पुस्तक समीक्षा-
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टांय टांय फिस्स व्यंग्यकार : डॉ. नीरज दइया प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग) बीकानेर पृष्ठ : 96 मूल्य : 200/- संस्करण : 2017
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राजस्थान के व्यंग्य लेखन परिदृश्य में आज फारुख अफरीदी, अतुल चतुर्वेदी, अनुराग वाजपेयी, अजय अनुरागी, बुलाकी शर्मा, मधु आचार्य आशावादी, नवनीत पांडेय और अब नीरज दइया भी शामिल हो गये। डॉ. नीरज दइया के सद्य प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘टांय टांय फिस्स’ में उनके चालीस व्यंग्य संकलित हैं। इन व्यंग्य रचनाओं से गुजरते हुए कहा जा सकता है कि डॉ. नीरज दइया उन व्यंग्यकारों में से एक हैं जिनके लेखन में भौतिकतावादी संस्कृति का एहसास हावी नहीं हुआ हैं। अथवा यूं कह लीजिए कि वे अपनी चिंताओं में मनन करने वाले अन्वेषी हैं। अन्वेषक का काम ही अनुसंधान करने का होता है। नए-नए तथ्यों को तलाशना और उस पर मौजूं तरीके से अपनी बात को कहना होता है, जिस पर नीरज दइया को विशेष अधिकार प्राप्त है।
नीरज दइया के व्यंग्य आज समकालीन परिदृश्य में गंभीरता से अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं, उनकी यह चिंता व्यंग्यधर्मिता के प्रति उनके मौलिक चिंतन को जहां व्यक्त करती है, वहीं उनकी सक्रियता को भी दर्शाती है कि क्यों एक कवि-कथाकार व्यंग्य लिखने को विवश हुआ। उनका समाज के प्रति दायित्वबोध व्यंग्य के माध्य से अपनी चिंताओं के साथ अभिव्यक्त हुआ है।
संग्रह के आरंभ में प्राक्कथन में वरिष्ठ साहित्यकार भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ ने लिखा है- ‘डॉ. नीरज दइया एक बहुश्रुत और बहुपठित लेखक है।’ इस उक्ति के साक्ष्य में देखें तो संग्रह में संकलित विविध वर्णी व्यंग्यों में नीरज के लेखन में एक ताजगी दिखती है, वह विषयों को समाज से ही उठाते है लेकिन उसको प्रस्तुत निराले ढंग से करते हैं।
संग्रह की सभी व्यंग्य रचनाओं में एक स्थाई चरित्र के रूप में पंच काका की उपस्थिति से अपनी मौलिकता और निजता बनी है। पंच काका के माध्यम से अनेक सत्यों को उद्धाटित किया है तो व्यंग्यकार नीरज दइया ने व्यंग्य करते हुए खुद को भी नहीं छोड़ा है। वे अपने आप पर व्यंग्य करने का कौशल रखते हैं इसिलिए उनके व्यंग्य में शालिनता और शिष्टता एक स्थाई भाव के रूप में देखी जा सकती है।
विगत दो वर्षों से मैं उनके लेखन का साक्षी रहा हूँ, वे नियमित रूप से कालम लेखन में भी हाथ आजमा रहे हैं। उनका यह हुनर पक्का तीरंदाज बनाने में कामयाब रहा है। रोजमर्रा के विषय कब व्यंग्य के विषय बन जाते है और कब विसंगतियां उस पर हावी हो जाती है। यह एक प्रकार की बैचैनी है, जो लेखक को औजार देती है कि अब आपका काम है कि रनदे से उस वास्तविकता को निखार कर उसे नए अर्थ से भर दें, या उसे परिभषित कर दें। नीरज दइया के लेखन में कहीं कोई दुराव या छिपाव नहीं है। जैसे बड़ी कंपनियां अपने उत्पाद को बेचने के लिए हथकंडे अपनाती है। ऐसा कुछ भी यहां देखने को नहीं मिलेगा। कोई कंडीशन अप्लाई वाला बोर्ड यहां चस्पा नहीं। अपने लेखन से विशुद्ध सरोकार रखने वाले व्यंग्यकार नीरज दइया कभी किसी दौड़ में शामिल नहीं रहे। लेकिन लेखकीय गुण, माहौल उन्हें शुरू से ऐसा मिला कि वे खुद भी मौलिक लेखन के अंतर्गत कविता-आलोचना और अनुवाद-कर्म करते हुए व्यंग्य लेखन में पूरी ठसक के साथ आ गए।
समकालीन व्यंग्य रचनाओं में बदलती स्थितियों के साथ त्वरित टिप्पणियां भी शामिल होने लगी है। हर्ष का विषय है कि इस संग्रह में समकालीनता का आग्रह होते हुए भी स्थितियों पर गहनता से सोच-विचार कर उनको आधार बनाया गया है। जीवनानुभव और जीवन की स्थितियों से मुठभेड़ करते हुए नीरज दइया ने मीठी आलोचना का मीठा फल!!, रचना की तमीज, ‘सामान्य’ शब्द कैसे है सामान्य, खाने-पीने की शिकायत, विकास का गणित, साहित्य माफिया, याद नहीं अब कुछ, बेईमानों पर पड़ी बड़ी मार और टांय टांय फिस्स आदि व्यंग्य लिखते हुए व्यंग्य की लाठी को बचाए रखा है।
नीरज दइया का लेखन विश्वसनीय है। समाज के विषय अब उनके विषय होते जा रहे हैं। व्यंग्य लेखन का दर्द वे समझते है और तभी उनके पास विसंगतियां आकर मुस्कराने लगती हैं। उनके तेवर को देख कर लगता है कि उनकी आलोचना में भी अच्छी पकड़ हो सकती हैं। विषय में से अपने हिस्से की धूप निकाल लेना नीरज दइया भली-भांति जानते है। टांय टांय फिस्स व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य निश्चित ही पठनीय है, और पाठकों द्वारा पढ़े जा रहे हैं। व्यंग्य-यात्रा के सम्पादक डॉ. प्रेम जनमेजय का यह कहना कि व्यंग्य लेखन ऐसा धारधार विषय है कि वह इतना पैना है कि सामने वाले को भयभीत कर दें, लेकिन बिना अहित किए। इससे साफ जाहिर है कि नीरज दइया के पास एक सशक्त भाषा है जिसका उपयोग वे अपने लेखन में बेबाक तरीके से कर रहे हैं। कहीं-कहीं उनके लेखन में हरीश नवल जैसे अत्यंत शालीन व्यंग्यकार बोलते दिखते है तो लगता है कि ‘टॉय-टॉय फिस्स’ को पहचान मिलने में अब देर नहीं। नीरज दइया को लेखन में श्रीलाल शुक्ल होना है, तो मार्कें का सुभाष चन्दर भी। फिलहाल व्यंग्यकार डॉ. दइया को शुभकामनाएं कि उनका लेखन यशस्वी हो, वे अपने पाठक अर्जित करें। पुस्तक के सुरुचिपूर्ण मुद्रण और आकर्षक प्रस्तुति के लिए प्रकाशक साधुवाद के पात्र हैं।
- डॉ लालित्य ललित
सम्पादक, नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया,
नेहरू भवन, 5,इंस्टिट्यूशनल एरिया,फेज-2,
वसन्त कुंज,नई दिल्ली-110070
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टांय टांय फिस्स व्यंग्यकार : डॉ. नीरज दइया प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग) बीकानेर पृष्ठ : 96 मूल्य : 200/- संस्करण : 2017
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राजस्थान के व्यंग्य लेखन परिदृश्य में आज फारुख अफरीदी, अतुल चतुर्वेदी, अनुराग वाजपेयी, अजय अनुरागी, बुलाकी शर्मा, मधु आचार्य आशावादी, नवनीत पांडेय और अब नीरज दइया भी शामिल हो गये। डॉ. नीरज दइया के सद्य प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘टांय टांय फिस्स’ में उनके चालीस व्यंग्य संकलित हैं। इन व्यंग्य रचनाओं से गुजरते हुए कहा जा सकता है कि डॉ. नीरज दइया उन व्यंग्यकारों में से एक हैं जिनके लेखन में भौतिकतावादी संस्कृति का एहसास हावी नहीं हुआ हैं। अथवा यूं कह लीजिए कि वे अपनी चिंताओं में मनन करने वाले अन्वेषी हैं। अन्वेषक का काम ही अनुसंधान करने का होता है। नए-नए तथ्यों को तलाशना और उस पर मौजूं तरीके से अपनी बात को कहना होता है, जिस पर नीरज दइया को विशेष अधिकार प्राप्त है।
नीरज दइया के व्यंग्य आज समकालीन परिदृश्य में गंभीरता से अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं, उनकी यह चिंता व्यंग्यधर्मिता के प्रति उनके मौलिक चिंतन को जहां व्यक्त करती है, वहीं उनकी सक्रियता को भी दर्शाती है कि क्यों एक कवि-कथाकार व्यंग्य लिखने को विवश हुआ। उनका समाज के प्रति दायित्वबोध व्यंग्य के माध्य से अपनी चिंताओं के साथ अभिव्यक्त हुआ है।
संग्रह के आरंभ में प्राक्कथन में वरिष्ठ साहित्यकार भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ ने लिखा है- ‘डॉ. नीरज दइया एक बहुश्रुत और बहुपठित लेखक है।’ इस उक्ति के साक्ष्य में देखें तो संग्रह में संकलित विविध वर्णी व्यंग्यों में नीरज के लेखन में एक ताजगी दिखती है, वह विषयों को समाज से ही उठाते है लेकिन उसको प्रस्तुत निराले ढंग से करते हैं।
संग्रह की सभी व्यंग्य रचनाओं में एक स्थाई चरित्र के रूप में पंच काका की उपस्थिति से अपनी मौलिकता और निजता बनी है। पंच काका के माध्यम से अनेक सत्यों को उद्धाटित किया है तो व्यंग्यकार नीरज दइया ने व्यंग्य करते हुए खुद को भी नहीं छोड़ा है। वे अपने आप पर व्यंग्य करने का कौशल रखते हैं इसिलिए उनके व्यंग्य में शालिनता और शिष्टता एक स्थाई भाव के रूप में देखी जा सकती है।
विगत दो वर्षों से मैं उनके लेखन का साक्षी रहा हूँ, वे नियमित रूप से कालम लेखन में भी हाथ आजमा रहे हैं। उनका यह हुनर पक्का तीरंदाज बनाने में कामयाब रहा है। रोजमर्रा के विषय कब व्यंग्य के विषय बन जाते है और कब विसंगतियां उस पर हावी हो जाती है। यह एक प्रकार की बैचैनी है, जो लेखक को औजार देती है कि अब आपका काम है कि रनदे से उस वास्तविकता को निखार कर उसे नए अर्थ से भर दें, या उसे परिभषित कर दें। नीरज दइया के लेखन में कहीं कोई दुराव या छिपाव नहीं है। जैसे बड़ी कंपनियां अपने उत्पाद को बेचने के लिए हथकंडे अपनाती है। ऐसा कुछ भी यहां देखने को नहीं मिलेगा। कोई कंडीशन अप्लाई वाला बोर्ड यहां चस्पा नहीं। अपने लेखन से विशुद्ध सरोकार रखने वाले व्यंग्यकार नीरज दइया कभी किसी दौड़ में शामिल नहीं रहे। लेकिन लेखकीय गुण, माहौल उन्हें शुरू से ऐसा मिला कि वे खुद भी मौलिक लेखन के अंतर्गत कविता-आलोचना और अनुवाद-कर्म करते हुए व्यंग्य लेखन में पूरी ठसक के साथ आ गए।
समकालीन व्यंग्य रचनाओं में बदलती स्थितियों के साथ त्वरित टिप्पणियां भी शामिल होने लगी है। हर्ष का विषय है कि इस संग्रह में समकालीनता का आग्रह होते हुए भी स्थितियों पर गहनता से सोच-विचार कर उनको आधार बनाया गया है। जीवनानुभव और जीवन की स्थितियों से मुठभेड़ करते हुए नीरज दइया ने मीठी आलोचना का मीठा फल!!, रचना की तमीज, ‘सामान्य’ शब्द कैसे है सामान्य, खाने-पीने की शिकायत, विकास का गणित, साहित्य माफिया, याद नहीं अब कुछ, बेईमानों पर पड़ी बड़ी मार और टांय टांय फिस्स आदि व्यंग्य लिखते हुए व्यंग्य की लाठी को बचाए रखा है।
नीरज दइया का लेखन विश्वसनीय है। समाज के विषय अब उनके विषय होते जा रहे हैं। व्यंग्य लेखन का दर्द वे समझते है और तभी उनके पास विसंगतियां आकर मुस्कराने लगती हैं। उनके तेवर को देख कर लगता है कि उनकी आलोचना में भी अच्छी पकड़ हो सकती हैं। विषय में से अपने हिस्से की धूप निकाल लेना नीरज दइया भली-भांति जानते है। टांय टांय फिस्स व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य निश्चित ही पठनीय है, और पाठकों द्वारा पढ़े जा रहे हैं। व्यंग्य-यात्रा के सम्पादक डॉ. प्रेम जनमेजय का यह कहना कि व्यंग्य लेखन ऐसा धारधार विषय है कि वह इतना पैना है कि सामने वाले को भयभीत कर दें, लेकिन बिना अहित किए। इससे साफ जाहिर है कि नीरज दइया के पास एक सशक्त भाषा है जिसका उपयोग वे अपने लेखन में बेबाक तरीके से कर रहे हैं। कहीं-कहीं उनके लेखन में हरीश नवल जैसे अत्यंत शालीन व्यंग्यकार बोलते दिखते है तो लगता है कि ‘टॉय-टॉय फिस्स’ को पहचान मिलने में अब देर नहीं। नीरज दइया को लेखन में श्रीलाल शुक्ल होना है, तो मार्कें का सुभाष चन्दर भी। फिलहाल व्यंग्यकार डॉ. दइया को शुभकामनाएं कि उनका लेखन यशस्वी हो, वे अपने पाठक अर्जित करें। पुस्तक के सुरुचिपूर्ण मुद्रण और आकर्षक प्रस्तुति के लिए प्रकाशक साधुवाद के पात्र हैं।
- डॉ लालित्य ललित
सम्पादक, नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया,
नेहरू भवन, 5,इंस्टिट्यूशनल एरिया,फेज-2,
वसन्त कुंज,नई दिल्ली-110070



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