15 मई, 2017

डिजिटल इंडिया जिंदाबाद

ह जान लिजिए कि दुनिया में बस दो ही डिजिट ‘शून्य’ और ‘एक’ है। बाकी सब बेकार है। एक को हीरो कहा जाता है, तो दूसरे को हम जीरो कह लेते हैं। नंबर वन को हीरो नहीं कहेंगे तो किसे कहेंगे। दुनिया भर का ज्ञान-विज्ञान, धन-दौलत, शब्द और मौन सब कुछ को, कंप्यूटर जीरो और हीरो यानी शून्य और एक के गणित में बदल कर सहज लेता है। यह सब बायनरी यानी दो नंबर के सिस्टम पर आधारित है। यही सिस्टम डिजिटल इंडिया जिंदाबाद सफल बनाने जा रहा है। ‘दो नंबर’ कहते ही आपका दिमाग उलटा-पुलटा चलने लगता है। ऐसा लगता है आप विपक्ष में बैठ गए हैं। भैया यह हमारे पक्ष की बात है और हिंदी में समझा रहे हैं। वरना इसे यदि ‘बाइनरी सिस्टम’ कहते तो आप ऐसा-वैसा सोचते नहीं। यह कोई ऐसा-वैसा नहीं पूरा का पूरा अमजाया हुआ और जांचा-परखा सिस्टम है।
भारत के गांव-गांव में बिजली भले पहुंची ना पहुंची हो पर मोबाइल पहुंच ही गया। जहां बिजली है वहां इंटरनेट है। इंटरनेट और बिजली असल में ‘डिजिटल इंडिया’ के चोली-दामन हैं। याद होगा साक्षरता अभियान जिसमें निरक्षरों को अज्ञानी नहीं कहा जाता था। अब तक जो साक्षर नहीं हो सकें है, उन्हें भी ‘डिजिटल इंडिया’ के लिए जैसे-तैसे तैयार किया जाएगा। कुछ साक्षर और बहुत पढ़े-लिखें यानी एम.ए.-बी.ए. पास देशवासी ऐसे है जो कहते हैं- मोबाइल पूरा चलना आता नहीं। बस फोन कर लेते हैं और उठा लेते हैं। एक लेखक ने लिखा कि उसे इंटरनेट पूरा चलना आता नहीं। बस महीने में एक-दो बार थोड़ा-बहुत देख लेता हूं। खैर जो भी जैसे भी स्थितियां हैं उन्हें नजर अंदाज करके जब भी कहीं डिजिटल इंडिया नाम आए तो हमें हमेशा ‘जिंदाबाद’ बोलना है। सिस्टम को सिस्टम में लाने और यह सिस्टम बनाने कंप्यूटर सिस्टम लगाना जरूरी है। गांब-गांव और गली-मौहल्ले में ऐसा सिस्टम इजाद कर दिया है कि अब कोई डिजिटल इंडिया को रोक नहीं सकता। कहने वाले कहते हैं कि भगवान साहूकार को बाद में पैदा करता है पहले चोर को दुनिया में भेजता है। डिजिटल इंडिया के चोरों को ‘हैकर’ नाम से भेजा गया है। जैसे भारत में साक्षरता अभियान अथवा सतत साक्षरता अभियान चला वैसे ही चोरी-छुप्पे ‘हैकिंग सीखो अभियान’ चल रहा है। नकली नोट छापने वाले और टैक्स चुराने वाले या फिर सीधा-सीधा कहें तो डिजिटल इंडिया को मुर्दाबाद करने वाले सक्रिय है।
मैं और मेरी पूरी मंडली ‘डिजिटल इंडिया जिंदाबाद’ के नारे लगाते-लगाते अपनी कुछ मांगे भी प्रस्तुत करना चाहते हैं। हमारी पहली मांग है- कैसे भी करो, कुछ भी करो पर हमें बिजली चौबीसों घंटे चाहिए। दूसरी मांग है- इंटरनेट की स्पीड को फुल्म-फार किया जाना चाहिए। गति में बिल्कुल समझौता नहीं होना चाहिए। हम हैं तो इक्कीसवीं सदी में और इंटरनेट की स्पीड़ अब भी सोलवीं सदी जैसी है। आती-जाती रहती है, कभी बीच में रुक-रुक कर आती है। तीसरी मांग है- जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से हम वंचित हैं। रोटी-कपड़ा और मकान की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं। सो इन चिंताओं के बीच बिजली और इंटरनेट के बिल के बजट में कुछ जादू होना चाहिए। जैसे कि जीओ ने डाटा फ्री कर नया सिद्धांत लागू कर दिया है। वैसे ही बिजली चोरी करने को मूलभूत अधिकारों में शामिल कर दिया जाना चाहिए। चौथी और अंतिम मांग जरा मंहगी है- हमें दो जोड़ी आंखें और हाथ सरकार द्वारा उपलब्ध कराएं जाएं। ताकि दिन रात डिजिटल में खोए रहे तो बाद में नई जोड़ी की जरूरत पड़ेगी ही।
० नीरज दइया




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