13 अप्रैल, 2017

व्यंग्य की ए बी सी डी

पंच काका ने पूछा- व्यंग्य क्या होता है? यह सवाल सीधा है पर मुझे इसका कोई सीधा जबाब नहीं सूझ रहा था, इसलिए कहा- व्यंग्य व्यंग्य होता है। यही सवाल अगर बादशाह अकबर बीरबल से पूछते तो जाहिर है बीरबल कहते- जहांपना मैं कल जबाब दूंगा। बीरबल के जितने भी जबाब है वे तुरंत नहीं दिए हुए है। बीरबल से हमें सीखना चाहिए कि तुरंत जबाब देने में खतरा है। किसी भी सवाल को कल पर टालना ही समझदारी है। सोचने के लिए समय मिल जाता है। पंच काका मेरा समय लेने के मूड में थे, इसलिए उन्होंने फिर कहा- ये भी भला क्या जबाब हुआ कि व्यंग्य व्यंग्य होता है। यह तो वही बात हुई कि दो दोस्तों को उनके घरों के बारे में पूछा गया तो पहले ने जबाब दिया- मेरा घर इसके घर के सामने है, और दूसरे ने भी कहां कि मेरा घर इसके सामने है। जब पूछा गया कि दोनों के घर कहां हैं तो जबाब आया- आमने-सामने। अब जो आमने-सामने घर हैं उन्हें कैसे ढूंढ़ा जाए? मेरा बात को घूमाना लाजमी था, मैंने कहा- काका, आप बड़े विद्वान है और व्यंग्य क्या होता है यह बखूबी जानते हैं। इस जबाब पर काका मुस्कुराए और बोले- वाह ! बेटा, उस्ताद से उस्तादी। चलो मान लिया कि मुझे पता है और यह भी मानता हूं कि तुम्हें भी पता है, फिर भी अगर कोई यह सवाल पूछे तो उसे कहा क्या जाए? मेरी मुसिबत यह थी कि काका को यह भी नहीं कह सकता कि व्यंग्य की ए बी सी डी इतनी सरल नहीं है कि हर कोई समझ सके। बहुत बार चीजें बहुत सरल लगती हैं, पर वास्तव में वे कठिन होती है। जैसे- व्यंग्य असल में ऐबी यानी शरारती लोगों का काम है। यह सीडी ऐसी है जो बिना कंप्यूटर के भी चलती है। इससे भी आगे कहा जाए तो ऐसी सीढ़ी है जो बहुत दूर तक हमें पहुंचाती है। ऐसे-ऐसे नजारे दिखाते हैं कि चक्कर आने लगते हैं। हमारा मन धरातल पर आने को मचलता है। बहुत पहले जसपाल भट्टी ने जो उलटा-पुलटा दिखाया था, वह व्यंग्य था। मान लिजिए कि हम घर देरी से पहुंचते हैं और देरी से पहुंचने पर भी सुनने को मिले- बहुत जल्दी आ गए। यह व्यंग्य है। टेढ़ा मसला है कि जो बात सीधे-सीधे कहनी चाहिए उसे व्यंग्य के जरिये तोड़ते-मरोड़ते और रस पैदा करते हैं। कहते कि इससे जायका आता है। जायका यहां यह है कि काका ने मेरी फीत उतार ली। कोई भी फीत चलते-चलते उतार सकती है। सीधा एकदम सरल सवाल करो। गीतकार शैलेंद्र ने लिखा था- हर सवाल का सवाल ही जवाब हो। जैसे- हम जिंदा क्यों है? जीवन-मृत्यु क्या है? मैं क्या हूं? ऐसे में पता चलेगा कि रहस्यों से भरा संसार है। हर आदमी के पास अपने-अपने सवाल है। सवाल यदि एक है तो जबाब भी एक होना चाहिए। यहां सवाल यह था कि व्यंग्य क्या है? तो जबाब है कि व्यंग्य यही है। यहीं है। जो मैं लिखता हूं और जो आप पढ़ते हैं, वही व्यंग्य है। बाकी सब क्या है यह कहना मेरा काम नहीं है। पंच काका मेरी हालत ताड़ गए और कहने लगे- किसी भी चीज के लिए ये ‘क्या’ बड़ा सवाल होता है। मैं क्या हूं और तुम क्या हो, इससे बड़ी बात यह है कि हम क्या हैं? हम बुद्धिजीवी हैं और बुद्धिजीवियों का काम है कि दुनिया के हर सवाल पर चिंतन-मनन करें। इस संसार में हम सभी भटक रहे हैं। सब को इतना भ्रमित कर देना चाहिए कि सामने सवाल पूछने की कोई हिम्मत करे तो दस बार सोचे। सच्चाई यह है कि सही मार्ग कोई नहीं जानता। अलग-अलग विद्वान हर बात पर मतांतर रखते हैं। यह जरूरी है कि अगर हम विद्वान हैं और बने रहना चाहते हैं तो अपना अलग मत रखें। सब को भटकाने वाल मत। मत यह है कि भटकना-भटकाना ही व्यंग्य है।  
- नीरज दइया

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