02 अप्रैल, 2017

राजस्थानी कविता का हिन्दी अनुवाद भाषा भारती में प्रकाशित


मैं कविता की प्रतीक्षा में हूं 
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डा. नीरज दइया
अनुवाद : नवनीत पाण्डे 
 
ढूंढ़ने से नहीं मिलती कविता
अयानास ही दीखती है
जब भी करना चाहता हूं संवाद
तो नहीं मिलता कोई ठीक-ठाक प्रश्न
प्रश्न यह है कि कोई कवि क्या पूछे कविता से
क्या किसी कविता से पहचान के बाद भी जरूरी होता है प्रश्न
प्रश्न कि समय क्या हुआ है?
प्रश्न कि बाहर जा रहे हो कब लौटोगे?
प्रश्न कि खाना अभी खाएंगे कि ठहर कर?
प्रश्न कि चाय बना देती हूं पिएंगे क्या?
प्रश्न कि नींद आ रही है लाइट कब ऑफ करोगे?
प्रश्न कि इन किताबों में सारे दिन क्या ढूंढते रहते हो?
प्रश्न कि कोई पैसे-टके का काम क्यूं नहीं करते?
प्रश्न.. प्रश्न... प्रश्न ? शेष है प्रश्न-प्रतिप्रश्न?
किंतु सिर्फ प्रश्नों से क्या बन सकता है?
क्या सभी प्रश्नों को इकठ्ठा कर रच दूं कोई कविता?
पर क्या करुं-
अभी-अभी आया है जो प्रश्न आपके संज्ञान में
इसीलिए तो मैंने सर्वप्रथम लिखा था-
ढूंढने से नहीं मिलती कविता
अयानास ही दीखती है
कविता यह है कि मैं कविता की प्रतीक्षा कर रहा हूं
अगर आपकी भेंट हो
तो कहना उसे कि मैं प्रतीक्षारत हूं।

००००
मूल कविता-
म्हैं उडीकूं कविता
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डा. नीरज दइया
 
जोयां हाथ नीं आवै कविता
अणचींतै सूझै....
जद करणी चावूं बतळावण
तो कोनी सूझै
कोई सावळ सवाल
सवाल ओ पण है-
कोई कवि कविता सूं
कांई करै सवाल?
कांई कविता सूं ओळख पछै ई
जरूरी होवै कोई सवाल?
सवाल है कै कित्ती बजी है?
सवाल है कै बारै जावो पाछा कणा आसो?
सवाल है कै अबार जीमसो का पछै?
सवाल है कै चाय बणा दूं पीसो कांई?
सवाल है कै नींद आवै बत्ती कद बंद करसो?
सवाल है कै आं पोथ्यां में सारो दिन कांई सोधो?
सवाल है कै कोई पइसा-टक्कां रो काम क्यूं नीं करो...?
सवाल... सवाल... सवाल।
सवाल भळै है केई सवाल
पण कोरा सवालां सूं कांई संधै!
कांई सगळा सवाल रळा’र
सांध देवूं कोई कविता
पण कांई करूं
अबार-अबार ई जलम्यो है जिको सवाल
आप रै मगज मांय
इणी खातर तो सगळा सूं पैली कैयो—
जोयां हाथ नीं आवै कविता
अणचींतै सूझै....
कविता आ है
कै म्हैं उडीकूं कविता
जे थानै सूझै कविता
तो उण नै खबर जरूर करजो
-कै म्हैं उडीकूं।
००००
(भाषा भारती में प्रकाशित)

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