27 अप्रैल, 2017

दो नंबर की बही

खुद को सभी नंबर वन मानते हैं और चाहते है कि सदा-सदा के लिए वे नंबर वन पर ही बने रहें। जिंदगी के खेल में पास-फेल का सिलसिला चलता है। जैसे धूप-छांव वैसे ही नंबर वन-टू। अंधेरे के साथ उजाला जरूरी है और काले के साथ सफेद। जीवन में इसी विरोधाभास के कारण गति है। वन-टू का फोर करने वाले गति को पसंद करते हैं। गति कैसी भी हो, संतुलन की मांग करती है। हमारा सार्वजनिक जीवन वन है तो निजी जीवन टू है, इन दोनों के बीच संतुलन होना फोर है। सेठ हीरालाल जी सर्दियों के मौसम में अपने कोट की एक जेब में चना-चबेना, मूफली और दूसरी जेव में काजू-बिदाम, किसमिस रखा करते थे। उसका संतुलन यह था कि कोई उन्हें देखता अथवा मिल जाता तो वे सेठजी बन कर काजू-बिदाम की जेब से अपना सार्वजनिक जीवन उजागर करते, और निजी जीवन में वह चने-चबेने, मूफली से काम चलते। मूल बात यह है कि हम जो असल में होते हैं, वह असल में दिखना पसंद नहीं करते हैं। असल में हैं चोर, और बन कर घूमते हैं साहूकार। झूठे-मक्कार लोग सदा हरीशचंद्र का मुखौटा लगाए घूमना चाहते हैं। दागी बेदाग दिखाना चाहते हैं। कुछ मुखौटे इतने पुराने हो चले हैं कि अब उनके असली चेहरा खुद-ब-खुद झांकने लगे हैं।
जीवन के हिसाब-किताब की दो बहियां होती है। एक असली, दूसरी नकली। एक में काला धन और दूसरी में सफेद धन। हमारे निजी जीवन में वैसे ही बहुत कुछ काला होता है, जिसे हम सफेद करते हैं। करना चाहते हैं। कला छिपाना कला है। ठीक वैसे ही जैसे दो नंबर को एक नंबर करना। लेखक ईनामदार होते हैं, उनके काले-सफेद और सफेद-काले के चक्कर होते हैं पर ऐसा करने में उनकी आत्मा लहूलुहान हो जाती है। लेखक होना यानी एकदम सच्चा और ईमानदार होना है। लेखक से बेईमानी की उम्मीद किसी को नहीं होती। ना पक्ष और ना विपक्ष को। अगर लेखक ही बईमानी करने लगा, तो समाज का क्या होगा? नैतिक शिक्षा कौन देगा? लेखक का भ्रष्ट होना पूरे समाज और तंत्र का भ्रष्ट होना है। इसलिए लेखक का सदा स्वच्छ रहना और बेदाग होना जरूरी होता है। लेखक स्वच्छ हो, या नहीं हो, वह स्वच्छ दिखना चाहिए। धुला-धुला, निरखा-निखरा। उसका काम समाज की गंदगी और बुराइयों को दूर करना है। वह खुद मैला-कुचैला या ऐसा-वैसा कैसे हो सकता है? अगर वह गंदा और बुरा हो जाएगा तो उसे लेखक कौन कहेगा! प्रेमचंदजी ने लेखकों को बहुत पहले ऐसी मशालें हाथों में थमा दी कि उन्हें तब से अब तक सदा आगे चलने वाला ही माना जा रहा है। वे समाज को रोशनी दिखाने वाले हैं। महानता का लबादा पहने हुए हमारे लेखक भले थक जाए पर उन्हें आगे ही चलना है। लेखकों का यह फर्ज है कि वह बुरे को अच्छा देखे और उसे अच्छा बनाकर प्रस्तुत करे। बुरे को बुरा कहने की सामाजिक मानसिकता बदल चुकी। क्यों कि जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोये। इसलिए बुरा कहीं है ही नहीं। यह भी कितना नेक और पवित्र विचार है कि यदि करनी है तो बुराई से नफरत करो, बुरे से नहीं। अस्तु बुरा यानी नंबर टू तो सदा प्यार के काबिल है। फिर दो नंबर बही को एक नंबर की बना देना ही कला है। हमें दो नंबर को असली कहना है। लोगों का क्या है, लोग तो वही मानेंगे, जो हम कहेंगे।
पंच काका कहते हैं कि नकली को असली जैसा प्रस्तुत करना ही वर्तमान समय की कला है। बही कैसी भी हो वह सदा नंबर वन ही होती है। नंबर टू तो दिखाई नहीं जाती। धन काला हो या सफेद, उस पर उसका नाम काला या सफेद नहीं लिखा होता। नोटों की माया इतनी मोहक होती है कि उसकी बढ़त में बुरे से बुरा अच्छा हो जाता है। लक्ष्मी में इतनी शक्ति है कि वह स्वयं तो पूजनीय है ही, साथ ही वह जहां और जिसके पास रहती है उसे भी पूजनीय बना देती है।

 ० नीरज दइया


 

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