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कवि-आलोचक नीरज दइया इन दिनों व्यंग्य में सक्रिय है। इस पोथी में उनके ताजा व्यंग्य संकलित है जो उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं हेतु लिखे हैं। इन व्यंग्य रचनाओं के बारे में सुपरिचित व्यंग्यकार-संपादक सुशील सिद्धार्थ ने एक लंबा, सचित्र ब्लर्ब लिखा है जो उनके फोटो के साथ अवतरित हुआ है। संकलन में नीरज के चालीस व्यंग्य हैं, भूमिका महेश चंद्र शर्मा ने लिखी है जो स्वयं एक बड़े संपादक हैं। वर्तमान की विसंगतियों पर नीरज की पैनी नजर है, वे चीजों को बहुत ध्यान से देखते हैं फिर पूरी शालीनता के साथ व्यंग्य के रूप में रियेक्ट करते हैं, यहीं आज के व्यंग्य की मूलभत आवश्यकता है, जिसे लेख लिखने वाले भूल जाते हैं, मगर कविमना नीरज सब कुछ संजो कर पाठकों के साथ ताल मेल बिठा कर अपनी बात कहते हैं। व्यंग्य की यही विशेषता होती है। पाठक आपको मिल जाए।
अधिकांश रचनाएं कलेवर में छोटी है, काश नीरज पूरी लंबाई की रचना लिखते फिर संपादित कर अखबारों को देते , क्योंकि अखबारों में आजकल जगह खत्म, लेख खत्म, प्रभारी ज्यादा मेहनत नहीं करते। नीरज पाठकों को गुमराह नहीं करते, वे सीधा संवाद करते हैं। वे लंबी-चौड़ी नहीं हांकते, बस काम की बात करते हैं। लगभग सभी रचनाओं में पंच काका उपस्थित है, यह पंच हिंदी का तो है ही अंग्रेजी का भी पंच है। हर रचना में पंच है जो पाठक को झकझोर देता है। मास्टरजी का चोला इस संकलन का सबसे अच्छा व्यंग्य है। सेल्फी पर भी लेखन ने अच्छा लिखा है। लेखक का वर्तमान परिवेश से अच्छा नाता है, वे बार-बार समाज में व्याप्त विसंगतियों पर प्रहार करते हैं।
दाढ़ी पर भी उन्होंने खूबसूरत व्यंग्य लिखा है। नीरज का कवि रूप भी इन रचनाओं में विचरता रहता है। साहित्य संबंधी व्यंग्यों में कटु यथार्थ के दर्शन होते हैं। नीरज के इन व्यंग्यों में बिम्ब है, प्रतीत है, वक्रता है, वे इन औजारों का जम कर इतेमाल करते हैं। ‘अपने अपने भूत’ ऐसा ही व्यंग्य है। काश वे कुछ और रचनाओं को शामिल करते, पुस्तक का कलेवर छोट है, मूल्य अधिक।
पुस्तक का शीर्षक व्यंग्य- पंच काका के जेबी बच्चे कुछ आत्म व्यंग्य की तरह शुरू होता है फिर जाकर सार्वजनिक हो जाता है। यह कला कम ही लेखक साध पाते हैं। नीरज ने यह कर दिखाया है। कई जगहों पर राजस्थानी मुहावरे हैं, जो मन को खुश कर देते हैं पिताजी के जूते ऐसा ही व्यंग्य है।
अमुख, प्रमुख और आमुख लेखक एक साहित्यिक व्यंग्य है जिसे लगभग हर लेखक ने जिया है। मानदेय हर सच्चे लेखक की दुखती रग है। साहित्यिक मेलों प्र भी लेखक ने कलम तोड़ कर रख दी है। कुल मिलाकर सुधि पाठक इस संकलन का स्वागत करेंगे। अब कुछ बात कालम लेखक की। नीरज के ये व्यंग्य किसी कॉलम की मर्यादा के साथ चलते हैं, कॉलम का अनुशासन या संपादक का अनुशासन मानना ही पड़ता है लेखक को अपनी मजबूरियों को नजर अंदाज कर कॉलम की मजबूरियों के साथ जीना पड़ता है या जीना सिखना पड़ता है। यही है वो कारण जो एक क्लासिक रचना को रोक देता है।
मैं इस रचना का स्वागत करता हूं। वे खूब लिखें। पुस्तक का कवर प्रतीकात्मक है मगर सुंदर है। इस संकलन को पढ़ने के बाद यह कहा जा सकता है कि राजस्थान का हिंदी व्यंग्य लेखन का भविष्य उज्ज्वल है। वे रांगेय राघव, अशोक शुक्ल, भगवती लाल व्यास की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। आमीन।
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पंच काका के जेबी बच्चे / डॉ. नीरज दइया / व्यंग्य संग्रह / वर्ष 2017 / मूल्य 200/- / पृष्ठ 96 / सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर-334001
पंच काका के जेबी बच्चे / डॉ. नीरज दइया / व्यंग्य संग्रह / वर्ष 2017 / मूल्य 200/- / पृष्ठ 96 / सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर-334001


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