02 अक्तूबर, 2017

गांधीजी का चश्मा

० डॉ. नीरज दइया
    मैंने नया चश्मा बनावा कर आफत मोल ले ली। मुझे जो भी देखता है कहता है- वाह गांधीजी का चश्मा। अरे भाई मेरा चश्मा है और मैंने नया बनवाया है। बात स्टाइल की है। बापू के साथ-साथ उनका चश्मा, घड़ी, लंगोटी, सैंडल और लाठी सभी प्रसिद्धि पा गए। इसी प्रसिद्धि के चक्कर में चरखा और खादी लोकप्रिय हुए। भले कोई गांधीजी को दागदार माने, पर यह तो मानना होगा कि वे सबसे कम दागदार है। इतने कम कि दाग नजर नहीं आते। उनको मानने वाले तो खैर उन्हें बेदाग मानते ही हैं। स्वच्छा अभियान में स्बच्छ गांधीजी के स्वच्छ चश्मे का उपयोग हुआ।
    दाग-प्रेमी कहते हैं कि चश्में की दो आंखों में देखिए एक पर स्वच्छ लिखा है दूसरी पर भारत। जहां स्वच्छ लिखा है वहां भारत नहीं है और जहां भारत लिखा है वहां स्वच्छता नहीं है। ऐसे कुतर्कों के कारण हंसी आती है। जब ईश्वर की दी हुई दो आंखें है, तो इतना फर्क क्यों सोचते हो? दोनों बिल्कुल पास-पास है। और अगर बात किसी एक आंख की ही करनी है तो तारक मेहता का उलटा चश्मा और जसपाल भट्टी के उलटा-पुलटा को याद करो। जब तुम्हारी इच्छा हो चश्मा सीधा करो और जब जब इच्छा हो उल्टा कर लो। आप को क्या देखना है यह आप खुद पर है। आप ऐसा भी कर सकते हैं कि स्वच्छता अभियान के दो चश्में लाएं, एक को सीधा दूसरे को उसी पर उल्टा लगाकर एक साथ स्वच्छ भारत देख सकते हैं।
    गांधी-चश्मा लगा कर कोई गांधी नहीं बनता, पर जब कोई गांधी चश्मा लगता है तो वह गांधी-चश्मा बन जाता है। मुझे यह परम ज्ञान प्राप्त हुआ। मैं गांधीजी का परम भक्त बन गया। वे हमारे राष्ट्रपिता कहे जाते हैं। महात्मा गाँधी के चश्मे वाली तस्वीर का स्वच्छ भारत शौचालय में देखा तो वहां जाने के मूल कर्म बिसराकर मैं पोस्टर फाड़ने लगा। यह तौहीन है कि स्वच्छ बापू के स्केच, फोटो का उपयोग गंदे स्थानों पर किया जाए। रहस्य यह भी है कि स्वच्छता अभियान गंदे स्थानों के लिए नहीं है। हम इतनी समझदारी तो रख सकते हैं कि अच्छे स्थानों को पहले थोड़ा सा गंदा करवाते हैं, फिर स्वच्छा अभियान में हिस्सेदारी प्रगट करने के लिए झाड़ू लेकर प्रेस फोटो का जुगाड़ करें।
    प्रचार-प्रसार जरूरी है पर इतना जरूरी नहीं है कि शौचालय की दीवारों तक बापू को पहुंचा दें। वहां की गंदगी देख कर बापू को बुरा लग सकता है। महात्मा गांधी का कहना था कि वे अपने चश्मों से आज़ाद भारत की तस्वीर देखते हैं। हे आजाद भारतवासियों ! उन्हें ऐसी तस्वीर तो मत दिखाओ। वैसे भी वे हत्‍या, लूटपाट, दुष्‍कर्म, मारा-मारी के साथ-साथ समुदाय विशेष के दंगों को देखकर आंसू बहा रहे है। चश्में का इतना क्रेज है कि दिल्ली के अति सुरक्षित राष्ट्रपति निवास के पास ग्यारह मूर्ति से कोई आपका चश्मा ले गया। पंच काका कहते हैं कि जिस चश्मे से आजाद भारत की तस्वीरें बापू देखा करते थे वे अब नहीं दिखाई देती। अब तो नई-नई तस्वीरें है। छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी... नए दौर में लिखेंगे, मिल कर नई कहानी हम हिन्दुस्तानी, हम हिन्दुस्तानी। बापू को भले पसंद नहीं आए, पर हमने कहानी शानदार लिखी है और लिखते चले जा रहे हैं।
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