26 मई, 2017

वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री बुलाकी शर्मा की टिप्पणी

दूसरे व्यंग्य संग्रह- “टांय टांय फिस्स” पर
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लक झपकते ही समाज अपना रंग-रूप बदल लेता है। किसी रूप-रंग के बारे में कोई व्यंग्यकार लिखने की सोचता है कि उसे पता चलता है कि वह जो सोच रहा था वह तो बदल गया।
व्यंग्यकार डॉ. नीरज दइया के व्यंग्य ‘रचना की तमीज’ की उक्त पंक्तियां जहां पल-प्रतिपल रंग बदलते समाज की ओर संकेत करती है, वहीं मौजूदा समय में व्यंग्यकारों के सम्मुख उपस्थित चैलेंज की ओर भी ध्यानाकर्षित करती है। व्यंग्यकारों की पैनी नजर से तात्कालिक घटनाओं को ही नहीं, वरन उनके कारणों की जांच-परख करते हुए वास्तविक वजह तक पहुंचते हुए समाज को सजग और सचेत करने का जोखिम उठाना होगा। क्योंकि मौजूदा समय में ‘हम समूह राग तो गा लेते हैं पर एकल-गान हमारे बस की बात नहीं।’ ऐसे समय में डॉ. नीरज दइया ने ‘टांय टांय फिस्स’ व्यंग्य संग्रह में ‘एकल-गान’ गाने का जोखिम उठाने का दुस्साहस किया है। वे मौजूदा समय और समाज की विसंगतियों-विद्रूपताओं-विषमताओं को तल्खी से उद्घाटित ही नहीं करते, वरन उनकी तह में जाकर उनके कारणों को खोजने की ईमानदार कोशिश करते हैं। देश-दुनिया में ‘पलक झपकते’ होते परिवर्तिनों पर डॉ. दइया की नजर है और वे उसे अपने अलहदा अंदाज में प्रस्तुत करते हैं।
डॉ. नीरज दइया की नजर से न नोटबंदी बची है, न स्कूली शिक्षा, न लेखक संघ बचे हैं, न वीआईपी, न भष्ट्राचारी बचे हैं, न समाजद्रोही। उन्होंने हर क्षेत्र की विसंगतियों पर करारी चोट की है।
कवि-आलोचक-अनुवादक के रूप में विशेष पहचान रखने वाले डॉ. नीरज दइया हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में सृजनरत हैं। उनका व्यंग्य संग्रह ‘टांय टांय फिस्स’ व्यंग्य विधा को समृद्ध-समुन्नत करनेवाला है। हम सब इसका शानदार स्वागत करते हैं।

-बुलाकी शर्मा 
टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003 ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र
निबन्ध शैली में लिखे गए नीरज दइया के व्यंग्य हमारे परिवेश से जुडी समस्याओं से जूझते हैं। उनके लेखन में व्यवस्थागत विसंगतियां प्रचुर रूप से उजागर होतीं हैं, साथ ही सामाजिक बुराइयों पर उनके तंज उल्लेखनीय हैं। बिना हो-हल्ला किये नीरजजी का व्यंग्य विद्रूपताओं से मुठभेड़ करता है। आशा है इनकी ऊर्जा से व्यंग्य-साहित्य सुदृढ़ होगा।
- अरविन्द तिवारी
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नीरज दइया के व्यंग्य आज समकालीन परिदृश्य में गंभीरता से अपनी मौजूदगी बनाये हुए हैं, उनकी यह चिंता व्यंग्यधर्मिता के प्रति उनके मौलिक चिंतन को जहां व्यक्त करती हैं, अपितु उनकी सक्रियता को भी दर्शाती हैं कि क्यों एक कवि-कथाकार व्यंग्य लिखने को विवश हुआ। उनका समाज के प्रति दायित्वबोध व्यंग्य के माध्यम से अपनी चिंताओं के साथ अभिव्यक्त हुआ है।
-लालित्य ललित 
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आलोचन और कविता में बेहतरीन काम के बाद डा. नीरज दइया हिंदी व्यंग्य के मैदान में भी पूरी तैयारी के साथ उतरे प्रतीत होते हैं। सामाजिक विद्रूपताओं पर उनके व्यंग्य प्रहार गहरी चोट करते हैं। पंच काका के माध्यम से डा. दइया ने समाज के उन चेहरों से नकाब उतारने का प्रयास किया है जो राजनीति, धर्म, व्यापार, साहित्य और पत्रकारिता के साथ अन्य क्षेत्रों में घुसपैठ करके अपनी ‘कलाबाजियां’ दिखा रहे हैं। दरअसल यही बहुरूपिये हमारी सामाजिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने में जुटे हैं। इनकी खबर लेना ही आज व्यंग्यकार का दायित्व है और डा. दइया ने इस दायित्व को कुशलता से निभाया है।
-कृष्णकुमार आशु 
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