19 अप्रैल, 2017

सबकी अपनी-अपनी दुकानदारी

ह नाहक दुख की चर्चा क्यों है? अभी तो हमारे अच्छे दिन है। यह संसार सुखी लोगों से भरा पड़ा है। सुखी लोग यानी- खाने और रोने वाले लोग। जागने वाले और रोने वाले लोग सुखी नहीं होते। जिनके भाग्य में जागना और रोना लिखा है ऐसे दुखी लोग गिनती के होते हैं। यह उनके भाग्य की बात है। कर्मों का लेखा है। इस रहस्य को वर्षों पहले कबीरदास ने उद्घाटित किया- ‘सुखिया सब संसार है, खावे और सोए। दुखिया दास कबीर है, जागे और रोए।’ जागने वाला और रोने वाला कोई कबीर सरीखा बिरला व्यक्ति होता है। आज सब की अपनी-अपनी दुकानदारी है, कोई कबीर जैसा कहां है। दुकानदारी के चलते सभी खाते हैं और सो जाते हैं। कौन भूखा है, यह सोचने-जानने की जरूरत किसे है? हमने जब खा लिया और चैन से सो लिए, तो हिसाब यही कहता है कि अपनी दुकानदारी में लगे रहें। अपने खाने और सोने की चिंता करना ही अच्छे दिन होते हैं। दुखिया दास कबीर पहले एक थे। अब बढ़ कर कितने हो गए होंगे। ऐसे दासों की परवाह सुखिया संसार के प्राणियों को बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। बात जब खाने की चली है तो जैसे किसी ने दुखती रग पर हाथ रख दिया है। क्या बताएं भैया, बुरा हाल है। खाना सबका अपना-अपना निजी होता है। किस घर की देगची में क्या पक रहा है, इसकी चर्चा बाजार तक जा पहुंची है। यह हमारी निजता पर हमला है। व्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है। कबीर कभी मारे नहीं जा सकते हैं। वे मर भी जाते हैं तो उनका रोना जारी रहता है। उस आसन को कोई दूसरा संभाल लेता है। हमें क्या खाना है और क्या नहीं खाना, इस पर गहन चिंतन-मनन किया जा रहा है। क्या हम नहीं जानते कि शाकाहार स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। वनस्पति और जीव-जंतु दोनों की जान में अंतर होता है। देश की एकता और अखंडता विषय पर महाकवि दिनकर ने चिंतन करते हुए लिखा कि शाकाहार को राष्ट्रीय आहार के रूप में पूरे देश में अपनाया नहीं जा सकता है। कवयित्री मीरा कहती हैं- ‘भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई!’ जगत को देख कर मीरा को रोना पड़ा पर कबीर तो रोते हुए जागते रहे। उन्हें नींद नहीं आई। उनका रोना किसी ने नहीं देखा। इसलिए उन्होंने इस सच्चाई को लिख दिया। एक युग मीरा का था तब सभी लोग भगत नहीं थे। एक युग आज का है तब भी सभी लोग भगत नहीं हैं। इस जगत में भगवा धारण किए हुए कुछ भगत हैं, तो कुछ बिना भगवा के भी भगवा के भगत हैं। बाकी बचे हुए रंग-बिरंगे जगत के लिए भी अपनी दुकानदारी है। यहां दो पाट दो दुकानदारियों के हैं। लगता है कि अब साबुत नहीं बचेंगे। दुकानदारी का यह चक्कर है कि एक चालू और चलती दुकान में जो सामान है, नियम बना दो कि वही बेचा जाएगा। बाकी सभी दुकानदारियां फेल हैं, सारी बेकार है। आप सुखी संसार में खाना और सोना चाहते हैं तो कबीर की बात मान लो। किसी बिल में एक बिल पास हुआ मान लिया जाए कि जगत की सारी दुकानें आज से घास बेचा करेंगी, जिसको खाना हो खाओ। अच्छे दिन हैं कि सभी घास खाएं और रोएं। माना कि आपने आज तक घास नहीं खाया तो क्या आगे भी नहीं खाएंगे। हम घास खिला के रहेंगे। पंच काका कहते हैं कि प्रजातंत्र में कानून सर्वोपरि होता है। शाकाहारी कानून बना दिया है तो परेशानी किस को है। अब शेर राजा भी घास खाएगा, और कभी मांस खाने की इच्छा होगी तो छिप कर कहीं गुप-चुप खा लेगा। फिर स्टेज पर आकर घास के पास मुंह किए खड़ा होकर शाकाहार का विज्ञापन करेगा। शेर-चूहे सब की अपनी दुकानदारी है। जब बात देखने-दिखाने की हो तो सब कुछ सही और सलीके से होना चाहिए। अच्छे दिन यही है कि चूहे-शेर मिलकर करे कुछ भी, पर यह नाहक दुख की चर्चा क्यों है? 
- नीरज दइया 

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