14 मई, 2017

साहित्याकाश में दमकता दूज का चांद

समीक्षा : मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन सरोकार/डॉ.नीरज दइया 
हरीश बी.शर्मा


ह 2012 का जाता हुआ दिसंबर था, ‘गवाड़’ फाइनल हो चुकी थी और लोकार्पण के लिए तैयार थी। हमें याद है यह एक अभूतपूर्व लोकार्पण समारोह था जिसमें चार बाई दो की एक बड़ी किताब का लोकार्पण हुआ, यह किताब खुली तो उसमें से कुछ किताबें निकली। अतिथियों ने कृति ‘गवाड़’ का लोकार्पण किया। अपने समय का यह एक अभूतपूर्व कार्यक्रम था और लोगों ने सोचा कि 1995 के बाद 17 साल हुए हैं, पहली बार मधुजी ने किताब लिखी है, अब  अगली कृति के लिए कम से कम 2017 तक का तो इंतजार करना ही पड़ेगा। लेकिन 2017 तक आते-आते उनकी कृतियों की संख्या चालीस हो चुकी है और हालात यह है कि 17 में 17 कृतियां आएंगी,ऐसे कयास लगाए जाने लगे हैं। और मैं नहीं भी कहूं, इस कार्यक्रम का संदर्भ भी नहीं हो तो क्या देश में जहां कहीं भी साहित्य या साहित्यिक गतिविधियों की थोड़ी-बहुत भी चर्चा होती है, उन्हें क्या यह बताना जरूरी है कि हम मधु आचार्य ‘आशावादी’ की बात कर रहे हैं?
यह सच है कि देश के साहित्यिक ठीयों पर बीकानेर का इन दिनों अगर कोई जिंदा रखे हुए है तो वह एक ही नाम है, मधु आचार्य ‘आशावादी’। पाटे, गलियों, दफ्तरों और अकादमियों के बाद कॉफी हाउस तक यह चर्चा है कि बीकानेर में एक व्यक्ति है, जो निरंतर लिख रहा है, छप रहा है और पाठकों का चहेता है। चर्चा यह भी है कि एक रामकिसन आचार्य नाम के पूर्व सरपंच ने तो इनके लिखने के जुनून को देखकर लोकार्पण समारोह के लिए एक रंगमंच बनाकर दे दिया है, जहां आयोजकों को सिर्फ फ्लैक्स और लोकार्पित होने वाली कृति लाने की दरकार है। जब ऐसी चर्चा देश-प्रदेश की राजधानी में होती है तो कौतुहल जागता है, कौन है वह, का सवाल उठना लाजिमी है तो कोई पुराना रंगकर्मी कहता है, ‘अरे अपना मधु...’, सारी बातों को सुन रहा कोई पत्रकार कहता है, ‘पत्रकार मधु आचार्य को नहीं जानते आप?, वही हैं।’
मधु आचार्य आशावादी का नाम आते हुए है बहु आयामी व्यक्तित्व हमारे सामने उभरता है। अपने ठेठ अंदाज, जिसे आप बीकानेर की मौलिक जीवन शैली जैसे शब्द से समझ सकते हैं, में मस्त रहने वाली एक शख्सियत। न ज्यादा गंभीर और न बड़बोलापन।
एक रंगकर्मी, एक पत्रकार, एक रचनाकार और एक ऐसा इंसान जो जरूरत पड़े तो ‘आउट ऑफ वे’ जाकर भी मदद करने से नहीं चूकता। लोग उन्हें मधु आचार्य ‘आशावादी’ के नाम से पहचानते हैं।
दुनिया में अपनी तरह के पहले पिता होंगे विद्यासागर आचार्य जिन्होंने अपने दोनों बेटों को कला-संस्कृति के क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित किया और न सिर्फ प्रेरित किया बल्कि सारी जिम्मेदारियों से मुक्त भी कर दिया। आनंदजी और मधुजी इन अपेक्षाओं पर खरे उतरे और इसके लिए किसी भी तरह के प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
पूर्व महापौर भवानीशंकर शर्मा को गुरु मानने वाले और आलोचक-कवि डॉ.नंदकिशोर आचार्य से सदैव प्रेरित रहे मधु आचार्य के संबंध में एक ही बात उनके समूचे व्यक्तित्व को परिभाषित करती है और वह उनका धुन का पक्का होना है। रंगकर्म किया तो इतनी शिद्दत के साथ कि रंगजगत में बीकानेर का बोलबाला हो गया। बीकानेर को उत्तर भारत की नाट्य राजधानी कहा जाने लगा। पत्रकारिता में आए तो एक सामान्य सांस्कृतिक संवाददाता के रूप में और आज दैनिक भास्कर जैसे हिंदी के बड़े समाचार पत्र के कार्यकारी संपादक हैं और वह भी एक ही संस्करण में, लगातार 16 साल से। यह किसी भी अजूबे से कम नहीं है। साहित्य सृजन की बात आई तो लिखना शुरू किया और इतना लिखा कि पहले से लिख रहे लोगों को तो हैरत में डाला ही, नए लोगों को भय-मुक्त करने का कोम भी किया। उस धारणा को मिथ्या साबित किया कि अभिव्यक्ति कुछ लोगों का ही अधिकार है। साहित्य की हर विधा में कलम चलाने वाले मधु आचार्य की प्रतिबद्धता वरेण्य है। इसका एक उदाहरण देखिए कि एक दिन नाटककार-आलोचक डॉ.अर्जुनदेव चारण ने इतना ही कहा, ‘राजस्थानी में भी लगोलग लिखिया कर...’ और फिर राजस्थानी में भी लिखना शुरू कर दिया।
साहित्य अकादेमी का प्रतिष्ठित सर्वोच्च राजस्थानी पुरस्कार, राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का मुरलीधर व्यास राजस्थानी पुरस्कार, टैस्सीटोरी पुरस्कार, पत्रकारिता का शंभूशेखर सक्सैना पुरस्कार, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी का निर्देशन पुरस्कार और फिर बहुत सारे पुरस्कारों की फेहरिस्त में तीन नागरिक अभिनंदन भी अकेले मधुजी के नाम हैं,
लोगों का जीवन खप जाता है, एक नागरिक अभिनंदन भी नहीं होता, यह शहर मधु जी के तीन-तीन नागरिक अभिनंदन का साक्षी बना। 27 मार्च, 1960 को जन्मे मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने एमए के अलावा एलएलबी भी की लेकिन सक्रिय कला-संस्कृति के क्षेत्र में ही रहे। इस बीच भीष्म सहानी, अफसर हुसैन, त्रिपुरारी शर्मा, रेणुका इसरानी, मंगल सक्सैना और ऐसे ही बहुत सारे लोगों को काम करते हुए देखते रहे, सीखते रहे।
पत्रकारिता में आए तो दिग्गज राजनेताओं के साथ उनके संपर्क स्थानीय राजनेताओं के लिए परेशानियों का कारण बने। बीते तीन दशक में ऐसा कोई भी राजनेता नहीं होगा जिसके साथ मधु जी के संबंधों की मधुरता ने इस कयास को बल दिया कि मधुजी अगला चुनाव लडऩे वाले हैं।    
ऐसे व्यक्ति के सृजन-सरोकार क्या हैं, क्यों लिखता है यह आदमी? बल्कि क्यों इतना लिखता है यह आदमी? यह सवाल यक्ष-प्रश्न सा उभर रहा है। क्योंकि जैसा कि साहित्य की राजनीति के जानकार करते हैं, एक साल में एक ही किताब निकालते हैं या कसमसाहट बढ़ जाती है तो दो। दूसरी भी इस तरह कि पुरस्कारों की पंगत से किसी एक को नहीं निकाला जा सके। ज्यादा समझदार लोग तो यह भी जानते हैं कि पुस्तकों की सरकारी खरीद की प्रक्रिया की मियाद भी प्रकाशन-वर्ष से तीन साल की रहती है, काहे को ज्यादा लिखना? बेवजह बेदखल होने का कोई तुक भी तो नहीं है।
और इस तुकबंदी से दूर, अपनी मस्ती में सराबोर। अगर कोई लिख रहा है तो कुमार विश्वास के शब्द उधार लेते हुए कहूं तो कहूंगा कि ‘कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है, मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है...’
और इस धरती रूपी बेचैनी को समझने के लिए बादल का एक टुकड़ा डॉ.नीरज दइया के रूप में है। डॉ.नीरज दइया उस 2012 के दिसंबर से इस 2017 की मई तक लगातार यह समझने की कोशिश में है कि मधु आचार्य ‘आशावादी’ क्या लिख रहे हैं? सभी जानते हैं कि आलोचना विधा में डॉ.नीरज दइया किसी भी तरह के परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनकी आलोचना किसी का फॉलोअप नहीं होती, बंधे-बंधाए, कहें कि बने हुए फ्रेम में सैट नहीं होती, वे अपनी बात कहने के लिए किसी की दृष्टि को खुद पर हावी नहीं होने देते और अगर कोई यह कहता है कि आपने अपनी बात कहते हुए जब दस संदर्भ या व्यक्ति गिनाए तो दो गलत थे और तीन का उल्लेख आपने नहीं किया। तो वे मुस्कुरा कर कहते हैं मैंने जितना काम कर दिया, उसे अगर आप 60-70 प्रतिशत मानते हैं तो यह अच्छी बात है, बचा हुआ काम आप कर दीजिए, इस बहाने ही सही साहित्य का भला तो होगा। कहने का मतलब, अपनी दृष्टि को लेकर सदैव सजग और जिम्मेदार रहने वाले डॉ.नीरज दइया जब मधु आचार्य के सृजन सरोकारों पर चर्चा करते हैं तो एक लेखक को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर होता है। यह अवसर आज जन-सामान्य को उपलब्ध हो गया है और स्थूल रूप में इस कृति के माध्यम से दिक-दिगंत तक रहेगा।
सामान्यतया इस तरह की किताबों की उपयोगिता एकेडमिक ज्यादा होती है, आम-पाठकों में इस तरह की किताबों का अधिक प्रचलन नहीं होता। लेकिन एक ऐसा लेखक जिसकी फैन-फॉलोइंग जबर्दस्त है और उनके लिए यह तय करना मुश्किल कि कौनसी किताब पढ़ी जाए, यह किताब उनके लिए सबसे अधिक कारगर सिद्ध होगी। इस किताब को पढऩे के बाद वे यह आकलन कर सकेंगे कि उन्हें पहले ‘गवाड़’ पढऩी है या ‘खारा पानी’। ‘सवालों में जिंदगी’ जैसे कहानी संग्रह से निकलना है या उपन्यास ‘हे मनु’ से आज के समय को समझना है।
यह किताब सिलसिलेवार मधुजी की किताबों के कंटेंट और कैरेक्टर पर चर्चा करते हुए पाठकों को अपनी प्रायोरिटी तय करने का अवसर प्रदान करती है। ‘मेरा शहर’, ‘अघोरी’, ‘अवधूत’, ‘उग्यौ चांद ढळयौ जद सूरज’, ‘इंसानों की मंडी’, ‘आकाश के पार’, ‘एट 24 घंटे’, ‘सुन पगली’, ‘आडा तिरछा लोग’, ‘आंख्या मांय सुपनौ’, ‘अमर उडीक’, ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’, ‘अपने हिस्से का रिश्ता’, ‘जीवन एक सारंगी’, ‘श से शायद शब्द’, ‘गई बुलट प्रूफ में’, ‘भूत भूत रौ गळौ मोसे’, ‘हेत रौ हेलो’, ‘एक पग आभै मांय’ में से कौनसी किताब उसकी पसंद की है, यह समझने का मौका देती है।
यह सच भी है कि आज जब एक महीने में एक किताब खरीदकर पढऩे की भी रवायत नहीं है, और फिर खरीद ली जाए तो पढऩे की फुरसत नहीं है, ऐसे दौर में चालीस किताबों को पढऩे के लिए समय निकालना हंसी-खेल नहीं है, ऐसे दौर में यह किताब मधुजी के उन प्रशंसक-पाठकों को,  जो कि पाठक बने ही सिर्फ मधु जी को पढऩे के लिए हैं, उन्हें एक अवसर देती है अपनी पसंद की किताबों का चयन कर लें और उस आधार पर पढऩा शुरू करें।
इसलिए मैं नीरज दइया जी की इस पहल का स्वागत करता हूं। पहले बुलाकी शर्माजी और फिर मधुजी के सृजन सरोकार पर आपने अपनी दृष्टि डाली है तो यह अपेक्षा भी है कि आप इस तरह दूसरे-दूसरे साहित्यकारों के सृजन-सरोकारों पर भी काम जारी रखेंगे, तब तक मधुजी शतक लगा चुके होंगे, काम इस तरह भी जारी रहेगा। 
इस किताब में आई नीरज जी की जिन चार-पांच बातों से मैं सहमत हूं, उनमें से एक, मधुजी का साहित्य नए पाठकों को जोडऩे का काम कर रहा है। दूसरा, उन्हें गद्य में अधिक लिखना चाहिए। तीसरा, लेखक का धर्म पाठकों के लिए लिखना है। चौथा, मधुजी के हिंदी और राजस्थानी लेखन में किसी तरह का घालमेल नहीं है। पांचवी बात, मधुजी के साहित्य में नाटकीय संवादों का बोलबाला रहता है और यही बात उन्हें सीधे पाठकों से जोड़ती है। हालांकि इसके साथ ही मधुजी नाटक कब लिखेंगे? आलोचना में काम क्यों नहीं कर रहे हैं? जैसे सवाल भी उठाए जाते हैं, यह लाजिमी भी है। जो काम करते हुए नजर आएगा, उसी से अपेक्षाएं होंगी लेकिन क्या यह कम नहीं है कि अभी तक मधु जी मन का लिख रहे हैं और जब तक मन का लिख रहे हैं, उन पर अपेक्षाओं का लदान नहीं करना ही ठीक है। फिलहाल तो इतना ही ठीक है कि उनके लिखने से नए लोगों को प्रेरणा मिल रही है, लोगों में लिखने की हूक जागने लगी है।
संभव है कि उन्हें यह लग रहा हो कि बहुत नाटक किए, लेखन की शुरुआत ही समीक्षा से की थी तो नाट्य लेखन या आलोचना के क्षेत्र में बाद में काम करेंगे। साहित्य की इतर विधाओं में खुद को परखा जाए। और इस रूप में वे यहां प्रयोग भी तो कर रहे हैं।
एक जगह स्वयं डॉ.दइया उनके उपन्यास ‘हे मनु!’ पर चर्चा करते हुए यह कहते हैं कि उपन्यास के अनेक घटक यहां अनुपस्थित हैं। इस अनुपस्थित के विस्थापन हेतु नवीन घटक एवं संस्थापनाएं यहां उपस्थित हैं। इस तरह मधु जी ने उपन्यास के जड़ होते जा रहे फार्म में नई संभावनाओं को देखा है।
इस रूप में कहा जा सकता है कि बीकानेर के साहित्यकाश में चंद्रजी के जाने के बाद जो एक वैक्यूम नजर आने लगा था, उसे भरने की दिशा में मधुजी का सृजन संभावनाओं से सराबोर है। हालांकि मधुजी अपने सृजन को अखबार या मैगजीन में फैलाने के पक्ष में कभी नहीं रहे हैंं लेकिन बीकानेर के साहित्याकाश में दमकता यह दूज का चांद दुनिया की नजर में है, इसमें कोई दो राय नहीं है।
नीरज जी ने मधु जी के बहाने बीकानेर ही नहीं बल्कि देश-दुनिया के साहित्य सृजन की पंरपरा पर जो बात की है, वह पाठकों की समझ को विकसित करने के लिए एक समयोचित प्रयोग है। बहुत ही सहजता से डॉ.दइया मधुजी की बात करते हुए जब प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणू, गुलशेर शानी, निर्मल वर्मा आदि से होते हुए राजस्थान और राजस्थानी के साहित्यकारों के सृजन और दृष्टि की बात करते हैं तो न सिर्फ डॉ.दइया के अध्ययन पर गर्व होता है बल्कि मधुजी की सृजन-दृष्टि के विस्तार का भी पता चलता है।
‘घर रा जोगी जोगिया...’ कहावत हम सभी की त्रासदी है। हम व्यक्ति का आकलन उसके व्यवहार से करते हैं और इस रूप में मधु जी इतनी सहजता से लोगों से बात करते हैं कि यह अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो जाता है कि इस व्यक्ति के अंदर संवेदनाओं का इतना गहरा सागर हिलोरे मार रहा है। इस सागर की गहराई को मापने का यह प्रयास स्तुत्य है। इस किताब से मधुजी की गहराई को समझने का जो अवसर नीरज दइया ने उपलब्ध करवाया है, हम बीकानेर के नागरिक उनका नागरिक अभिनंदन करते हैं। वस्तुत: यह एक शोध दृष्टि है और उस शोधार्थी के लिए चुनौती, जो कालांतर में मधु आचार्य पर शोध करने का बीड़ा उठाएगा।
और सबसे अंत में एक बार फिर से आभार नीरज दइया जी का कि इस किताब को समर्पण करने के लिए उन्होंने सबसे सही नाम चुना। यह कृति वत्सलमयी मातृस्वरूपा चेतना भाभीजी और प्रिय युग को समर्पित है।
आदरणीया चेतना भाभीजी वास्तव में मधुजी की चैतन्य ऊर्जा है। नीरजजी, आप बड़े आलोचक माने जाते हैं लेकिन अगर आपको मधुजी के सृजन संसार का अवलोकन करते हुए आलोचना के लिए ज्यादा नहीं मिला है तो इसका कारण चेतना भाभीजी ही हैं, जिनकी पारखी नजर से निकलकर ही यह मधु-कर्म जन तक पहुंचता है।
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मधु आचार्य `आशावादी' के सृजन-सरोकार (2017) डॉ. नीरज दइया ; अवरण : कुंवर रवीन्द्र ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ISBN : 978-93-82307-70-9 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर (राजस्थान) 334001

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