16 मई, 2017

साहब की साहबी

मारे बोलन-सुनने और देखने के विषय में सरकारी कानून बने हुए हैं। सभी के पास आंखें तो होती हैं, पर उसमें जो नजर होती है, उससे कुछ का कुछ हो जाता है। उसका ख्याल रखना होता है। जब देने वाले ने ही अच्छी और बुरी दो नजर दी, फिर बुरी नजर पर कानूनी दांव-पेंच क्यों?
जरा सी ऊक-चूक आपकी नजर हुई और आप आए कानून के शिकंजे में। देखने और देखने में फर्क है, तभी तो कानून के हवाले दंडित करने के नियम बनाएं गए हैं। केवल देखने में ही नहीं बोलने में अच्छा और बुरा दो प्रविधियां सामन्यत बोलने की हैं। कहीं जरा सी अभ्रदता, खतरे का आगाज है। संभल कर देखना-बोलना और चलना है। क्योंकि शरीफ आदमी के बीस दुशमन है, जो बदमाश है उसे कोई कुछ नहीं कहता!
घर से दफ्तर को मैं निकलते हुए बीस बार रामजी-रामजी का नाम जाप करके निकलता हूं। सोचता हूं कहीं कुछ उलटा-पुलटा नहीं हो जाए। मैं शरीफ आदमी किसी से माथा लगाना नहीं चाहता। मैं तो इतना शरीफ हूं कि अगर गली का कुत्ता भी रास्ता रोकता है, तब भी उसे अच्छी नजर से देखते हुए मुस्कुराते हुए अच्छा-अच्छा बोलता हूं- कुत्ता भाई साहबजी हटिए, रास्ता छोडि़ए ना। प्लीज, दफ्तर को देर हो रही है।
मुझे याद आता है कि बालपन कितना सहज और आनंदमयी था। कोई कुत्ता रास्ते में दिखई देता तो पहले पत्थर उठाते थे, फिर दे मारा। कहीं कभी कोई सोया हुआ कुत्ता मिल जाता तो उसे लात मारने का सुख, अब कहां! सोचता हूं- तब हम गाय-बैल को तंग क्यों नहीं करते थे? शायद इसलिए कि सीख लिया था- गाय हमारी माता है, बैल हमारा बाप है। अब जाना कि पहले ऐसा क्यों रटाया! गाय-बैल से ऐसा करते तो खेती और किसान जीवन गड़बड़ा जाता।
अब ना खेत रहे और ना खेती। ना वे किसान रहे और ना किसानी जीवन। है तो भी हमारे जीवन में कहां कितना महत्त्व है इन सब का। हम दौड़ते जीवन में फुर्सत कहां से निकाले कि इनको देखें-जाने। बदली दिनचर्या में कुत्तों-बिल्लियों से लेकर घोड़ों-गधों-ऊंटों के लिए प्यार-नफरत की छोडि़ए, ये देखने को बस किताबों और स्क्रीन पर नसीब होते हैं।
पहले प्रकृ ति और पर्यावरण का जीवन और विकास में महत्त्व हुआ करता था। अब तो किसी का कोई महत्त्व नहीं है। जरूरत पडऩे पर ही हम किसी को महत्त्व दे देते हैं। बचपन कितना सहज-सरल था। कोई मिला और मुस्कुरा दिए, अब हम मसीन है। सब कुछ मसीन की भांति करते हैं। हमारी बहुत मजबूरियां हैं। देखिए अगर साहब के सामने जाएंगे तो मुस्कु राना लाजमी है, और अगर रास्ते में साहब का कोई चम्मचा-चम्मची या कुत्ता दिख जाए तो सोचना पड़ता है कि क्या किया जाए, किस बात से बचा जाए! साहब और उनके प्रभामंडल के सदस्यों के अनुसार ही हमें हमारी आचार-संहिता का निर्माण करना होता है। ख्याल रखना पड़ता है कि साहब हमारी किसी बात से नाराज नहीं हो जाए। उनकी नाराजगी का नतीजा हमारी ए.पी.आर. तक पहुंच जाता है।
पंच काका कहते हैं कि तालाब में रहकर मरगमच्छ से बैर नहीं करना चाहिए। यह भी दस्तूर है कि इंसान जैसे ही साहब की पदवी पाता है, वह दूसरी भांति का प्राणी बन जाता है। उसे ऊपर से लेकर नीचे तक सिस्टम में सब एडजेस्टमेंट करना होता है। साहब है तो क्या हुआ, साहब के भी तो साहब होते हैं। इसलिए कभी मूंछें नीची, तो कभी मूंछें ऊंची। उन्हें कभी भौंकना पड़ता, अवसर विशेष पर कभी किसी को दांत दिखाने पड़ते हैं। किसी को कभी काटना पड़ता है। हमें साहब को समझने के लिए जानवरों से कुछ सीखना चाहिए। 
० नीरज दइया 

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