करते हैं और बाल सफेद होने पर फैसला आता है। उसके बाद भी अदालत एक नहीं, अनेक है। छोटी अदालत, बड़ी अदालत। नीचली अदालत और उसके बाद ऊपर की अदालत। अंत में सबसे बड़ी अदालत ऊपरवाले की अदालत।
    अगर पर्दे में सब ठीक है तो पर्दे उठाए क्यों जाते हैं? यह कोई नाटक है कि पर्दा उठता-गिरता हैं। यह असल जिंदगी ड्रामा नहीं है। अंधे को अंधा नहीं, सूरदास कहते हैं। हरदम केवल खरे सच से काम कहां चलता है। ना पूरा सच पचता है ना पूरा झूठ। सच की तुलना दूध से की जाती है। दूध यानि जिस में हर कोई अपने हिसाब से पानी मिला कर दूध धुला होने का दावा कर सके। सभी दूध के धुले हो जाएंगे तो दूध देश में कम पड़ जाएगा। दूध तो सबको चाहिए। बूढ़े-जवान-बच्चों सभी को दूध प्रिय होता है। इसलिए दूध और पानी का प्रेम है। इस प्रेम को कोई नहीं समझ सकता। कहा जरूर जाता है कि हंस दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है। ऐसा नीर-क्षीर विवेक अब कहां है? अब तो वैसे, वे हंस भी कहां रहे! हालात बदल गए। सभी हंसों ने कव्वों से दोस्ती गांठ ली। वे एक-दूसरे का रूप बदल सकते हैं। ऐसा करना कलियुग में जरूरी हो गया था। मोती कोई खाद्य पदार्थ तो है नहीं, फिर हमारे रामचंद्र ने सिया से कह दिया- ऐसा कलियुग आएगा, हंस चुगेगा दाना-दुनका, कौआ मोती खाएगा। यहां कहने-सुनने में जरूर कुछ फर्क रहा होगा। वैसे तर्क की बात तो यह है कि कौआ मोती खाएगा तो मर नहीं जाएगा! किंतु कभी-कभी ऐसा लगता है कि नए जमाने के हंस ही कव्वों को मोती खाने को दे रहे हैं और ना जाने इनका ऐसा कैसा मेल है कि दोनों के घर भर रहे हैं।
    पंच काका कहते हैं- विद्या और बुद्धि की देवी का वाहन हंस नेताओं के रूप में इन दिनों ज्ञान का प्रकाश फैला रहा है। वे धवल वस्त्र धारण किए अपनी नई चाल में अपने दोस्त कव्वों को काला कोट पहना कर दूध का दूध और पानी का पानी करने का जिम्मा सौंप लोकराज में मस्त हो गए है। नए हंसों और नए कव्वों की मित्रता ने अनेक गाड़ियां पटरियों से उतार दी है, ओर तो ओर बाबाओं की गाड़ियां तो वे एक एक कर बंद करते जा रहें हैं। देखिए अब किसका नंबर है?
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