05 मई, 2017

आत्मीय और सारगर्भित गंभीर टिप्पणी

बुलाकी शर्मा हिंदी और राजस्थानी के सिद्धहस्त लेखक हैं; कृतित्व में अनेक आयामों को समेटे हुए, जागरूक और निर्भीक लेखक। शब्द उनके साथी हैं और आयुध भी। उनके सरोकारों का दायरा व्यापक है। उनकी जीवन-यात्रा ऋजुरेखीय नहीं रही है। वे घुमावदार पेचीदा मोड़ों से गुजरे, जद्दोजहद की और गर्दिश व अच्छे दिनों में रचनाकर्म में यकसां शरीक रहे। नौकरियां छूटी, मगर शब्दों से उनका संग-साथ कभी न छूटा। उन्होंने बाबूगीरी की, अध्यापन किया, लघुकथा तथा कहानियां लिखीं, व्यंग्य-लेखन किया, स्तम्भ-लेखन किया और संपादन किया और आज वे राजस्थानी के लेखन के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हैं। सच तो यह है कि यह प्रतिष्ठा अब वे ‘साठा-पाठा’ होने के वर्षों पूर्व अर्जित कर चुके हैं। समकालीन राजस्थानी व्यंग्य और कहानी की गाथा भाई बुलाकी शर्मा की चर्चा के बिना अधूरी रहेगी।
डॉ. नीरज दइया ने ‘बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार’ लिख कर एक सामयिक, जरूरी और बड़ा काम किया है। नीरज का बुलाकी भाई से परिचय अपने पिता और राजस्थानी व्यंग्य के पितामह सांवर दइया के समय यानी बालपने से है। वे अपने अग्रज लेखक के जीवन-संघर्ष, स्वभाव, लेखन-कौशल, आचार-विचार, अंतर्दृष्टि, वरीयताओं और उपलब्धियों से गहरे परिचित हैं। बुलाकी और नीरज में बड़ा साम्य यह है कि एक तो दोनों ही बहुआयामी शब्द-शिल्पी हैं, दूसरे लहरों को ऊपर ही ऊपर छूने के बजाए दोनों ही लहरों में गहरे धंस कर अतल गहराइयों से मूल्यवान शंख, सीपियां, मुक्ता और प्रवाल बटोर कर लाते हैं। अपनी इस कृति में नीरज ने अत्यंत आत्मीयता, धैर्य और गंभीरता से बुलाकी भाई के व्यक्तित्व और कृतित्व के ऊतकों (तंतुओं) को इस तरह उद्घाटित और चित्रित किया है कि बुलाकी शर्मा को न जानने वाले बुलाकी शर्मा को जान सकें और उन्हें जानने वाले और ज्यादा और और गहरा जान सकें। बुलाकी के अंतरंग को बूझने में नीरज सफल रहे हैं। अपने समकालीन और मित्र लेखक के बारे में लिखना नितांत जोखिम का पर्याय है, किंतु नीरज बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने कृति को प्रशस्ति या ‘चालीसा’ नहीं होने दिया है। मुमकिन है कि कतिपय जन उनसे अहसमति व्यक्त करें, जब वे बुलाकी शर्मा को प्रथमतः कहानीकार करार देते हैं। बरहाल नीरज ने बुलाकी भाई के बहाने अंशतः आधुनिक राजस्थानी कहानी और व्यंग्य का इतिहास लिख ड़ाल है।
इन पंक्तियों को लिखते हुए कृति के नायक और कृतिकार दोनों के अक्स मेरे जेहन में बराबर और बरबस उभर रहे हैं। गौर और श्याम वर्ण इस युग्ल के चेहरों की मैं बिना मुस्कान के कल्पना भी नहीं कर सकता। दोनों जब भी दिखें- सस्मित दिखें, दोनों का यह बांकपन इस कृति में भी है। रुसी में कहूं तो बुलाकी ऊ नास अद्ना.... बुलाकी तो बस एक ही हैं अनूठे और अद्वितीय। बुलाकी भाई के सरोकार और विकसे, कलम और निखरे और भाई नीरज दइया हमारे समय के रचनाकारों को इसी तरह साहसपूर्वक शब्द चित्रित करते रहें, यही शुभेच्छा और हार्दिक बधाई।
 - डॉ. सुधीर सक्सेना
प्रख्यात कवि-संपादक
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बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (2017) डॉ. नीरज दइया ; अवरण : कुंवर रवीन्द्र ISBN : 978-93-82307-69-3 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003 ; पृष्ठ : 88 ; मूल्य : 200/-
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