04 अक्तूबर, 2017

मील का पत्थर : आधुनिक लघुकथाएं

पुस्तक: आधुनिक लघुकथाएं (अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में संकलित)
सम्पादक: डॉ. नीरज दइया/श्री राजेन्द्र जोशी
प्रकाशक: सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरू मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर
संस्करण: 2017 ; मूल्य: 100 रूपये मात्र


सृजन-नगरी बीकानेर में 14वें अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के पहले ही सत्र में पुस्तक आधुनिक लघुकथाएं का
लोकार्पण होना अपने आप में बीकानेर के लिए बहुआयामी उपलब्धि माना जाएगा। उपलब्धि की पहली बात तो यही है कि यह सम्मेलन यहाँ हो रहा है, इससे इतर उपलब्धियां इस आशय में कि बीकानेर के सम्पादक द्वय डॉ नीरज दइया एवं श्री राजेन्द्र जोशी द्वारा लघु अवधि में स्तरीय लघुकथाएं संकलित करने का सफल प्रयास सामने आया। साथ ही इन संकलित लघुकथाओं को पुस्तकाकार देने में  देशभर में विख्यात सूर्य प्रकाशन मन्दिर के डॉ प्रशान्त बिस्सा एवं उनकी टीम का परिश्रम रंग लाया। इसके उपरान्त विशिष्ट उपलब्धि यह कि इस पुस्तक का लोकार्पण देशभर के ख्यातनाम लघुकथाकारों के सान्निध्य में हो रहा है।
पुस्तक में संकलित लघुकथाएं पढ़ते समय पाठक को प्रत्येक लघुकथा में जहां मानवीय संवेदनाओं का ज्वार उठता महसूस होता है वहीं हर कथा का प्रत्येक पात्र आपको समाज में अपने आसपास देखा, जाना-पहचाना - सा लगता है। यही इन कथाओं की श्रेष्ठता और सफलता का द्योतक है। पुस्तक का आकर्षक आवरण बीकानेर के जाने-माने कलाकार गौरीशंकर आचार्य का बनाया हुआ है, जो कि एक नज़र देखने पर ही गौरीशंकर की अनूठी शैली स्मरण करवा देता है। लघुकथाएं संकलित कर पुस्तकाकार रूप में पाठकों तक पहुंचाने का यह प्रथम प्रयास नहीं है।
इससे पूर्व भी राजस्थान ही नहीं, देश के जाने-माने सृजनकर्ताओं ने श्रेष्ठ रूप में ऐसे सफल प्रयास किए हैं। किन्तु आधुनिक लघुकथाएं का यह संकलन इसलिए भी इतर माना जाना चाहिए कि  इन कथाओं  में एक ओर जीवन मूल्यों को महत्ता दी गई है तो साथ ही हमारे आसपास श्वांसें लेती विसंगतियों को तीक्ष्ण प्रहार के साथ उकेरा गया है। यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि लघुकथा की पहचान के तत्वों को इस संकलन में देखा जा सकता है जैसे कि लघुकथा परम्परा में सकारात्मक पक्ष को विकसित करना। ऐसे तत्वों को पुस्तक की प्रथम रचना ‘पास‘ ( अर्जुनदान चारण ) से लेकर अंतिम कथा ‘पेट’ ( पारस दासोत ) तक पाठक बखूबी रेखांकित पाते है।
लघुकथा पास में आजादी के सिपाही और थाने के सिपाही के माध्यम से कथाकार ने देश को आधुनिक दौर तक पहुंचाने वालों की हालत को आसानी से उकेर दिया है। इस कथा में सरकारी, निजी, वृद्ध, जवान, राज का नौकर और निजी क्षेत्र का कामगार वर्ग की स्थिति का रेखांकन यूं हुआ है मानो आपकी आंखों में लगा सुरमा कोई निकाल ले गया और आपको खबर हुई तो हक्केबक्के रह गए। मानवीय संवेदनाओं का सागर लहराता दिखता है लघुकथा पेट में। श्रमिक वर्ग को यह मालूम ही नहीं कि जिस पेट के लिए वह दिनरात खटता है वह पेट होता क्या है? इससे बड़ी बात इतने कम शब्दों में पिरोने के लिए लघुकथाकार को सलाम। सलाम उन सभी लघुकथाकारों को भी, जिन्होंने लघुकथा परम्परा को बदलते समय और समाज के साथ समन्वय करते हुए संक्षेप में शाब्दिक रूप देते हुए गागर में सागर भर कर दिखाया है। पेज 28 पर भूत और इमली की सांटी/ जयप्रकाश मानस को पढ़ते समय आपको अपना बचपन जरूर याद आएगा। साथ ही याद आएंगी ऐसी अनेकानेक बातें, जिनमें अंधविश्वास और समाज की दशा/दिशा पर आपने यकीनन कई मर्तबा मंथन किया होगा।
पेज 63 पर लक्ष्मीनारायण रंगा की लघुकथा लोरी को आजादी से लेकर अब तक के सभी नेताओं को भी पढ़ना चाहिए। ईश्वर न करे, लघुकथा में वर्णित लोरी हमारी भावी पीढ़ी सुनने का दुर्भाग्य पाले। सच तो यह है कि इस पुस्तक की सभी लघुकथाओं में ऐसी-ऐसी विशिष्टताओं को पाठक पाएंगे जिन्हें वर्णित करने के लिए इस पुस्तक से भी अधिक पृष्ठों वाली एक और पुस्तक की रचना करनी पड़े।
अशफाक कादरी की राज, गोविन्द शर्मा की रक्षा, डा जसवीर चावला की एक दिव्य आत्म-हत्या, देवकिशन राजपुरोहित की माकूल जवाब, नदीम अहमद नदीम की दरबार, नीति केवलिया की नजरिया, फारूक आफरीदी की चोट, डा मदन गोपाल लढ़ा की गहराता सन्नाटा, माधव नागदा की पुराना दरवाजा, राजेंद्र शर्मा मुसाफिर की अहिंसा का स्मरण इत्यादि-इत्यादि सभी ऐसी कथाओं का सागर है आधुनिक लघुकथाएं। सोने पर सुहागा यह कि डॉ अशोक कुमार प्रसाद का अन्वेषणात्मक आलेख लघुकथा का वर्तमान, जयप्रकाश मानस की कलम से लघुकथा की शास़्त्रीयता जैसे शिक्षाप्रद और संग्रहणीय पाठ भी इस पुस्तक में शामिल हैं। शुभ कामनाएं कि निकट भविष्य में यह पुस्तक हमें सभी स्तरीय पुस्तकालयों, वाचनालयों में पढ़ने को मिलेगी तथा हिन्दी साहित्य पाठ्यक्रम में शिक्षण संस्थाओं द्वारा शामिल की जाएगी। आधुनिक लघुकथाएं पुस्तक के लिए सम्पादक द्वय डॉ नीरज दइया और श्री राजेन्द्र जोशी एवं प्रतिष्ठित सूर्य प्रकाशन मन्दिर एवं आवरण चित्रकार गौरीशंकर आचार्य को साधुवाद।
- मोहन थानवी

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