02 अक्तूबर, 2017

शब्दों की यात्रा / डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

डॉ. मदन गोपाल लढ़ा
    नामी कवि, कहानीकार एवं व्यंग्यकार सांवर दइया के पुत्र होने के नाते डॉ. नीरज दइया को लिखने के संस्कार विरासत में मिले हैं। कहने को यह कहा तो जा सकता है, मगर क्या विरासत में लेखन में लेखन के संस्कार मिलने भर से कोई लेखक हो जाता है? अगर ऐसा होता तो तमाम बड़े लेखकों की विरासत उनकी संतानें संभाल लेती और लेखन के क्षेत्र में वंश परंपरा अनवरत चलती रहती। सच्चाई तो यह है कि संतानों द्वारा सुध नहीं लिए जाने से अधिकांश लेखकों के जाने के बाद उनकी किताबें धूल फांकती रहती है अथवा रद्दी में बेच दी जाती है। कई नामी लेखकों की अप्रकाशित पांडुलिपियां दीमकों का भोजन बन जाती है। लिहाजा विरासत की बात कहने सुनने में अच्छी लगती है मगर लिखने के लिए बीज रूप प्रतिभा का होना अनिवार्य है। अलबत्ता लेखक के घर का रचनात्मक परिवेश, किताबें-पत्रिकाओं की उपलब्धता, अन्य लेखकों का सान्निध्य, प्रकाशकों से संपर्क आदि खाद-पानी का काम करता है, जिससे प्रतिभा का बीज एक लहलहाते दरख्त में तब्दील हो जाता है। राजस्थानी एवं हिंदी में समान रूप से लिखने वाले चर्चित कवि, आलोचक एवं व्यंग्यकार डॉ. नीरज दइया के लिए यह बात सोलह आना खरी उतरती है।
    अपनी उद्भट प्रतिभा, व्यत्पत्ति एवं सतत अभ्यास के बल पर डॉ. नीरज दइया ने साहित्य अकदेमी पुरस्कार से सम्मानित अपने लेखक पिता सांवर दइया की समृद्ध विरासत को न केवल सहेजा बल्कि सतत साधना के बल पर उसे आगे बढ़ाया है। अथक परिश्रम व अटूट निष्ठा से की गई साधना का सुफल है कि साहित्य के समकालीन परिदृश्य में उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल रहा है। लेखक के रूप में लघुकथा विधा से शुरुआत करने वाले डॉ. नीरज दइया ने कविता, अनुवाद, व्यंग्य, आलोचना, बाल कहानी एवं साक्षात्कार आदि विधाओं में कलम चलाई है। राजस्थानी व हिंदी दोनों भाषाओं में अधिकारपूर्वक लिखने का सामर्थ्य अनवरत साधना का प्रतिफल है। तीन दशकों लंबी अब तक की साहित्यिक यात्रा में एक दर्जन से अधिक मौलिक कृतियां, दर्जन भर अनूदित कृतियां एवं करीब इतनी ही तादाद में संपादित कृतियां उनके खाते में दर्ज है। विश्व साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों को राजस्थानी भाषा में अनुवाद कर उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों में डॉ. चन्द्र प्रकाश देवल का नाम शीर्ष पर है। इस क्रम में डॉ. नीरज दइया ने अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, डॉ. नन्द किशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना, ओम गोस्वामी आदि नामी लेखकों की चर्चित कृतियों को राजस्थानी में अनुवाद कर के भाषाओं के मध्य पुल बनाने का काम किया है। डॉ. नन्द किशोर आचार्य एवं सुधीर सक्सेना की अब तक की काव्य-यात्रा से चयनित कविताओं का संचयन और अनुवाद इन दिनों चर्चा में है। सुधीर सक्सेना की अनूदित कृति की विशेषता यह है कि इसमें अनुवाद के साथ मूल कविताओं को भी शामिल किया गया है, जिससे अनुवाद की गुणवत्ता सहज जांची-परखी जा सकती है। जो हिंदी और राजस्थानी के समान होने की बात कहते-करते हैं उनके लिए भी यह कृति एक मध्यम हो सकती है कि वे जान सकें दोनों भाषाओं में क्या और कितना विभेद है। डॉ. दइया की अनुवाद के क्षेत्र में एक अन्य उल्लेखनीय और रेखांकित की जाने वाली कृति ‘सबद-नाद’ भी है, जिसमें 24 भारतीय भाषाओं के प्रतिनिधि कवियों की कविताओं का संचयन और अनुवाद उपलब्ध होना एक विशेष उपलब्धि है। प्रख्यात कवि अनिल जनविजय ने इस काम के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा- “भाई नीरज जी ! राजस्थानी में पूरे भारत की कविताएं देख कर मज़ा आ गया। ये बड़ा काम है। ऐसा काम तो अभी तक हिन्दी में भी किसी एक व्यक्ति ने शुरू नहीं किया है। मुझे आपसे ईर्ष्या हो रही है। अद्‌भुत ।”
            राजस्थानी भाषा में कविता व कहानी विधा में भरपूर लिखा गया है मगर आलोचना का पक्ष कमजोर रहा है। आलोचकीय काम के अपर्याप्त होने से अनेक रचनाकारों के रचना-संसार का सम्यक मूल्यांकन नहीं हो पाया। इस खालीपन को महसूस करते हुए डॉ. नीरज दइया ने आलोचना विधा में लिखना आरंभ किया। उनकी आलोचना विधा की चर्चित कृतियां ‘आलोचना रै आंगणै’ व ‘बिना हासलपाई’ इस कमी को दूर करने के ईमानदार प्रयास हैं। ‘आलोचना रै आंगणै’ में जहां विभिन्न विधाओं पर केंद्रित अठारह आलेख शामिल हुए हैं, वहीं ‘बिना हासलपाई’ कृति में राजस्थानी के पच्चीस प्रतिनिधि कहानीकारों के कथा-संसार की पड़ताल करते हुए कहानी आलोचना के मानकों की तलाश की गई है। बहुप्रतीक्षित पुस्तक ‘आंगळी-सीध’ जल्द ही प्रकाशित होगी, जो राजस्थानी उपन्यास यात्रा पर केंद्रित है।
            कविता डॉ. दइया की सबसे प्रिय विधा है। राजस्थानी में वर्ष 1997 में प्रकाशित प्रथम कविता संग्रह ‘साख’ ने उनके कवि रूप की साख बनाई तो लंबी कविता ‘देसूंटो’ को अपनी दार्शनिक पृष्ठभूमि व निराले शिल्प के कारण एक उल्लेखनीय प्रयोग के रूप में देखा माना गया। वर्ष 2015 में प्रकाशित कविता संग्रह ‘पाछो कुण आसी’ की कविताएं अपने समय व समाज की सच्चाइयों को निजी मुहावरे में उजागर करने से चर्चा में है। हिंदी कविता संग्रह ‘उचटी हुई नींद’ ने देखे-भोगे सच को बिना लाग-लपेट सहजता से अभिव्यक्त कर हिंदी पट्टी के आलोचकों का ध्यान खींचा।
    बच्चों के लिए लिखना सबसे कठिन है क्योंकि बाल साहित्य सृजन के लिए लेखक को खुद बच्चा बनना पड़ता है। नीरज दइया ने बाल मनोविज्ञान को साधते हुए ‘जादू रो पेन’ शीर्षक से जो बाल-कहानियां रचीं, वे राजस्थानी बाल-साहित्य में नया आयाम स्थापित करती है। सीख एवं उपदेश से इतर ये कहानियां बच्चों का स्वस्थ मनोरंजन करते हुए उनको जीवन के विविध आयामों से रू-ब-रू करवाती है। ध्यातव्य है कि इस कृति को वर्ष 2014 के साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार से नवाजा गया।
            नामी कवि मोहन आलोक, देवकिशन राजपुरोहित, कन्हैयालाल भाटी की कहानियों का संचयन एवं संपादन कर दइया ने राजस्थानी कहानी विधा को नए सिरे से जांचने-परखने के लिए अवसर दिया है। ये वे कहानीकार है जो यादगार कहानियां लिखने के बावजूद विमर्श से बाहर रह गए। अनियतकालीन पत्रिका ‘नेगचार’ से चर्चा में आए डॉ. नीरज दइया ने राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ का एक वर्ष से अधिक संपादक किया तथा वे अनेक पत्रिकाओं के अतिथि संपादक के रूप से कार्य कर चुके हैं। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड अजमेर में राजस्थानी पाठ्यक्रम समिति के संयोजक एवं अकादमी कार्यकारणी सदस्य के रूप में भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं रही हैं। उच्च माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल राजस्थानी पद्य संकलन के वे संपादक भी रहे हैं।
            ‘मंडाण’ के रूप में नीरज दइया ने संपादन का वह ऐतिहासिक काम किया जिसकी ख्याति परंपरा के हेमाणी अंक, राजस्थानी-एक, तीन बीसी पार व साख भरै सबद के क्रम में दर्ज की जाने योग्य है। राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी द्वारा प्रकाशित इस संकलन में राजस्थानी के 55 युवा कवियों की प्रतिनिधि कविताओं को एक ही जिल्द में शामिल किया गया है। राजस्थानी की युवा कविता को समग्र रूप से जानने के लिए यह एक विश्वसनीय एवं जरूरी किताब है।
            साहित्य सृजन के साथ तकनीक के सहारे आभासी दुनिया में राजस्थानी रंग बरसाने वाले लोगों में डॉ. नीरज दइया अग्रणी है। वे राजस्थानी की रचनाओं को हिंदी में उपलब्ध करवाने वाले सुधी रचनाकारों में भी अग्रणी कहे जा सकते हैं। अंतर्जाल पर उनकी सक्रियता को नेगचार वेब पत्रिका, राजस्थानी डाइजेस्ट, कविता कोश के राजस्थानी विभाग व फेसबुक आदि अनेक स्थलों पर देखा जा सकता है। कहना न होगा नीरज दइया राजस्थान के उन चुनिंदा लेखकों में से है जिन्होंने अखिल भारतीय स्तर पर अपनी लेखनी के बलबूते सशक्त हाजरी दर्ज की है। यही वजह है कि उनसे उम्मीदें बढ़ गई हैं।
          व्यंग्य विधा इन वर्षों में लोकप्रियता के शिखर पर है। समय व समाज की हकीकत व व्यवस्था की विसंगतियों को चुटीले अंदाज में उजागर करने में व्यंग्य विधा का कोई सानी नहीं है। डॉ. नीरज के दो व्यंग्य संग्रह हाल ही में प्रकाशित हुए हैं- ‘टांय टांय फिस्स’ एवं ‘पंच काका के जेबी बच्चे’। गौरतलब है कि दइया के व्यंग्य देश के नामी दैनिक पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं, जिससे व्यंग्य-पाठकों के बीच वे लोकप्रिय हैं। इसी क्रम में यहां यह भी उल्लेखनीय है कि डॉ. नीरज दइया ने अपने समकालीन दो वरिष्ठ लेखकों बुलाकी शर्मा एवं मधु आचार्य ‘आशावादी’ के समग्र सृजन के सरोकारों को आलोचक के रूप में देखने-परखने का काम भी किया है। ‘बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार’ एवं ‘मधु आचार्य आशावादी के सृजन-सरोकार’ पुस्तकों के माध्यम से न केवल इन दोनों समकालीन लेखकों के सृजन के बहुआयामी पक्षों से परिचित हुआ जा सकता है वरन हिंदी आलोचना में विकसित होती आत्मीय भाषा, नवीन शिल्प एवं अभिनव दृष्टि को भी यहां चिन्हित किया जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह क्रम अन्य रचनाकारों हेतु भी जारी रहेगा।
००००
 आभाअर : दुनिया इन दिनों / दिल्ली / अक्टूबर (प्रथम) 2017 / प्रधान संपादक : श्री सुधीर सक्सेना

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें