10 अप्रैल, 2017

मास्टरजी का चोला

    किसी के कुछ होने या नहीं होने से जरूरी होता है दिखना और लगना। बिना दिखे और लगे, कुछ होना या नहीं होना किसी काम का नहीं है। अब मास्टरजी को ही लो, मास्टरजी इन दिनों जिंस-टी-शर्ट और न जाने क्या क्या वस्त्र धारण कर के आते हैं कि वे मास्टरजी जैसे लगते ही नहीं। मास्टरनियां भी कहां कम है, वे भी अपने निराले अंदाज में अदाएं बिखेरती स्कूल पहुंचती हैं। जवान तो जवानी के जोश में होती है पर यहां तो बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम तक के उदाहरण देखने को मिलते हैं। उम्र का अपना हिसाब और सलीका होता है। विद्या के मंदिर में भड़कीले रंगों और चमक-दमक का भला क्या काम। जब आप ऐसे आएंगे तो आदर्श और संस्कारों का क्या होगा। बच्चों को कैसे समझाएंगे। जब खुद ही ऐसे निराले अंदाज में हीरो-हिरोइन बन कर विद्यालय पधारेंगे तो संस्कृति गर्त में चली जाएगी। कभी फेंच कट दाढ़ी तो कभी ऐसे-ऐसे कट में कि उनका नाम भी आप ही बता कर विज्ञापन करते हैं। जैसे स्कूल स्कूल न होकर कोई फैशन-ग्राउंड हो गया हो। कार्यालय के कर्मचारी बाबू अपने रंग-ढंग में मस्त है। उन्हें कहने-सुनने की हिम्मत किसी में नहीं है। वे स्कूल के सभी कर्मचारियों की पगार बनाते हैं, फीस का हिसाब रखते हैं। वे बजट को हिसाब से बरतते हैं। वे साहब को नियम और पेच बताते हैं। वे तो जो कुछ जानते हैं, कोई दूसरा कहां जानता है। इसलिए उनके अंदाज भी निराले होने ही चाहिए। वे साहब से भी बढ़-चढ़ कर सज-धज कर अपनी मर्जी से आते हैं और जाते भी अपनी मर्जी से हैं। जब सारा हिसाब-किताब उनके हाथ में है, तो फिर डर किस का। पहले वाले स्कूलों में मास्टरजी टाइप जो लुक दिखता था, अब वह नहीं दिखता है। कुछ मास्टर तो छोरे-छपारे जैसे लगते हैं, और नहीं लगते तो वे वैसे ही बन-ठन कर आते हैं। नई मास्टरनियां और छोरियां दोनों एक जैसी लगती है। किसी मास्टरनी को बड़ी कक्षा में बैठा दिया जाए तो अंतर मामूल नहीं चलेगा। पहले का जमाना दूसरा था, जब मास्टरनीजी को ‘बहनजी’ कहा करते थे। उस जमाने में वे कितनी शांत-शालीन थी। वे जब से मैड़म बनी है तब से मत पूछिए बात। अंग्रेजी रंग-ढंग और नाज़-नखरे पूरे होने चाहिए। वे ऐसे क्रीम-पॉउडर मल-मल के आती हैं कि कोस्मेटिक की दुकानें उन्हीं से चलने लगी हैं। कहीं गुलाब महकता है तो कहीं चंदन। कहीं केवड़ा तो कहीं चमेली। स्टाफ रूप में तीन-चार मेडम हो तो लगता है कहीं पास में फुलवाड़ियां महक रही हैं। रंग-रूप और साज-सज्जा अथवा सुगंध के मामले में मास्टरजी भला कब पीछे रहने वाले हैं। वे भी कम नहीं, डियो और इत्र लगाकर आते हैं, या डियो-इत्र से स्नान कर के आते हैं कहना मुश्किल है। डियो अथवा इत्र की तीखी महक जब नाक में तीर जैसे घुसती है तो विचार आता है कि ये भाई-बंधु नहा-धो कर कभी आते भी हैं या यूं ही छू-छा, फुस-फुस किए और निकल आते हैं। नकली और असली में यही फर्क है कि पुराने वाले दिनों वाले मास्टरजी का रौब होता था, गरिमा होती थी। अब इन पर इनके चेले-चपाटों का रौब और आतंक है। कहते हैं कि ट्रेंड बदल गया है। अब सब फ्रेंडली है। गुरु-शिष्य परंपरा को नए चेले और चेलियों ने तहस-नहस कर फ्रेंडली दुनिया में सब कुछ फ्रेंडली बना दिया है। ऐसे माहौल में यदि कोई योगी-महात्मा का तेज जाग जाए तो अतिश्योक्ति नहीं है। पंच काका कहते हैं कि जब विद्यालय में विद्यार्थियों के लिए ड्रेस कोड है तो फिर वहां काम करने वाले सभी कर्मचारियों और शिक्षकों को भी इस परिधि में लेना चाहिए। माना कि मास्टरजी को अब पुराने वाला वह धोती-चोला पसंद नहीं है, पर जब आपने मास्टरजी का चोला धारण किया है तो कुछ तो परंपरा-संस्कृति और संस्कार का लिहाज होना चाहिए। खैर छोड़िए मास्टरजी आपको बस इतना ध्यान रखाना है कि विद्यालय में रोमियो बन कर नहीं आना है।   
- नीरज दइया

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