25 सितंबर, 2017

किस्म-किस्म के लोकार्पण

डॉ. नीरज दइया
    मुझे लोकार्पण बहुत अच्छे लगते हैं। मैं अत्यधिक पुस्तक प्रेमी हूं। कोई लोकार्पण हो, कहीं लोकार्पण हो, मेरी इच्छा रहती है कि पहुंच कर मैं शुभकामनाएं दूं। शुभकामनाओं में अपना क्या लगता है। फ्री की शुभकामनाएं मैं सब को देता हूं पर सामने वाला प्रायः फ्री में नहीं लेता। मुझे मेरी शुभकामनाओं को बदले चाय-पानी-ठंडा मिलना तो सामन्य बात है, कभी भरपेट नाश्ता और कभी-कभार भर पेट भोजन का जुगाड़ हो जाता है।
    जब मुझे मालूम चल जाता है कि फलां कार्यक्रम में भोजन भी है तो मैं घर के बच्चों और उनकी अम्मा को साथ लेकर पहुंचना फायदेमंद मानता रहा है। इससे फायदा यह होता है कि घर में चूल्हा जलाना नहीं पड़ता। सुबह ऐसा कोई कार्यक्रम होता है तो सब को पहले से समझाकर ले जाता हूं कि शाम को घर पर उपवास रहेगा जो खाना है वहीं खा लेना। कार्यक्रम अगर शाम का होता है तब हम सभी अगले दिन सुबह उपवास का कार्यक्रम रखते हैं।   
    साहित्य और खासकर पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में भव्य भोज का कार्यक्रम मुझे बहुत अच्छा लगता है। मैं ऐसे आयोजनों में सपरिवार अक्सर थोड़ी देरी से पहुंचता हूं। दूरदृष्टि पक्का इरादा लिए मैं ऐसे आयोजनों के भरपूर ज्ञान से बचता हूं। मैं वक्ता की औकात जानता हूं। अगर कार्यक्रम के आयोजकों ने वक्ताओं को अच्छा पेमेंट किया होगा तो वे बहुत अच्छा अच्छा बोलते हैं। लोकार्पण कार्यक्रम असल में असत्य कार्यक्रम होता है। सच्ची और असली बात कोई प्रायः कहता नहीं। कुछ विद्वान तो लोकार्पण को पुत्र अथवा पुत्री के जन्मोत्सव की भांति केवल बधाई कार्यक्रम मानते हैं। पुस्तकों की विक्री की कमी को देखते हुए प्रकाशकों और आयोजकों को चाहिए कि वे पुस्तक का संस्करण जब तक पूरा बिक ना जाए तब तक बारबार लोकार्पण करें। अब मैं इतना एक्पर्ट हो गया हूं कि पुस्तकें भेंट लेने लगा हूं। कोई भेंट देना नहीं चाहे तो भी जो मैं ठान लेता हूं कर दिखाता हूं। देने वाला कब तक मुझसे बचेगा? मैं उसके सामने बीस बार ऐसे डोरे डालता हूं, कशीदे पढ़ता हूं और साथ खड़ा होकर मुस्कुराता हूं कि उसे शर्म आने लगती है। वह किताब भेंट कर ही देता है। कभी ऐसा भी होता है कि कुछ बेशर्मों के कारण बेशर्म मुझे बनना पड़ता है। किसी एक किताब की कीमत सौ या दो सौ रुपये से भला कम क्या होती है। फिर किताब देने वाला जल्दी में यदि उस पर दो शब्द भेंट के नहीं लिखता तो मैं उसे बेचने का प्रयास भी कर लेता हूं। ऐसी भेंट मिली किताबें जब अधिक  हो जाती है तो घरवाली झगड़ा करती है। घर में इतनी रद्दी किस काम की, बेच दो इन सब को।
    आजकल कुछ लेखक-कवि मेरे जैसे गुणी दर्शक-श्रोता के साथ घोखा करने लगे हैं। वे चुपचाप लोकार्पण कर लेते हैं और भनक लगने नहीं देते है। यह तो सुबह-सुबह अगले दिन अखबार से पता चलता है कि फलां की फलां किताब का फलां जगह लोकार्पण हुआ और फलां-फलां लोग थे।
    पंच काका कहते हैं कि ऐसा लोकार्पण जिसमें चार-पांच मित्र मिलकर फोटो ले लेते हैं और झूठी खबर से लोकार्पण प्रचारित करते हैं उन पर जुर्माना लगना चाहिए! बिना चाय-पानी और मिठाई के लोकार्पण को अवैध करार देकर कड़े नियम बनाने चाहिए। गुपचुप और चुपचाप ऐसे लोकार्पण संज्ञान में आने पर जुर्माने के तौर पर लोकार्पण रिपीट की सजा होनी चाहिए, जिसमें भर पेट भोजन अनिवार्य हो।
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