18 अक्तूबर, 2017

‘पाछो कुण आसी’ - मानवीय संवेदनाओं व हेत-प्रेम के जीवंत चित्र

० सी.एल. सांखला, कोटा
    मनुष्य होने की पहचान उसके अंतस में हेत-प्रेम व मानवीय संवेदनाओं का संचरण ही है। संवेदनाओं की सघनता मनुष्यता को सही मायने में प्रामाणिक बनाती है। अमूर्त भावनाओं का जितना अधिक जुड़ाव जीवन से होता है, वे उतनी ही तीव्रता से कविता में ढलकर समूर्त होने लगती है।
    राजस्थानी कविता और गद्य में अपनी गहरी पकड़ व पैठ रखने वाले नीरज दइया तीन चार दसकों में जो साहित्य सर्जना की है, बेहद मूल्यवान है। कविता संग्रह ‘साख’ (1997), देसूंटो (2000), हिंदी कविता- ‘उचटी हुई नींद (2013) तथा ‘आलोचना रै आंगणै’ (2011), ‘बिना हासलपाई’ (2014) आदि उम्दा रचाव के साक्ष्य हैं। वर्ष 2015 में सर्जना बीकानेर से प्रकाशित राजस्थानी कविता संग्रह ‘पाछो कुण आसी’ की कविताएं मनुष्य की आंतरिक संवेदनाओं व हेत-प्रेम की सशक्त अभिव्यक्ति है।
    वक्त की गिरफ्त में संवेदना शून्य हुए व्यक्ति को जगाने व पुनः संवेदित करने के सद्प्रयत्न में कवि बार-बार ‘हेलो’ करता है-
म्हैं हेलो करूं
हेला माथै हेलो करूं
बारंबार करूं
दिन-रात करूं
मन-आंगणै करूं...
कदैई तो सुणैला थूं। (हेलो)
    कवि की दृष्टि में संवेदनशील मानवीय चेतना से मिलन अथवा अनुभूति ही सही मायने में पुण्य कर्म या सौभाग्य है तथा उससे परे हो जाना ही पाप या दुर्भाग्य है। कवि को यह दृष्टि यथार्थ व आदर्श तथा विज्ञान व अध्यात्म को सुसमन्वित करती है-
        थारी ओळूं में जीवणो
        पुन्न है म्हारो
        थनै बिसरावणो पाप। (पाप-पुन्न)
    मनुष्य जीवन एक सत्य है परंतु मृत्यु उससे भी अधिक ठोस सत्य है। जीवनदात्री बहमाता जब अतिरिक्त जीवन शक्तियां देती हैं तो मुस्कुराती है। साथ ही कवि भी मुस्कुराता है। दोनों जानते हैं कि जीवन से पहले मृत्यु लिखी जा चुकी है-
        जीवण सूं पैली मौत लिखी
        कीं देवण लाग्या जद बैमाता
        मुळक्या
        मुळक देख’र मुळक्यो म्हैं। (बिसरगी मुळकती-मुळकती)
बहुत ही कम शब्दों में कवि नीरज दइया बहुत बड़ी बात कहने में सिद्धहस्त हैं-
        लोग मौको तकै
        ठाह ई कोनी लागण देवै
        काट’र लेय जावै नस। (लोग मौको तकै)
दइया की इन कविताओं में रोमांचक रूपक एवं बिम्ब योजनाएं दृष्टव्य है-
        आंख री छियां-छियां
दीठ लेय’र जावै
सुपना रै देस। (मिनख एकलो कोनी)
    अंतरंग रागात्मकता और मानवीय हेत-प्रेम मनुष्यता की कसौटी भी है जो इन कविताओं में बखूबी देखी जा सकती है-
थारी ओळ्यूं मांय
खदबदीजै काळजो
बरसै बादळां दांई
थारी हूंस... ! (हूंस)
    कवि मानव मन की इच्छा शक्ति तथा क्रियाशीलता को जिंदगी के लिए आवश्यक मानता है अन्यथा जिंदगी व मौत में कोई अंतर नहीं रह जाता। ‘सगळा मारग’ कविता से ये पंक्तियां शायद यही बात कहती है-
जे मिलण री हूंस नीं
कांई करैला संजोग
आपां रै मून रैयां
मर जावैला
सगळा मारग। (सगळा मारग)
    वस्तुतः ये कविताएं अमूर्त भावों की कोरी कल्पनाएं न होकर साधारण आदमी की जद्दोजहद एवं जीवट की मूर्त अभिव्यक्ति है। जिनमें संदेश भी है और प्रेरणाएं भी-
साची ! अंगूठो कैवतां ई
म्हारी आंख्यां साम्हीं आवै- गुरु द्रोण
जे कर लेवूं आंख्यां आडो हाथ
लखावै- गायब हुयग्या म्हारा अंगूठा...। (अंगूठो)
    ‘पाछो कुण आसी’ कविता संग्रह की सभी कविताओं में यूं तो छंद मुक्त कविताएं है जिनमें गद्य कविताओं की बानगी हैं, किंतु सही मायने में ‘गद्य कविताएं’ शीर्षक देकर जो संकलित है उनमें ‘चालो माजी कोटगेट’, ‘इंदरधनुस’, ‘ऊंट’, ‘चकारियो’, ‘भींत’, ‘धीरज’, ‘प्रेम’ आदि कविताएं पढ़ना व समझना जरूरी है। यह एक बेजोड़ संग्रह है। इनमें अतीत के गुणगान नहीं, वरन गुजरे वक्त की जीवंत बची धड़कने साफ सुनाई देती है। यहां समय के साथ कदमताल करती जिंदगी तथा बदलते समय की आबोहवा में सांस लेती मनुष्यता की लिखावट में तृष्णा और भटकाव है तो भविष्य की असल कथाएं कहती कविताएं भी। भले ये कविताएं सम्मोहन पैदा न करती हो, पर यथार्थ की परते खोलती हुई पथराई आंखों को खोलती है तथा सुप्त संवेदनाओं को जगाती है। यहां मानवीय जीवन का अद्भुत व सौम्य चित्रण सहज ही देखने को मिलता है। माटी की सौंधी महक से नहाए हुए शब्द एवं राजस्थानी मुहावरों से सुगुंफित कवितांश व काव्यावलियां पाठक को सहज ही प्रभावित करने वाली है।
पुस्तक-        पाछो कुण आसी
विधा-           राजस्थानी कविता संग्रह
कवि-           डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक-     सर्जना प्रकाशन, बीकानेर
कीमत-        140 रिपिया
संस्करण-     2015
पृष्ठ-             96


दैनिक युगपक्ष 07-11-2017 

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