27 अप्रैल, 2017

राजस्थानी को मान्यता तो मिलकर रहेगी : देवकिशन राजपुरोहित

बातचीत / डॉ. नीरज दइया

     श्री देवकिशन राजपुरोहित एक ऐसा नाम है जिनके परिचय में कुछ कहा जाना इसलिए जरूरी नहीं है कि उनके बारे में हम सब बहुत कुछ जानते हैं। बहुत कुछ जानते हुए भी उनके अनेक पहलुओं से हम अब भी अनजान हैं। आपकी लंबी साधाना के अनेक मुकाम है। शिक्षा विभाग में शिक्षक, बाद में पत्रकार और संपादक के साथ यायावरी का आपको लंबा अनुभव है। राजस्थानी और हिंदी की विविध विधाओं में विपुल साहित्य सृजन करते हुए अनेक दौर आपने ना केवल देखे-सुने वरन अनुभूत किए हैं। कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, संस्मरण आदि में सृजनरत रहते हुए वे देश-प्रदेश की राजनीति, समाज और साहित्य के अनेक पक्षों के गंभीर जानकार के रूप में पहचाने गए हैं। आपने लोक साहित्य और संस्कृति का विशद अध्ययन, मनन और चिंतन किया है। देश-विदेश की अनेक यात्राएं की हैं तो आप राजस्थानी भाषा के प्रवल पैरोकार और प्रखर वक्ता हैं। छद्म और आड़म्बर से परे सदा खरी-खरी बात कहने वाले आप समालोचक हैं। मीरा के जीवन और साहित्य पर काम करने वाले विशेष विद्वानों की श्रेणी में आपकी गणना देश में कोटी के शोधकर्ता के रूप में की जाती हैं, इन सब से परे आप हमारे ऐसे आत्मीय पुरखे है जो सभी छोटे, बड़े और अपने समव्यस्कों पर समान रूप से स्नेह और आत्मीयता की वर्षा करते हुए अविस्मरणीय-अद्वितीय इंसान है। हमारे आग्रह पर ‘मरु नवकिरण’ के लिए खास तौर से एक संवाद कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया ने राजपुरोहित जी से किया है। यहां प्रस्तुत है चयनित अंश। -संपादक

० इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं?
- लिखे बिना किसी भी लेखक का जीना संभव नहीं। वह अगर लेखक है तो उसे अपना लेखन जीवित रखना चाहिए। इन दिनों में व्यंग्य लिख रहा हूं, कुछ विषयों पर स्वतंत्र निबंध लिखें हैं तो इन दिनों कुछ समसामयिक निबंध भी मैंने लिखे हैं। कुछ छपे हैं पत्र-पत्रिकाओं में और कुछ छपने वाले हैं।
० आप अनेक विधाओं में सृजनरत रहे हैं तो जाहिर है कि एक जिज्ञासा है कि आपकी प्रिय विधा कौनसी है?
- लेखक की प्रिय विधा जैसा कोई विचार मैंने नहीं किया। मैं या कोई भी लेखक जिस समय जिस विधा में काम करता है वह उसकी प्रिय विधा ही होती है। लगभग सभी विधाओं में काम करते हुए मैंने अपने लेखन से प्रेम किया है। विधाएं मेरी प्रिय रही हैं फिर भी अगर इसका जबाब ही देना हो तो मैं अपनी प्रिय विधा के रूप में उपन्यास, संस्मरण और व्यंग्य का नाम लेना चाहूंगा।
० आप को क्या कहलाना पसन्द है- आपके अनेक रूप हैं- पत्रकार, संपादक, साहित्यकार, व्यंग्यकार, हिंदी लेखक, राजस्थानी रचनाकार, गुरूजी, फिल्मी कलाकार, दाता अनेक नाम हैं। आप बहुत से क्षेत्रों से जुड़े रहे हैं।
- इन सब रूपों में तो मैं हूं ही लेखन इन सब से पहले मैं एक संवेदनशील इंसान के रूप में खुद को पाता हूं। मुझे घर-परिवार और देश-दुनिया की बहुत सी बातें प्रभावित करती है। मैं अपसंस्कृति और विकृत होती मानसिकता से बहुत आहत होता हूं। मैं कोई योद्धा या नेता तो हूं नहीं। अब राजा-महाराजा का युग भी चला गया। ऐसे में किसी परिवर्तन के लिए कोई एक आदेश कहीं से जारी नहीं हो सकता। मेरे पास मेरे शब्द हैं जो मैं एक साहित्यकर और पत्रकार के रूप में काम में लेता रहा हूं। मैं असल में अनेक रूपों में खुद के भीतर एक साहित्यकार और पत्रकार को सदा महसूस करता हूं। मेरा संपादक होना भी इसमें सामिल है। वैसे फिल्मी कलाकार आदि के रूप में कभी कार्य कर लेना तो केबल रूचि है।
० भाषाओं की बात करें तो आप खुद को हिंदी साहित्यकार कहेंगे या राजस्थानी साहित्यकार?
- पहले राजस्थानी और बाद में कोई दूसरा। राजस्थानी हमारी मातृभाषा है। मां का दर्जा कोई नहीं ले सकता। मां आखिर मां होती है और हरेक की होती है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। मां भाषा राजस्थानी से रक्त का संबंध है तो हिंदी ने हमें संस्कार और रोजी-रोटी दी। दोनों का ही ऋण है। राजस्थान तो नमक के लिए विख्यात है कि हम राजस्थानी हिंदी की अवमाना कर ही नहीं सकते हैं। देशभक्ति और स्वाभिमान हमारे रक्त में है।
० आपने पहले राजस्थानी में लिखा या हिंदी में?
- जिसे लिखना जैसा कुछ कहा जा सकता है तो वह राजस्थानी में ही लिखा। राजस्थानी से ही मैंने हिंदी को सीखा। आगे चल कर राजस्थानी से ही बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान कराया। राजस्थानी में पत्रकारिता का सपना देखा। काम भी किया। किसी काम की सफलता और असफलता से बड़ी बात मैं किसी काम को अंजाम देने को मानता हूं। पत्रिकारिता के इतिहास जब कभी लिखा जाएगा उसमें ‘मरुधर ज्योति’ पत्रिका की चर्चा जरूर होगी। राजस्थानी के लिए दिन-रात एक किया है। भाषा, साहित्य के काम के लिए ना दिन देखा ना रात। पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूं इसलिए कह सकता हूं कि दिन-रात कुछ नहीं होता बस काम ही काम होता है। दुनिया जब सोती हैं तब पत्रकार और लेखक जागते हैं।   
० आप एक पत्रकार और साहित्यकार के लेखन में क्या कोई अंतर पाते हैं?
- अंतर इन दोनों के लेखन के जीवन को लेकर है। पत्रकारिता में लिखा हुआ शब्द समय विशेष तक जिंदा रहता है। आज का अखबार कल बासी हो जाता है। पत्रिकाएं जब नई पत्रिका आ जाती है तो पुरानी हो जाती है। साहित्य में कालजयी साहित्य टिका रहता है। किताब कभी पुरानी नहीं होती। आज का अखबार पांच-दस वर्ष बाद फिर से नहीं प्रकाशित होता जब कि किताबों के नए संस्करण प्रकाशित होते हैं। लोकप्रियता लेखन की लंबे समय तक रहती है। मेरा मानना है कि जो सामयिक और अच्छा लिख पाते है वे पत्रकार ही साहित्य-लेखन में सफल होते हैं। जो खुद को केवल खबरों तक सीमित रहते हैं, वे केवल पत्रकार ही रहते हैं।
० अपने लेखन के विषय में क्या कहना चाहते हैं?
- मैं वर्ष 1967 से निरन्तर लिख रहा हूं। नवरात्रि 2017 में मेरे लेखन के 50 वर्ष पूरे होंगे। मैं सबसे पहले नवज्योति में 1967 में छपा था। मुझे याद है तब भी नवरात्रि ही चल रही थी। अब तक मेरी 65 पुस्तकें आ चुकी है। आगमी दिनों में एक बड़ा अभिनंदन कार्यक्रम और ग्रंथ मित्रों द्वारा प्रस्तावित है।
० राजस्थानी की मान्यता के विषय में आपका क्या मानना है?
- मैं तो राजस्थानी के सुनहरे भविष्य को देखता हूं। पूरे दावे के साथ कह रहा हूं कि राजस्थानी को मान्यता तो मिलकर रहेगी। आज नहीं तो कल इस भाषा को मान्यता देनी ही पड़ेगी। मान्यता देने में देरी कर सकते हैं पर इसे मान्यता मिलना अटल है।
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