04 मई, 2017

वीआईपी की खान भारत

ब भारत में ‘आम आदमी’ नामक प्रजाति दुर्लभ और लुप्तप्राय हो गई है। पहले ही आम आदमी को लेकर बहुत समस्या थी। अब तो इस समस्या पर सोचना ही बेमानी हो चला है। हमारे माननीय प्रधानमंत्रीजी ने कह दिया है कि अब हर भारतीय खास और वीआईपी है। मैं किसी दूसरे की बात क्यों करूं, कोई भी काम खुद से ही आरंभ करना चाहिए। चलिए दूर हटिए अब मैं खुद जो कुछ कुछ आम आदमी था अब आज और अभी से खास हो गया हूं। आम आदमी की तरह साधारण जीवन जीते हुए जो सादा जीवन उच्च विचार में यकीन किया करता था आज से बंद। जब प्रत्येक भारतीय खास और वीआईपी घोषित हो चुका है, तब मैं भला पीछे क्यों अटका रहूं। यह मैंने जब सुना, तभी से मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। खुद को खास और वीआईपी मानते ही नजारे ही बदल गए। सोचा जब खुद को वीआईपी माना जाए तो लोगों को दिखाने के लिए कुछ खास करना जरूरी है। भारत में लाल बत्ती वीआईपी कल्चर की निशानी मानी जाती थी, लेकिन उसे तो बंद कर दिया गया है। अब जब भारत का प्रत्येक लाल ही वीआईपी है तब लाल बत्ती किस काम की। इतिहास गवाह कि लाल बत्ती के नजरे को सर्वप्रथम कबीर ने पहचाना और लिखा- लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल/ लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल। कवीर का यह रहस्य इस रूप में उद्घाटित हुआ कि सभी भारतीय लाल हैं और खास-वीआईपी लाल-लाली देखते रहो।
    कोई कार्यक्रम करते थे तब पहले वीआईपी की बहुत समस्या होती थी। उनके पास समय होता नहीं था और वे यह समझ लेते थे कि हमारे पास खूब समय है। हमें खूब चक्कर काटने पड़ते थे। अब जब सभी वीआईपी हो चुके हैं तब भी कार्यक्रम में समस्या आ रही है कि किस-किस वीआईपी को मंचस्थ किया जाए। फिलहाल तो सभी मंच गायब करके बस एक ही वीआईपी मुझे ठीक जच रहा है और वह हूं मैं खुद। किसी भी कार्यक्रम में मैं यानी हम मंचस्थ हो जाते हैं, कोई आता है तो उसे भी मंचस्थ कर लेते हैं। आवश्यकतानुसार मंच का आकार-प्रकार बढ़ा लिया जाता है। कुतर्क करने वाले पहले भी थे और अब भी हैं। वे कम नहीं है, पूछते हैं कि श्रोता और दर्शक कहां है। उन्हें अव कौन समझाएं कि खास और वीआईपी भला क्या कभी श्रोता और दर्शक बनते हैं? यह राज की बात है कि अब किसी को श्रोता अथवा दर्शक समझने की भूल कर लेते हैं तो वह भाई-बहन अपनी कथा और साथ मधुर संबंध इति कर लेता है। अब जब हाईकमान ने प्रत्येक को खास और वीआईपी बना दिया, तो क्या यह नियम का उल्लंधन नहीं होगा कि हम किसी को आम आदमी समझें? हमें इतने बड़े और महान नियम को भंग नहीं करना चाहिए।
    दूसरे देशों में अब तो हम भारत से वीआईपी निर्यात कर सकते हैं। कितना अच्छा होगा कि हमारे देश के वीआईपी विश्व के कौने-कौने में पहुंच कर बिगुल बजाएंगे। हमारा अखिल विश्व पर राज्य हो जाएगा। जहां भी जिस किसी दिशा अथवा एंगल से विश्व पटल पर नजर दौड़ाएंगे तो बस हर तरफ भारतीय ही भारतीय नजर आएंगे। हमारे देश के वीआईपी दूसरों की तुलना में अधिक समन्वयवादी रहेंगे इसलिए वे अधिक लोकप्रिय रहेंगे। जाहिर है कि अब हमारी पांचों अंगुलियां घी में है जनाब। मगर पंच काका है जो  कहते हैं कि ये सब नाटक और ढकोसला है। भैया दुनिया एक रंगमंच है..... और हम सब इसकी कठपुतलियां... जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है...कब-कौन-कैसे उठेगा... कोई नहीं जानता.... हा हा हा.. बाबु मोशाए... वीआईपी की खान भारत तो तो गया पर अब मुठ्ठी भर पूर्व वीआईपी सारे नवजात वीआईपियों को मारेंगे।
० नीरज दइया
 

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