06 अप्रैल, 2017

पिताजी के जूते

पको खबर है या नहीं- समय बदल गया है। बदलते समय के साथ बहुत सारी चीजें बदल गई हैं। बहुत सारे रिश्ते और टेस्ट बदल गए हैं। जो नहीं बदलने थे, वे भी बदल गए हैं। मसलन पहले हमारे घरों में जो पिताजी हुआ करते थे, उन्हें भी बदल दिया गया है। आजकल वे अपने बदले-बदले रूप में पाए जाते हैं। पिताजी कितना ओल्ड नेम है। अब नए दौर में सब कुछ नया-नया होना चाहिए। पिताजी तो बदले नहीं जा सकते, पर उनका नाम बदल कर कुछ नए का असहास तो ला साकते हैं। बेशक, पापा या डेड जैसे किसी संबोधन में पिताजी वाली गरिमा नहीं है। ना हो गरिमा, करना क्या है गरिमा का। नए जमाने में जब सब कुछ बदल रहा है, तो यह बदलाव भी जरूरी है। नाम बदलने से बहुत फर्क पड़ता है। कुत्ते को कुत्ता कहो तो लगता है किसी गली के आवारा कुत्ते की बात हो रही है। यही अगर कुत्ते को बस ‘टोमी’ कह कर चर्चा कीजिए, तुरंत बात कहने-सुनने वालों का स्तर उच्च हो जाता हैं। पीढ़ियों की मानसिकता में यही तो अंतर है कि वे बात को दिल पर ले लेते हैं। पिताजी की बात में कुत्ता आने से प्रसंग में कोई हल्कापन आने की बात सोचे, तो समझ लिजिए पुराने खयालों का दिमाग है। नए ख्यालों में इन छोटी-बड़ी बातों को इगनोर करना पड़ता है। पिताजी में से जब से ‘जी’ निकला है तो पिता के पर्यायवाची- डेड, पापा जैसे शब्द हो गए। कुछ अब भी ‘जी’ को घसीटते हुए इस युग तक ले आए हैं। वे पापाजी और डेडीजी कहते हैं। उनका यह ‘जी’ को बचाए रखने का प्रयास है। पहले वाले पिताजी का रुतबा हुआ करता था, लेकिन अब पिताजी ने डेडीजी का चोगा पहना है वे बहुत फ्रेंडली हो गए हैं। वे जमाने के साथ बदल रहे हैं। पहले वाले रौब को छोड़, वे थके-मांदे एडजेस्टिव नेचर के होते जा रहे हैं। इस शताब्दी में सरवाइव करना है तो एडजेस्टिव होना पड़ेगा। लोक की मान्यता है कि अगर बेटे के पैर में बाप का जूता आने लगे तो समझो वह बड़ा हो गया है। अब फ्रेंडली जनरेशन में तो बेटों के पैर जन्म से ही बड़े-बड़े होने लगे हैं। ‘तुझे सूरज कहूं या चंदा, तुझे दीप कहूं या तारा, मेरा नाम करेगा रौशन, जग में मेरा राज दुलारा...’ पिताजी का गाना था और अब बेटाजी का गाना है- ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा, बेटा हमारा ऐसा काम करेगा, मगर ये तो, कोई ना जाने... के मेरी मंज़िल, है कहाँ।’ बेटे की मंजिल पापा नहीं जानते हैं, क्यों कि बेटों की मंजिल बदल गई है। पिताजी का बड़ा नाम रौशन करने में उनकी कोई रुचि नहीं है। इसका एक बड़ा कारण ‘जूते’ हैं। अब कहने को बस जूते शब्द रह गया है। देश से असली जूते गायब हो चुके हैं। किसी के पैरों में कोई जूता नहीं, बस भ्रम है कि जूते हैं। अगर गलती से कोई जूता है, तो वह बेकार है। उसे पैरों में पहनने पर ना बचाव करता है ना उसे खोल कर उठाया जा सकता है। पहले पिताजी पैर में जूता रखते थे, स्कूल में मास्टरजी जूता रखते थे, गली-समाज में कुछ बड़े-बूढ़े लोग जूता रखते थे, पंच-सरपंच के भी जूते हुआ करते थे।
          पंच काका कहते हैं कि अब जूतों की प्रजाति लुप्त हो गई है। सबसे पहले घरों से पिताजी के जूते गायब हुए। स्कूल के सारे जूते चुरा लिए गए। बंटाधार हो गया। बच्चों के हित में बड़े-बड़े कानून है। थाने-कोर्ट-कचेड़ी आदि सब के जूते शोफानी हो गए। हाथ के दात जैसे सिर्फ दिखाने के जूते। अब तो हुआ यह है कि कभी बच्चे ना जाने कहां से जूते ले आते हैं, और अपने अभिभावकों, शिक्षकों तक को नहीं छोड़ते। कहां गए हमारे संस्कार? कहां गए हमारे जीवन-मूल्य? हाय पहले वाली शिक्षा कहां गई?
० नीरज दइया   

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें