16 अक्टूबर, 2017

लक्ष्मी-सरस्वती संवाद

डॉ. नीरज दइया
ताजा ताजा खबर है कि घटिया स्कूली शिक्षा देने के मामले में भारत को सिल्वर मेडल मिला है। वर्ल्ड बैंक के इस परिणाम में कहीं कोई चूक हुई है वर्ना हमें गोल्ड की उम्मीद थी। सर्वे और सैम्पल टैस्ट में हमारे बच्चों में नकल की बीमारी के कारण हम थोड़ा पिछड़ गए हैं। पिछड़े हुए है तो क्या हम मिडल क्लास परिवार वाले मंथली बजट में खाने-पीने के खर्चे के बाद दूसरा सबसे बड़ा खर्च शिक्षा पर करते हैं। सरस्वती हम पर मेहरबान हो इसलिए लक्ष्मी को लुटाते हैं। हाल यह है कि सरस्वती की कृपा होती नहीं और जो कुछ लक्ष्मी कृपा हमारे पास होती है उस से हाथ धो बैठते हैं। काश कि सरस्वती के चक्कर में लक्ष्मी को बर्बाद नहीं करते तो वर्ड बैंक द्वारा घटिया स्कूली शिक्षा में तो अव्वल घोषित हो जाते। इसी मुद्दे को लेकर लक्ष्मी-सरस्वती में जोरदार भिडंत हो गई।
लक्ष्मी - देश में रक्षा और शिक्षा पर सर्वाधिक अधिक खर्च होता है। फिर भी तुम निहाल क्यों नहीं करती?
सरस्वती - यह मेरी मर्जी है किसे निहाल करूं किसे बेहाल, तुम मुझे पूछने वाली होती कौन हो?
लक्ष्मी- मैं होती कौन हूं, तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मुझसे सवाल करती हो। जुबान लड़ाती हो !
सरस्वती - जुवान लड़ाने से क्या मतलब है तुम्हारा। अरे सारा खेल ही इसी जुबान का है। बच्चों को स्कूल में सब बातें करनी आती है पर तुम्हारे गणित के सवाल ठीक से करने नहीं आते। जहां तुम तुम्हारा नाम वहां सब घोटाला।
लक्ष्मी - अरे जा जा, तुम भी दूध की धुली नहीं हो। मुझे क्या पता नहीं है कि बच्चे किताब पढ़ना ही नहीं जानते हैं। पहले तुम अपनी कृपा करो कि वे किताब ठीक से पढ़ना जान जाए। दो अंक ठीक से लिखेंगे तभी तो गणित के सवाल ठीक से कर पाएंगे।
सरस्वती - मैं तो सब कुछ कर दूं पर तुम जो बीच में टांग अड़ाती रहती हो, उसका क्या ? बात होती है शिक्षा की और सब बजट की बातें करते हैं। तुम को पाने के और अपने घर भरने के लिए नई नई योजनाएं लाते हैं, उसका क्या। अरे जब सबकी नजरों में तुम ही तुम हो तो मैं अपनी कृपा क्यों बरसाने लगी। मैं भी देखती हूं कि तुम्हारे बल पर ये कितनी उछल-कूद करते हैं।
लक्ष्मी - अरे रहने दे, रहने दे, मेरे बिना तो कहीं कुछ हो ही नहीं सकता। तुम्हारे विद्या मंदिर के गुरुजी भजन कोई फ्री में नहीं करते। उन सब को मेरे से उम्मीद होती है। ये कहने को सरस्वती पुत्र जरूर है पर मेरी औलादों के बिना सब फीके हैं। पगार के कारण सारे खेल होते हैं।
सरस्वती - कलम के धनी साहित्यकार तो मेरे उपासक है।
लक्ष्मी - यहां भी तुम झूठी साबित हो जाओगी। देखती नहीं ये पुरस्कारों के लिए कैसे कैसे छल-छद्म करते हैं। सारी साठ-गांठ तिकड़म और सेठ-साहूकारों की माया से बनाने-बिगाड़ने वाले पुरस्कारों की है। ये नाम के सरस्वती पुत्र है पर भीतर ही भीतर सब के सब ढोंगी बाबा है।
सरस्वती - हे कलम के धनी साहित्यकार ! क्या तूं मेरा सच्चा उपासक है? बोल वत्स....
मैं असमंजस में पड़ गया कि कहीं मेरे झूठ को मां सरस्वती जान नहीं जाए फिर भी प्रत्येक में बोला- हां-हां मैं सच्चा उपासक हूं और अज्ञात भय के मारे आंखें खुल गई।
पास बैठे पंच काका पूछ रहे थे- क्या कोई सपना देखा? मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि रात को ये पढ़ना लिखना छोड़, पूरी नींद लिया कर। बात तो बराबर है, रात में जागता है और दिन में सोता है।
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