03 अप्रैल, 2017

फलके सा चेहरा और अप्रैल-फूल

मैं सुबह-सुबह जब दफ्तर के लिए निकलने लगा तो पंच काका ने कहा- ये फलके सा चेहरा लिए कहां जा रहा है? मुझे यह उम्मीद तो नहीं थी कि काका मुझे मूर्ख बनाएंगे और मैं बन जाऊंगा। मैं जानता हूं कि ज्ञानियों के मजाक भी उच्च स्तरीय होते हैं, हर कोई समझ नहीं सकते हैं। मैं फलके सा चेहरा लिए कहां जा रहा हूं इस बात पर मौन रहा तो काका ने पूछा- अरे बोलता क्यों नहीं, फलके सा मुंह लिए कहा जा रहा है। मैं अटकता अटकता बोला- द... फ्त.. र। और घर से निकल तो गया पर यह क्या दफ्तर पहुंचा तो गेट पर खड़ा कर्मचारी भी हंसते हुए बोला- साहब आज तो फलके सा चेहरा लेकर आए हो। मेरी हैरानी का पार नहीं, ये क्या माजरा है कि सब फलके सा चेहरा कह रहे हैं। सीट पर बैठा तो पास वाली सीट पर बैठा मेरा सहकर्मी भी यही बात बोल कर मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम करने के लिए काफी था। मैं चिंता में पड़ गया कि ये सब आज फलके सा चेहरा क्यों कह रहे हैं। यह तो अच्छा हुआ कि मैं बेहोश नहीं हुआ साहब ने बुलाया और उन्होंने भी मुझे पंच काका वाली बात कही- आज फलके सा चेहरा लिए कैसे हो? मैं भीतर ही भीतर शर्माता और बाहर मुस्कुराता बोला- सर ये फलके सा चेहरा क्या होता है। जबाब हथोड़े जैसा था- आइना देखो, तुम्हारा चेहरा आज फलके सा है। साहब की गंभीरता अब भी कायम थी और फाइल हस्ताक्षर करा के मैं लौट आया। फाइल रख कर वॉश रूम में गया तो वहां मेरा मित्र वर्मा पहले से ही अपना मुंह आइने में देख रहा था। मैं भी परेशान सा पास खड़ा होकर आइना देखने लगा कि ये फलके सा चेहरा क्या माजरा है। वर्मा से हंसी रुकी नहीं और उसने भेद खोल दिया- अप्रैल फूल बना रहे हैं। मेरी हालत रोने जैसी थी, मैं चीखा- ये क्या मजाक हुआ? वर्मा बोला- मजाक ही तो है। फलका यानी रोटी, तेरा मुंह गोल रोटी जैसा है। इसमें क्या गलत है। मजाक को समझा करो यार।
      मैं मजाक को समझा कि नहीं इससे जरूरी है कि मैं एक अप्रैल को समझ लेता हूं। एक अप्रैल का किसी भी प्रकार के फूल से कोई संबंध नहीं है, फिर भी वर्षों से अप्रैल-फूल का ऐसा राग क्यों गाया जाता है? प्रतिवर्ष इस राग को सुन-सुन कर यकीन करने को जी करता है कि इस प्रकार का कोई दुर्भल जाति का फूल भी होता है। यह भेड़ चाल है, कोई किसी से सवाल नहीं करता, बस नाचते-गाते हैं- अप्रैल-फूल आ गया, आ गया। अरे क्या आ गया, जीवन में इतने अप्रैल आए और गए... पर अप्रैल फूल इस बार जैसा कभी नहीं आया। माना यह एक-दूसरे को मूर्ख बनाने-बनने का दिवस है। देश की प्रगति में अब अप्रैल फूल केवल एक अप्रैल को ही नहीं, तीन सौ पेंसठ दिन मनाया जाता है। हमको खबर भी नहीं होती है और हम हर दिन अलग अलग जगह मूर्ख बनते हैं, बनाए जाते हैं। अप्रैल फूल का लोकप्रिय संस्करण ‘उल्लू के पठ्ठे’ के रूप में विख्यात है। जब पंच काका को पूछा तो उन्होंने बताया- बाबा आदम को सर्प ने मूर्ख बनाकर पहली अप्रैल को सेव खिलाया था। जिससे उन्हें ज्ञान हुआ, और आगे क्या हुआ हम सब जानते हैं। आदम और हव्वा ने एक-दूसरे को मूर्ख बनाया। यह चक्कर आगे चलता रहा। उल्लू के पठ्ठों का विकास हुआ। उन्हें यह ज्ञान हुआ कि बिना ज्ञान के कोई किसी को मूर्ख नहीं बना सकता। अज्ञान तो खुद मूर्खता का पर्याय है। मूर्ख को मूर्ख नहीं बनाया जाता- उसे महामूर्ख बनाना पड़ता है। अब तो महामूर्खों की भी कई श्रेणियां हैं। हम ऐसे लोक में पहुंच चुके हैं जहां हमारी मूर्खताओं की पावर इतनी बढ़ गई है कि हमें हर कोई आसानी से मूर्ख बना सकता है। जैसे मैंने तुझे ‘फलके सा चेहरा’ कह कर मूर्ख बनाया।
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