10 मई, 2017

जुल्म-ए-जलसा

ब्द और साहित्य की दुनिया मुझे सदा ही भ्रमित करने वाली लगती है। वैसे कहने वाले कहते हैं कि शब्द और साहित्य हमारे भ्रम को दूर करने वाली दुनिया है। मैं जान नहीं पा रहा हूं कि फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? अब ‘जलसा’ शब्द को ही लिजिए। मुझे लगता है कि जलसा यानी जो जल सा है। पानी जैसा जो हो उसको जलसा कहना चाहिए, पर इसका अर्थ कुछ दूसरा ही है। जलसा अथवा कोई भी शब्द कहां से आया है यह भी हैरान करने वाली बात है। कहते हैं हिंदी में खुद के शब्द तो बहुत कम है। अन्य भाषाओं से बहुत से शब्द हिंदी ने ग्रहण कर लिए हैं। उर्दू, फारसी, अरबी और यहां तक चीनी जैसी विदेशी भाषाओं को भी नहीं छोड़ा। हिंदी अगर भारतीय भाषाओं से शब्द लेती है तो यह उसका निजी मामला है। ‘जलसा’ शब्द जो मुझ पर जुल्म ढाने वाला बना है, उसका यहां असली अर्थ साहित्य की दुकान है। हर जगह साहित्य की अपनी-अपनी दुकाने हैं। जो संस्थाजीवी लोग हैं वे कार्यक्रम करवाते हैं और हमारा भाग्योदय होता है। इन कार्यक्रमों में हम आमंत्रित होते हैं। ऐसे कार्यक्रम में भोजन अथवा अच्छा नाश्ता हो तो ‘जलसा’ शब्द काम में लेना सार्थक होता है। जलसा यानी ऐसा आनंद जिसमें पेट का फायदा हो। कहना-सुनना तो होता ही रहता है। असली आनंद तो आस्वाद का है। साहित्यिक रस का असली आस्वाद यहीं से आरंभ होता है। आरंभ में मैंने जिस ढंग से शब्द और साहित्य के भ्रम का जिक्र किया, उसका एक उदाहरण तो यही है कि आपको इस पंक्ति तक ले आया हूं और आप जुल्म को खोज रहे हैं।
    जुल्म यह है कि आप को किसी जलसे का बुलावा हो और आप सब बातों-चर्चाओं से दूर सीधे भोजन अथवा नाश्ते से ठीक पहले उपस्थित होकर जलसे का मान रखें। जुल्म यह है कि कार्यक्रम को नियत समय पर आरंभ नहीं कर के श्रोताओं और मंच के अतिथियों के इंतजार में जो पहुंच गए उनका धैर्य-परीक्षण करते रहें। जुल्म यह है कि कार्यक्रम में विषय पर बोलने के स्थान पर ज्ञान की उल्टियों से इतनी बदबू फैला दें कि श्रोता बिना नश्ता-भोजन किए ही घर जाने का निर्णय करने पर विवश हो जाएं। जुल्म यह है कि आपको जिसने मंच दिया है, उसी की बखिया उधेड़ने का सिलसिला आरंभ किया जाए। कहां तक बताएं भैया, जल्मों की लंबी और अलग-अलग दास्तानें हैं। जुल्म यह है कि दो-तीन घंटे कार्यक्रम को ऐसा घसीटा जाए और बाद में रहस्य खुले कि केवल चाय बिस्किट है। जुल्म यह है कि एक जलसे को कराने का इतना खर्चा होता है और अखबार वाले चार लाइनों की खबर छापते हैं। बड़े बड़े जलसों में वक्ताओं द्वारा कहा कुछ जाता है और अखबारों में लिखा कुछ जाता है। साहनुभूति से सोचिए कि आयोजक को कोई जलसा करना होता है तो कितनी तैयारियां करनी होती है। निमंत्रण पत्र लिखो, छपवाओ। बैनर बनावाओ, हॉल बुक करो। खान-पान विभाग के साथ मंच के अतिथियों के आने-जाने और ठहरने आदि की अनेक व्यवस्थाओं में धन के साथ मानव श्रम का हिसाब-किताब जलसा पूरा होते-होते जल्मों की पूरी गाथा बन जाता है।
    पंच काका कहते हैं कि जलसा होना चाहिए पर बेहद सादगी के साथ। आज तक हुए अनगिनत जलसों ने इतना जुल्म ढाया है अब तो जलसों पर ही जुल्म करने का जमाना आ गया है। कोई जलसा करना हो तो उसे गुपचुप तरीके से किया करो। कहने वाले कहेंगे कि गोथली में गुड़ फोड़ लिया। कहने-सुनने वालों की परबाह नहीं। आप तो बस मंच पर जितने जो चाहिए उनको खबर करो। गिने-चुने अपने आत्मीयों को बुलाओ और बंद कमरों में जलसा करो। इस नाटकीय जलसों के फोटो और घड़िये जारी कर दो। घड़िये यानी झूठे समाचार। इसी को तो कहते हैं कि हिंग लागे ना फिटकरी, रंग आवे चोखा।
० नीरज दइया
 

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