15 मई, 2017

दो भाषाओं से हमें पढ़ती-पढ़ाती हुई एक किताब

पुस्तक समीक्षा/  अजेस ई रातो है अगूण – सुधीर सक्सेना
० नवनीत पाण्डे

“कविता एक मुसलसल प्रक्रिया है, जो शब्दों में उभरती और व्यक्त होती है। कविता की यह प्रक्रिया अलबत्ता लिखे जाने के पहले भी और बाद भी जारी रहती है।” लगभग आधी सदी से कविता-कर्म में लगे वरिष्ठ कवि सुधीर सक्सेना के अब तक प्रकाशित दस से अधिक कविता-संग्रहों यथा - बहुत दिनों के बाद, इक्कीसवीं सदी बीसवीं सदी, समरकंद में बाबर, काल को भी नहीं पता, रात जब चंद्रमा बजाता है बांसुरी, किरच-किरच यकीन, ईश्वर हां, नहीं तो..!, किताबें दीवार नहीं होतीं, धूसर में बिलासपुर और कुछ भी नहीं अंतिम से कवि अनुवाद नीरज दइया द्वारा चयनित कविताओं का प्रकाशन ‘अजेस ई रातो है अगूण’ शीर्षक से प्रकाशित है, जिसमें से उक्त पंक्तियां कवि और उनकी कविताओं के स्वर का सहज ही अंदाज़ा देती हैं। ‘अजेस ई रातो है अगूण’ में नीरज दइया ने राजस्थानी में सुधीर सक्सेना की हिंदी काव्य-यात्रा को समेटने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।
इस चयन से गुजरते हुए महसूस किया जा सकता है कि कवि सुधीर सक्सेना बहुत बड़े कैनवस के कवि हैं। वे बड़े घोषित घरानों और स्थापित नामों की चर्चाओं-स्थापनाओं के खेल से दूर हिन्दी समकालीन काव्य-यात्रा के सजग साधक हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए अहसास होता है कि सक्सेना की कविताओं पर आलोचकों को ध्यान देना चाहिए था। वे हिंदी के ऐसे प्रयोगशील और अभिनव कवि हैं जो राजस्थानी भाषा में जैसे एक पूरा परिदृश्य प्रस्तुत करते हुए अपने पाठ से अविस्मरणीय बन जाने की क्षमता रखते हैं। कविताएं अपने पाठ में बहुत ही सरल-सहज शब्दावली में बिना किसी अतिरेक या आवेश के मध्यम स्वर को साधे आगे बढ़ती है। उदाहरण के लिए शीर्षक कविता का एक अंश देखें- ‘कै अजेस ई रातो है अगूण/ अजेस ई रातो है सूरज रो उणियारो/ अजेस ई रातो है मिनख रै डील मांय बैंवतो रगत.. (कि अभी भी लाल है पूरब/ अभी भी लाल है सूरज का मुखड़ा/ अभी भी लाल है मनुष्य की देह में बहता रक्त..) यह महज एक बानगी भर है। यहां उम्मीद का एक रंग तो है, सूरज के संग बने रहने का विश्वास भी है। स्वयं पर और अपने समय के साथ भविष्य पर यकीन ही कविता में सबसे बड़ी पूंजी है, जिसे कवि पोषित करता है।
कहना होगा कि यह एक ऐसे कवि की कविताओं का संग्रह अपनी मूल भाषा हिंदी और राजस्थानी में है जो कविता में आईनों के चौखटों में सिर्फ सूखे हाड़ चमचमाने, एक तिनके की तलाश में लगातार पचासी करोड़ लोगों के हिचकोले खाने, धरती को हरियाली से, बच्चों की जेबें कंचों से और समुद्र को मछलियों से भरने की बात करते-करते कह सकता है - ‘जद अळघै तांई, अळघै तांई, अळघै तांई, कोई नीं हुवै आपां रै आखती- पाखती, बस, बठै सूं ई सरु हुवै नरक, बठै सूं ई सरु हुवै नरक जातरा। (जब दूर तलक, दूर तलक, दूर तलक कोई नहीं होता हमारे आसपास, बस वहीं से शुरू होता है नरक, वहीं से शुरू होती है नरक यात्रा)। कविता की पुरानी लीक तोड़ने वाले आदमी के लिए कपाल मे थोड़ा-सा क्रोध, दिल में थोड़ा-सा प्यार, थोड़ी नफरत दिमाग में और आँखों में थोड़ी-सी शर्म की अपेक्षा रखने वाले कवि सुधीर सक्सेना की सीधे-सीधे व्यवस्था और आदमी के चरित्र पर चोट करने वाली मारक कविताओं का इस कठिन समय में राजस्थानी में आना मानीखेज़ है।
‘अजेस ई रातो है अगूण’ में संकलित कविताओं में कविता का हर रस-रंग मौजूद है। यही इस चयन की सबसे बड़ी खासियत है। अनुवादक स्वयं कवि हैं, अस्तु कविता की गहरी समझ ने चयन और अनुवाद करते समय कवि को हर ओर से टटोला है। यह संचयन कविता के अनेक पक्षों और भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन के अतिरिक्त कवि की सोच, मन:स्थिति, कवि-दृष्टि को जैसे खोल कर रख देता है। ईश्वर, मनुष्य, प्रकृति, इतिहास, ऐतिहासिक चरित्र (बाबर, तूतनखामेन), प्रेम, समाज, राजनीति, व्यवस्था और जीवन के हर पहलू को समेटे यह कृति काव्य का ऐसा इंद्रधनुष है जो निश्चय ही राजस्थानी अनुवाद-जगत में महत्त्वूपर्ण व मील का पत्थर माना जाएगा। सुधीर सक्सेना की एक कविता की पंक्ति से हम इसे आसानी से समझ और महसूस कर सकते हैं - ‘हम किताब बाद में पढ़ते हैं, उससे पहले हमें पढ़ती है किताब।’
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* अजेस ई रातो है अगूण (कविता-संचयन) मूल - सुधीर सक्सेना, अनुवाद - नीरज दइया प्रकाशक : लोकमित्र, 1/6588, रोहतास नगर (पूर्व), शाहदरा, दिल्ली-110032 संस्करण : 2016, पृष्ठ : 144, मूल्य : 295/

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